रोटी कमाने ही
तो आए थे, साहेब
गाँव से शहर
अपनों से दूर
सवाल भूख का ही तो था
क्या पता था,कि
खून पसीने से सींचा
ये शहर एकदिन
आदमखोर हो जाएगा,
दो जून की रोटी के बदले
रोटी कमाने वालों को
ही निगल जाएगा।
 
आज जा रही हूँ।
अपने ही देश में
परदेसी हो कर,
पलायन को मजबूर
भूखी, प्यासी, पैदल
बेहाल, 
लौटना चाहती हूँ
अपने, घर गाँव
अपनी संतान को
अपने कमज़ोर कंधों
पर उठाए।
उसी तरह, जिस तरह
आज तक उठाते आए हैं
तुम्हारी सड़ी-गली
कठोर व्यवस्था का बोझ
बिना किसी शिकायत
किन्तु याद रखना
 
मैं ज़िंदा रही तो ज़रूर
बताऊँगी अपनी इन
अबोध संतानों को
कि जब सबसे मुश्किल
घड़ी थी,और हम लड़ रहे
थे भूख से ज़िंदा रहने की
लड़ाई तब अचानक
बेगाना हो गया ये मुल्क।
 
जा रही हूँ, दर्ज करती हुई
भविष्य के पन्नों पर
अपनी व अपनी संतानों
की आँखों में मज़दूरों
की बेबसी ओर हत्याओं
का ख़ौफ़नाक इतिहास।
 
विभाजन
नहीं; विभाजन
किसी देश, 
किसी धर्म का नहीं
बल्कि देश के भीतर
देश का है।
शहर के भीतर
गाँव का
विभाजन दिलों
के बीच
समर्थ और मजबूर का
मालिक और मज़दूर का।

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