वैश्विक स्तर पर हिंदी साहित्य का परचम

14-02-2019

वैश्विक स्तर पर हिंदी साहित्य का परचम

प्रियंका कुमारी

किसी भाषा की एक कृति पर विचार करना अर्थात उस भाषा के साहित्यिक परिदृश्य पर विचार करने जैसा है। हिंदी भाषा के साहित्य की परंपरा लगभग बारह सौ साल पहले शुरू होकर आज विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपना स्थान निश्चित कर रही है। सामान्यतः यह बात केवल कहने भर की, या चर्चा तक ही सिमित नहीं है बल्कि सराहनीय है। आज हम वैश्विक ग्राम की संज्ञा में जी रहें हैं जहाँ मनुष्य विभिन्न सोशल साइट्स और संचार-माध्यमों के माध्यम से संपूर्ण विश्व से जुड़ गए हैं और संवाद भी स्थापित कर पा रहे हैं। इस संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है भाषा। संवाद माध्यम के रूप में आज हर व्यक्ति भाषा की ताक़त को समझ रहा है।

आज व्यक्ति का जीवन अनुभूति के विविध रंगों और तदनुरूप भाषा की वक्रता पर आधारित है। व्यक्ति जीवन के प्रसंग, अनुभव, कार्य-कलाप, जीवन शैली, समाज, राजनीति आदि विभिन्न स्थितियों को दर्शाते हुए साहित्य में अपने सौंदर्य को प्रदर्शित करता है। साहित्य ही एक मात्र ऐसा साधन है जो व्यक्ति और समाज के मानस पटल पर गहरा प्रभाव प्रदर्शित करता है। हिंदी साहित्य भी लगभग बारह सौ वर्षों की परंपरा को लिए इस कसौटी पर खरा उतरा है। हिंदी साहित्य ने अपनी विकास यात्रा विषय-निरूपण, भाषा-कौशल, परिवेश-चित्रण आदि सभी बिंदुओं के साथ सुदीर्घ रूप से तय की है। आज हिंदी साहित्य पूरे विश्व में पढ़ा और लिखा जा रहा है। साथ यह भारतीय संस्कृति का गुणगान करते हुए विश्व के विभिन्न प्रदेशों के समाज और संस्कृति को भी अपने में समेट रहा है। जिस कारण अन्य भाषाएँ भी हिंदी के वैश्विक रूप को देखते हुए हिंदी साहित्य को चरितार्थ कर रही हैं।

भारत और विदेशों में हिंदी साहित्य की लोकप्रियता और हिंदी साहित्य के पाठक वर्ग को बरक़रार रखने का कार्य केवल भाषा द्वारा सम्पन्न नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे हिंदी भाषा की सेवा करने वाले अनेक साहित्यकार, पत्रकार, पत्रिका और प्रचार-प्रसार वर्ग है, साथ ही हिंदी साहित्य को मिले प्रोत्साहन और उसके नियमित पठन-पाठन के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत प्रयासों और कार्यक्रमों का योगदान भी रहा है।

भारत के पूर्व-उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के बड़े भूभाग में बोली जाने वाली हिंदी भाषा दुर्भाग्यवश राष्ट्रभाषा न बनकर केवल राजकीय भाषा ही बन पाई है। फिर भी संवाद माध्यम के तौर पर भारत और विश्व में लोकप्रिय होते हुए एक बड़ी भाषा के रूप में हमारे सामने है। अपनी सरलता और मानकता को बरक़रार रखते हुए देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी आज पूरे विश्व में विभिन्न माध्यमों से अपनी धाक जमा रही है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि हिंदी जितनी बोलने में आसान और सुचारु है वैसी शायद ही विश्व की कोई भाषा हो। शायद इसी लिए हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर लाने का महत्वपूर्ण कार्य साहित्य के प्रचार-प्रसार, लेखकों, प्रकाशकों और महत्वपूर्ण रूप से पाठकों के द्वारा ही सफल हो पाया है।

आज हिंदी साहित्य ने वैश्विक परिदृश्य पर अपनी प्रतिमा किस प्रकार स्थापित की है इसके लिए गत काल में एक बार मुड़कर देखना होगा। जैसे कि आधुनिक काल को परिवर्तनों का काल कहा गया है जिसमें यूरोप से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति भारतीय उपमहाद्वीप के साथ संपूर्ण विश्व में फैली। इस औद्योगिक क्रांति ने न केवल साम्राज्यवाद को ही जन्म दिया बल्कि इसके कारण पूरे विश्व में लोगों का विस्थापन भी हुआ। बड़े पैमाने में कच्चे माल का स्थानांतरण, प्रसंस्करण और विपणन भी किया जाने लगा। विस्थापन का मूल कारण मनुष्य बल था। उत्पादन को स्थानांतरित करने के लिए मज़दूरों की आवश्यकता पड़ने लगी। खाड़ी देशों के साथ-साथ अफ़्रीका और अमेरिका जैसे दूर-दराज़ के देशों में भारतीयों का विस्थापन होने लगा। विस्थापन के कारण भारतीय मूल समाज के लोग उन्हीं देशों में जाकर बसने लगे। किन्तु आज भी इस समाज ने अपनी भाषा और संस्कृति को न त्यागते हुए इसी के बल पर विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आज भी सूचना क्रांति, औद्योगीकरण, वैज्ञानिक प्रगति के द्वारा देश तथा विदेशों में विस्थापन हो रहा है। तत्कालीन समय में भी लोग गाँव से शहर, शहर से अन्य देशों में विस्थापित हो रहें हैं। विस्थापन के समय वह अपनी संस्कृति, समाज, रीति-रिवाज और परंपराओं को भी साथ ले जाते हैं। इसी कारण भारत की मूल संस्कृति और साहित्य से लोग परिचित हो रहे हैं और हिंदी साहित्य विश्व पटल पर विराजित हो रहा है।

आज वैश्विक स्तर पर भारतीय वंश के ऐसे कई साहित्यकार है जो भारतीय भाषाओं में साहित्य सृजन कर उसे वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए पाठकों का एक नया वर्ग तैयार कर रहें है। साथ ही वे हिंदी साहित्य का अन्य विदेशी भाषाओं जैसे फ्रेंच, स्पेनिश, अंग्रेज़ी, रूसी, जापानी, चीनी आदि में अनुवाद कर हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने में प्रयत्नशील हैं। इस क्रम में हिंदी साहित्य को भारत के बाहर विभिन्न हिंदी सेवी संस्थाएँ और रचनाकार लेखन कार्य कर साहित्य का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। हिंदी साहित्य में कुछ विशेष लेखक है जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने हेतु लगा दिया है। ऐसे ही साहित्यकारों को आज जानने की आवश्यकता है।

वैश्विक स्तर पर उषा प्रियंवदा ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने अमेरिका में रहते हुए हिंदी साहित्य को वहाँ की जनता के सम्मुख रखा। कानपुर में जन्मी उषा प्रियंवदा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पी-एच. डी. की पढ़ाई पूरी की। जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। फुलब्राइट स्कालरशिप लेकर वे अमरीका चली गईं। अमरीका के ब्लूमिंगटन, इंडियाना में दो वर्ष पोस्ट डॉक्टरल अध्ययन किया और १९६४ में विस्कांसिन विश्वविद्यालय, मैडिसन में दक्षिण एशियाई विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर अपना कार्य प्रारंभ किया। उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के भारतीय शहरी पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेश का संवेदनशील एवं प्रभावी चित्रण है। शहरी जीवन में रूमानियत के बरक्स उदासी, अकेलेपन, ऊब, मोहभंग आदि के चित्रण में इनके कथानक ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। इनके कहानी संग्रह हैं - ‘वनवास’, ‘कितना बड़ा झूठ’, ‘शून्य’, ‘ज़िन्दगी और गुलाब के फूल’, ‘एक कोई दूसरा’ आदि है। इनके उपन्यास है - ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेष यात्रा’, ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘अंतर्वंशी’, ‘भया कबीर उदास’ आदि।

भारत के साथ मॉरीशस में हिंदी साहित्य की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर वहाँ के निवासी हिंदी भाषा की सेवा में लगे हुए हैं। जिनमें विशेष रूप से हिंदी कथा-साहित्य के सम्राट अभिमन्यु अनत का ज़िक्र करना महत्वपूर्ण है। अभिमन्यु अनत की मुख्य रचनाएँ ‘कैक्टस के दाँत’, ‘नागफनी में उलझी साँसें’, ‘गूँगा इतिहास’, ‘देख कबीरा हाँसी’, ‘इंसान और मशीन’, ‘जब कल आएगा यमराज’, ‘लहरों की बेटी’, ‘एक बीघा प्यार’, ‘कुहासे का दायरा’ आदि है। इनके साहित्य में विद्रोह स्वर है और शोषण एवं अत्याचार के ख़िलाफ़ बेबाक अभिव्यक्ति है। बेरोज़गारी समेत कई समकालीन समस्याओं पर इनका लेखन प्रभावी है। हिंदी के अध्यापन एवं नाट्य प्रशिक्षण से जुड़े रहे अभिमन्यु अनत ने अपने विभिन्न हिंदी उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से मॉरीशस को समकालीन हिंदी साहित्य द्वारा परिचित करवाया है। उनके २९ से अधिक उपन्यास प्रकाशित हैं। उनका पहला उपन्यास ‘और नदी बहती रही’ १९७० में प्रकाशित हुआ। ‘अपना मन उपवन’, ‘लाल पसीना’ आदि उनके चर्चित उपन्यास हैं। ‘लाल पसीना’ १९७७ में प्रकाशित हुआ जो भारत से मॉरीशस आए गिरमिटिया मज़दूरों की मार्मिक कहानी कहता है। इस चर्चित उपन्यास का फ्रेंच में अनुवाद हुआ। इस उपन्यास के दो परवर्ती अंश प्रकाशित हुए, जिनके शीर्षक हैं - ‘गांधीजी बोले थे’ (१९८४) तथा ‘और पसीना बहता रहा’ (१९९३)। भारत से बाहर हिंदी में उपन्यास-त्रयी लिखने वाले वे अबतक के एकमात्र उपन्यासकार है।

भारतीय मूल की अमेरिकी उपन्यासकार, अभिनेत्री एवं शिक्षाविद सुषम बेदी कई उल्लेखनीय उपन्यासों और कहानी संग्रह की लेखिका है। इनके दो उपन्यासों ‘हवन’ और ‘वापसी’ का हिंदी से उर्दू में अनुवाद किया गया है। उनके द्वारा चलाया जा रहा ‘हिंदी भाषा शिक्षण कार्यक्रम’ (हिंदी लैंग्वेज पेडागोजी) एक उल्लेखनीय कार्यक्रम है जिसके द्वारा हिंदी भाषा की लोकप्रियता विदशों में भी बढ़ रही है। इनके उपन्यास ‘हवन’ का ‘द फायर सैक्रीफ़ाइस’ के नाम से डैविड रुबिन द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया जिसे ‘हेनमैन इंटरनेशनल’ ने १९९३ में प्रकाशित किया। इनका अन्य उपन्यास ‘इतर’ १९९२ में प्रकाशित हुआ। लघु-कथाओं का इनका संग्रह ‘चिड़िया और चील’ १९९५ में प्रकाशित हुआ। ‘कतरा दर कतरा’ १९९४ में प्रकाशित हुआ। इनके उपन्यास हैं - ‘लौटना’ (१९९२), ‘हवन’ (१९८९), ‘मोर्चे’ (२००६) आदि है। इन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध सहित कई विधाओं में महत्वपूर्ण लेखन कार्य किया है। हिंदी साहित्य में इनके योगदान को देखते हुए जनवरी २००६ में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।

इसी प्रकार ‘काला सागर’ (१९९०), ‘ढिबरी टाइट’ (१९९४), ‘देह की कीमत’ (१९९९), ‘ये क्या हो गया’ (२००३), ‘बेघर आँखें’ (२००७) जैसे चर्चित कहानी-संग्रहों के लेखक तेजेंद्र शर्मा ब्रिटेन के एक ऐसे कहानीकार हैं जिनके संकलन नेपाली, पंजाबी, उर्दू आदि भाषाओं में अनूदित और चर्चित हुए हैं। नाटक, फ़िल्म एवं अन्य साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहनेवाले तेजेंद्र शर्मा हिंदी में अपनी सक्रियता के पीछे अपनी दिवंगत पत्नी इंदु शर्मा की प्रेरणा बतलाते हैं। ‘ये घर तुम्हारा है’ (२००७) इनकी कविताओं एवं ग़ज़लों का संग्रह है। इन्हें ‘ढिबरी टाइट’ के लिये १९९५ में महाराष्ट्र साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इनकी कहानियों एवं कविताओं के अंग्रेज़ी, उर्दू, पंजाबी, नेपाली, मराठी, गुजराती, ओड़िया एवं चेक भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। इनकी कहानियों में मानवीय रिश्तों में मौज़ूद करुणा और संघर्ष के कई अंतर्द्वंद देखने को मिलते हैं।

ब्रिटेन की हिंदी साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका 'पुरवाई' की सह-संपादिका तथा हिंदी समिति यू. के. की उपाध्यक्षा रहीं उषा राजे की सक्रियता निश्चय ही सराहनीय है। ये तीन दशकों तक ब्रिटेन के ‘बॉरो ऑफ़ मर्टन’ की शैक्षिक संस्थाओं में विभिन्न पदों पर कार्यरत रहीं। इन्होंने ‘बॉरो ऑफ़ मर्टन’ के पाठ्यक्रम का हिंदी अनुवाद किया। इनके काव्य-संग्रह हैं - ‘विश्वास की रजत सीपियाँ’, ‘इंद्रधनुष की तलाश में’ आदि। इनके कहानी संग्रह हैं - ‘प्रवास में’, ‘वॉकिंग पार्टनर’, ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’। ब्रिटेन के प्रवासी भारतवंशी लेखकों का प्रथम कहानी-संग्रह ‘मिट्टी की सुगंध’ में इनकी कहानी को शामिल किया गया है।

पूर्णिमा वर्मन के संपादन में निकल रही हिंदी इंटरनेट पत्रिकाएँ ‘अभिव्यक्ति’ तथा ‘अनुभूति’ की सामग्रियों को ख़ूब सराहना और लोकप्रियता मिली। इनकी प्रमुख रचनाएँ ‘फुलकारी’ (पंजाबी में), ‘मेरा पता’ (डैनिश में), ‘चायखाना’ (रूसी में) आदि का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। इनके अतिरिक्त विश्व पटल पर हिंदी साहित्य को प्रस्थापित करने वाले साहित्यकारों में सुनीता जैन, सोमा वीरा, कमला दत्त, वेद प्रकाश बटुक, इन्दुकान्त शुक्ल, उमेश अग्निहोत्री, अनिल प्रभा कुमार, सुरेश राय, सुधा ओम ढींगरा, मिश्रीलाल जैन, शालीग्राम शुक्ल, रचना रम्या, रेखा रस्तोगी, स्वदेश राणा, नरेन्द्र कुमार सिन्हा, अशोक कुमार सिन्हा, अनुराधा चन्दर, आर. डी. एस ‘माहताब’, ललित अहलूवालिया, आर्य भूषण, भूदेव शर्मा, वेद प्रकाश सिंह ‘अरूण’, उषा देवी कोल्हट्कर, स्वदेश राणा आदि का नाम उल्लेखनीय है। इसी तरह मॉरीशस, अमेरिका, इंग्‍लैण्‍ड, चीन, जापान, फिजी, त्रिनिदाद आदि देशों में हिंदी साहित्‍य के विकास को लेकर व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर कई कार्य किए जा रहे हैं।

सराहनीय है कि वैश्विक स्तर पर सक्रिय लेखकों की यह एक अत्यंत छोटी सूची है। इस छोटे से विवरण के बारे में चर्चा करने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम हिंदी के वैश्विक परिदृश्य से कुछ अवगत हो सकें और उन्हें जान-समझ और पढ़ सकें। हिंदी का परचम निरंतर लहराता हुआ दिन-प्रति-दिन नित्य नई ऊँचाइयों को हासिल कर रहा है, ऐसे में विश्व के विभिन्न कोनों में सक्रिय रचनाकारों के बारे में विस्तार और करीब से जानने और उन्हें समझने की आज आवश्यकता है।

प्रियंका कुमारी (शोधार्थी)
हिंदी विभाग
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी,
हैदराबाद
संपर्क: 7010891901
ईमेल: priyanilpawan@gmail.com

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