08-01-2019

‘वेणी में गुँथा मन’

डॉ. रश्मिशील

रात्रि लगभग नौ बजकर पैंतालिस मिनट पर हम लोग विशाखपट्टणम पहुँचे तो मन हज़ार-हज़ार आशंकाओं से घिरा हुआ था। अनजाना शहर, अनजाने लोग और रात का समय। आना तो हम लोगों को सुबह ही था, परन्तु 23 जनवरी का दिन होने की वजह से दिल्ली गणतंत्र दिवस की तैयारियों व प्रदर्शन के चलते हवाई जहाज़ की उड़ानों के समय में काफ़ी फेर-बदल किया गया था और इसका प्रभाव हमारी यात्रा पर भी हुआ। बार-बार मन में विचार उठ रहा था, “कहीं उत्तर प्रदेश से सुदूर दक्षिण में विशाखपट्टणम में आयोजित इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने की स्वीकृति देना ग़लत निर्णय तो नहीं”। एक बार फिर आमंत्रण-पत्र के शब्द आँखों के सामने घूम उठे "राष्ट्रीय इस्पात निगम सोलहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। ...सुगन्ध की बढ़ती लोकप्रियता बनाए रखने और राजभाषा हिन्दी के उत्तरोत्र विकास में इस पत्रिका के योगदान को और बेहतर बनाने हेतु दिनांक 25.01.2017 को एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। ….आप इस कार्यक्रम में शामिल हों।"

एक शेर याद आया-

"क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा।
कुछ न होगा तो तज़ुर्बा होगा।"

अस्तु, हम लोग यानी डॉ. अमिता दुबे, मदन सैनी, मंजू शर्मा, सुधीर निगम, राजेन्द्र तिवारी, सुरेश उजाला, लक्ष्मी मिश्रा जी गन्तव्य पर पहुँचे तो एयर पोर्ट से बाहर आते-आते 10:30 बज चुका था। सोचा, "हम लोगों को रिसीव करने कोई आएगा भी या नहीं। दिन का समय होता तो शायद इतनी घबराहट न होती। अच्छाई यह थी कि एक दूसरे से प्रायः अपरिचित होने पर भी दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर विशाखपट्टणम तक की यात्रा में काफ़ी हद तक एक दूसरे से परिचित हो चुके थे। बाहर निकल कर इधर-उधर यह सोचकर देखने लगे कि शायद कोई हमारे नाम की पट्टिका लेकर हमें पहचानने की कोशिश कर रहा हो। मगर यह क्या, बाहर जो दृश्य था और जो अनुभूति हुई, उससे संशय के मेघ बिना बरसे ही ओझल हो गए। हमारा स्वागत किसी तख्ती पर चिपकाए गए हमारे नाम-पट्टिका से नहीं, वरन् गुलाब के फूलों से हुआ। हमें एयरपोर्ट लेने पहुँचे थे, सुगन्ध पत्रिका के संपादक श्री ललन कुमार, उपसंपादक वी. सुगुणा एवं श्री गोपाल जी। वी. सुगुणा जी ने सुर्ख लाल व पीले गेंदा के फूलों की वेणी हमें दी, जिसे हमने अपने बालों में टाँक लिया, मानो टाँक दिया हो नेह व आत्मीयता से बँधा मन, जो मौन होकर इस नयनाभिराम उत्तर व दक्षिण का मिलन देख रहा था। कुछ ऐसी ही रागात्मकता में बँधकर तुलसीदास ने कहा है-

"कोउ कुछ कह्यौ न कोउ कुछ छूंछा।
प्रेम मगन मन निज गति छूंछा॥"

कुछ ही देर में हम राष्ट्रीय इस्पात संयत्र निगम लिमिटेड, उक्कु नगर पुहँच गए। रास्ते में गोपाल जी ने कुछ इधर- कुछ उधर की बातें बताते रहे। ललन कुमार जी ने सुबह मिलने की बात कहकर विदा ली, परन्तु गोपाल जी और वी. सुगुणा जी हम सबको हमारे विश्राम कक्ष तक पहुँचाकर और हम लोगों के बार-बार आग्रह करने पर ही जाने को तैयार हुए। जाने से पहले वे हम सबको रात का भोजन करवाना नहीं भूले।

प्रातः 8:30 बजे हम सबको गेस्ट हाउस में बने रेस्टोरेन्ट में एकत्र होना था। वादे के अनुसार वी. सुगुणा और गोपाल जी हमसे पहले वहाँ पहुँच चुके थे। वहीं हमारी मुलाक़ात श्रीमती कृष्णवेणी, रश्मि कुमारी एवं वी. नन्दिता से हुई। कृष्णवेणी सौम्य, व्यवहार कुशल मितभाषी महिला हैं, जो संयत्र के हिन्दी सेक्शन में कार्यरत है। रश्मि कुमारी व वी. नन्दिता अभी अध्ययनरत हैं और सुगन्ध पत्रिका की बाल लेखिका के रूप में उपस्थित हुई थी। हमारे नाश्ता करते-करते ललन कुमार जी भी पहुँच चुके थे। रास्ते के नयनाभिराम दृश्य मन को मोहित कर रहे थे। हमने देखा, ‘कच्चे माल से इस्पात बनने की प्रक्रिया, पिघला हुआ लोहा और लोहे के बहते हुए झरने। पीला, सोने के रंग का तपते हुए सूरज सा धधकता एक कुआँ; जिसकी आँच में कच्चा माल खरा लोहा बनकर आता है। लोहे की तरलता देखकर मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ अनायास याद आ गईं-

द्वन्द्व स्थिति में स्थापित यह,
मेरा वजनदार लोहा,
लाल-लाल उन भयंकर अग्नि क्रियाओं से,
तेज ढकेला जाकर,
पिघलते हुए दमकते हुए,
तेजः पुंज गहन अनुभव का छोटा सा,
दोहा बनता है।

संयत्र में घूमते हुए मुझे कुछ स्थानों पर भद्रता लिखा हुआ दिखाई पड़ा। सुगुणा ने बताया कि भद्रता को तेलगू में सुरक्षा के अर्थ में ग्रहण किया गया है। हमने कहा "हम इसे सज्जनता के अर्थ में ग्रहण करते हैं।”

उन्होंने हँसकर कहा, "विभिन्न भाषाओं में शब्दों का अर्थ भिन्न होने पर भी विचारों का आदान-प्रदान हो ही जाता है।"

मध्याह्न भोजनावकाश के उपरान्त हम सब समुद्र तट पर गए और तट पर विशालकाय जलपोत (जिसे पाकिस्तान के साथ हुए 1971 के युद्ध में प्रयोग किया गया था, परन्तु बाद में उसे संग्रहणीय बनाकर पर्यटकों के लिए विशाखपट्टणम में अवस्थित किया गया) में घूमते हुए मन गर्वित हो उठा कि हमारे देश के जांबाज़ों ने एक नहीं सौ बार दुश्मनों के दाँत खट्टे किए हैं। है किसी की ताक़त जो हमसे लोहा ले। मन ही मन कवि प्रदीप की पंक्तियाँ गुनगुना उठी -

दुश्मनों सावधान, शत्रुओं सावधान।
चल पड़े है, आज हिन्द के जवान॥

‘तुम सा मैं लहरों में बहता’ की तर्ज़ पर सागर तट पर टहलते हुए असंख्य भाव मानस तट से टकरा-टकरा कर लौट रहे थे। तभी एक घटना घटी। घटना क्या: एक हादसा होते-होते बचा। अगर उसका ज़िक्र न करूँ तो निश्चय ही उस कुसुमांगी बाला रश्मि कुमारी के साहस व सूझ-बूझ की अवहेलना होगी। हमारे समूह में साहित्यकार सुभाष सेतिया जी भी थे, जो समुद्र के जल से आचमन का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे और अपने जूते उतारने लगे। अभी वे एक पैर के जूते का तसमा ही खोल सके थे कि जूता लहरों में बह गया, जिसे पकड़ने की लिए आगे बढ़े तो एक के बाद एक उठती लहरों की चपेट में आकर गिर पड़े। वह तो बह ही जाते, परन्तु रश्मि कुमारी, जो उस समय सागर की उठती-गिरती, लघु-लघु लोल लहरों को अपने मोबाइल में क़ैद कर रहीं थी, ने उन्हें पकड़ लिया। तभी दो अनजान युवक भी दौड़कर आ गए। सबने मिलकर सुभाष जी को बचा लिया। एकता की भावना से बड़े से बड़ा संकट टल जाता है। इस बात का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है? मैं बाल रचनाकार और वीरांगना रश्मि कुमारी को इन पंक्तियों के साथ साधुवाद देती हूँ-

“सत्य निष्ठा नेह से नवशक्ति जागी।
अवतरित तुझमें हुई विद्या-विधाएँ॥”

पहले दिन के सत्र का समापन उक्कु क्लब के तत्वावधान में आयोजित कवि सम्मेलन से हुआ। कवि सुधीर निगम की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन का संचालन डॉ. अमिता दुबे ने किया। मेरे साथ ही डॉ. सुरेश उजाला, हिमांशु सिंह, राजेन्द्र तिवारी, अमिता दुबे, सुधीर निगम व स्थानीय कवि, जिनका नाम याद नहीं आ रहा, ने काव्य पाठ किया। सुखद स्मृतियों के साथ हम अपने गेस्ट हाउस लौटे।

उषा सुनहरे तीर बरसाती, जय लक्ष्मी सी उदित हुई। साथ ही हम भी तैयार हो चुके थे। दूसरे दिन साहित्यिक सत्र का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। खांडवा से पधारे श्रीराम परिहार के श्लोक उच्चारण से वातावरण हो उठा। ‘सुगन्ध’ पत्रिका के संपादक ललन कुमार ने पत्रिका की यात्रा व विकास क्रम का परिचय दिया जिसे वी. सुगुणा ने सफलता पूर्वक स्लाइड्स की सहायता से प्रोजेक्ट के माध्यम से दर्शाया। इस कार्यक्रम में संयत्र के अध्यक्ष सहप्रबन्ध निदेशक पी. मधुसूदन जी विशेष रूप से पधारे। इसके पश्चात दो सत्रों में साहित्यिक परिचर्चा हुई। विषय थे - वर्तमान साहित्य के सामाजिक सरोकार एवं गृह-पत्रिका और तकनीकी साहित्य पर विचार विमर्श।" (परिचर्चा में विद्वानों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को स्थानाभाव के कारण उल्लेख नहीं किया जा रहा है)

चार विराम के पश्चात जब हम पुनः अपने स्थान पर पहुँचे तो हम सबकी टेबल पर मौजूद था एक निमंत्रण पत्र, जो अध्यक्ष सहप्रबन्ध निदेशक पी. मधुसूदन जी द्वारा रात्रि भोज के लिए दिया गया था। आतिथ्य की इस रीति की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। परन्तु अभी तो दोपहर के भोजन का समय था, तत्पश्चात सभी आमंत्रित साहित्कारों का सम्मान किया जाना था। पी. मधुसूदन जी हमारे बीच लगातार उपस्थित रहे। किसी ने सच ही कहा है -

दरमियां इंसान के बस प्यार होना चाहिए,
हर बशर के मन में ये उद्गार होना चाहिए॥
दिलबरी आसां नहीं ये काम है मुश्किल बड़ा,
दिल की ख़ातिर तो कोई दिलदार होना चाहिए।

सत्र समापन के साथ ही साहित्यकार सम्मेलन अपने उत्कर्ष पर पहुँच चुका था, पर मन घटे तो बार-बार बरसते नेह मेघों के बीच रहकर भी प्यासा का प्यासा बना हुआ था। प्रेम से कोई अघाता नहीं है। पूरे से पूरा निकाल लें, तब भी पूरा बचा रहता है। कहा गया है -

पूर्णमदः पूर्णमिंद पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

दो दिन पंख लगाकर उड़ गए। अगली प्रातः हम लौट रहे थे। गोपाल जी को अपनी पुत्री को छोड़ने धनबाद जाना था, इसलिए वे भी हमारे साथ एयरपोर्ट तक आए और हमारी फ़्लाइट निकलने तक साथ बने रहे। वी. सुगुणा जी से हमने पूर्व रात्रि में बार-बार कहा कि आप इतनी रात तक हमारे साथ है। आपकी दोनों बेटियाँ परेशान हो रही होंगी। अब आप प्रातः न आएँ, परन्तु उन्होंने अत्यन्त सहजता से कहा, "कोई बात नहीं (यह वाक्यांश उनका तकियाकलाम था) मैं सुबह आऊँगी तो एक बार फिर आप सबसे मिल लूँगी।" और वे सचमुच एयरपोर्ट जाते समय हमारे साथ आईं।

हम एयरपोर्ट में प्रवेश कर रहे है। वी. सुगुणा जी ने हाथ हिलाया, हमारी आँखे सजल हो चलीं। कुछ ही देर में फ़्लाइट उड़ चली, परन्तु मन, मन तो वेणी में गुँथा वही अटक कर रह गया।

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