08-01-2019

वह तैयार है

डॉ. शैलजा सक्सेना

ईवान का चेहरा पीला पड़ा हुआ था। हाथों में थरथाराने की कंपन थी। उसने अपनी फ़ाइलों और नोटबुक से अँटी मेज़ का कोना पकड़ लिया। कुछ पल वह ऐसे ही खड़ी रही। पीछे से उसे नैंसी का स्वर सुनाई दिया, “क्या हुआ ईवान?”

ईवान को न चाहते हुये भी उत्तर देना पड़ा, “कुछ नहीं, ब्रेक पर जा रही हूँ!” वह किसी के सामने अपने को बिखरने नहीं दे सकती।

अपनी हाँफती साँसों और काँपते हाथों को समेट वह धीमे कदमों से गलियारे में चली गई, ऑफ़िस की बारहवीं मंज़िल से एलिवेटर ले कर नीचे और फिर गलियारों से होते हुये इमारत के बाहर सीढ़ियों से उतर कर सड़क पर। इमारत के बिल्कुल बगल में ब्लूर स्ट्रीट का सब-वे स्टेशन है और उसके बाद यहाँ के लोगों का पसंदीदा कॉफी का अड्डा- “टिम हार्टन”। इमारत और सब-वे स्टेशन के बीच एक छोटा सा, चार-पाँच लोगों के खड़े होने का कोना है जो शायद इमारत की ज़मीन का ही हिस्सा है। उसमें इमारत के दफ़्तरों के सिगरेट पीने वाले लोग आ कर खड़े हो जाते और धुँए में बहुत कुछ उड़ाने की कोशिश करते। ईवान भी वहाँ आकर खड़ी हो गई। 

सितम्बर के आख़िरी दिन पतझर की सूचना दे रहे थे। पेड़ों की शाखों पर सुर्ख़ लाल-पीले पत्ते अपने जीवन के आख़िरी दिनों में पूरे सौन्दर्य और गरिमा के साथ लोगों को मोह रहे थे, साथ ही बहुत से पत्ते झड़ कर सड़क पर आ पड़े थे और उसी के रंग से मिल कर काले हो गये थे। जीवन बस आगे-पीछे चलने की ही कहानी है, कोई अभी शाख पर है तो कोई ज़मीन पर! कुछ लोग सिगरेट का धुँआ उड़ाते, दार्शनिक दृष्टि से इन पत्तों को देखते हुये शायद यही सोच रहे थे। ईवान के पास अभी यह सब सोचने की फ़ुरसत और ताक़त नहीं थी। उसने अपने काले स्वेटर से सिगरेट की डिब्बी निकाली और एक सिगरेट जला कर पीने लगी। इस समय सिगरेट उसकी मानसिक ज़रूरत थी। एक-दो कश ले कर उसे लगा कि उसने अपने काँपते हाथ-पैरों को कुछ सँभाला। वो पैरों के पास पड़े भूरे पत्तों की किरचों को देखने लगी। दो-तीन लोग उसके जान-पहचान के थे! सिगरेट पीने वालों में एक अबोली दोस्ती होती है और ईवान तो वैसे भी बहुत मिलनसार है पर इस समय वह अपना चेहरा सिगरेट के धुँए के बीच छिपा लेना चाहती थी। उसका मन अपने जीवन में आये ख़तरों से कडुआया हुआ था और वह नहीं चाहती थी कि आँखों से बरसते उसके क्षोभ को कोई और जाने या पढ़े। पत्तों के टूटे टुकड़े उसे काँच के टुकड़ों जैसे लगे जिन में उसका ख़ुद का बिखराव कौंध रहा था।

ऐसा क्यों होता है कि जीवन की सारी चढ़ाई और सारा विस्तार लौट कर उन्हीं बिन्दुओं पर सिमटने लगता है जहाँ से जीवन शुरू हुआ था। वही नौकरी का चक्कर..जिसे ढूँढ़ते ज़िंदगी शुरू हुई थी और शायद उसी की तलाश में यह चुकेगी! उसने एक लंबी साँस ली।

इस समय उसे अपनी उम्र के सारे वर्ष रीते और झूठे लगे। जो नियम सीखॆ थे, वे उल्टे पड़ गये! चालीस साल पहले विनम्रता, वफ़ादारी के जिन कॉरपोरेट नियमों को उसे ज़बर्दस्ती अपनाना पड़ा था और आज उन नियमों के कारण ही उसे लग रहा था कि वो समय से पीछे छूट गई है। कितनी चुभने वाली बात है कि ६४ साल की उम्र पर आ कर आप को पता चले कि पूरी उम्र ग़लत हो गयी! अब तक उसने अपने को, अपने काम को जो महत्ता दी थी, वह अब व्यंग्य से हँसती हुई लगी। उसे लग रहा था कि उसका स्वाभिमान उन पत्तों के चूरे जैसा हो गया है। 

आज उसकी मैनेजर ने वार्षिक मूल्यांकन (इवैल्यूएशन) के बाद उसे संकेत क्या लगभग नोटिस ही दे दिया था कि उसकी नौकरी जा सकती है। वह भौंचक्की रह गई थी। पिछले १० सालों से वह यहाँ काम कर रही है और यहाँ के लोगों और काम के बीच उसे बहुत कुछ घर सा लगने लगा था। अपनी उम्र और स्वभाव के कारण वह सब से बड़ी बन कर व्यवहार करती, चाहे वह मैनेजर हो या कोई अन्य साधारण स्तर की कर्मचारी की। किसी को उसके पसंद की कॉफी ला कर दे दी तो किसी को बहुत प्यार से भागने-दौड़ने के बीच बाल या मेकअप सँवारने की सलाह दे दी। इस से लोगों के चेहरे पर जो मुस्कुराहट आती, वह उसे अच्छी लगती। लोगों के “धन्यवाद” उसे ख़ुशी दे जाते। ऑफ़िस आने से उसे घर के घुटन भरे माहौल से आठ घंटे को छुट्टी मिल जाती और माँ के ताने सुनने की बजाय यहाँ लोगों की बातें सुनने में ज़्यादा रस आता। दस साल कैसे इस ऑफ़िस में निकल गये, पता ही नहीं चला! वो अपने को इस मँझोली आकार की कम्पनी के लिये बहुत ज़रूरी समझने लगी थी। आज ऐन ने उसे उसकी औक़ात दिखा दी! 

उसके भीतर कुछ उबलने लगा। जो धुँआ नाक से बाहर निकल रहा था उसकी आग पेट में कहीं गहरे जल रही थी। जिस पुर्नव्यवस्था (रीस्ट्रकचरिंग) की आड़ में उसे निकाला जा सकता था, वह इतना बड़ा भी न था कि उसकी जैसी कम आय वाली महिला को काम पर लगाये न रह सके जब कि वह कई विभागों से जुड़ी हुई थी, कई मायनों में उनका उगालदान ही थी.. कोई काम नहीं हो पा रहा, चलो ईवान को दे आओ, कोई चीज़ रखने की जगह नहीं है, चलो ईवान की मेज़ पर पटक आओ। स्टॉफ़ के लिये आई हुई सारी इन्वेंटोरी की ख़बर वो रखे, ऑफ़िस किचन से लेकर स्टॉफ़ को दिये जाने वाले हर सामान की लिस्ट, हर सामान की ख़बर उसे रहती थी, हर दूसरे हफ़्ते ऑफ़िस में नये स्टॉफ़ की ट्रेनिंग चलती थी, उनके सारे फ़ोल्डर्स तैयार करवाने से लेकर ट्रेनिंग की जगह तैयार करना, खाना ऑर्डर करना आदि-आदि उसकी अंतहीन लिस्ट के नियमित हिस्से थे। 

इन सबके अतिरिक्त अपनी आदत के चलते ईवान कोई न कोई नया काम अपने लिये निकाले रखती। वह यह अच्छी तरह जानती है कि उम्र के इस मोड़ पर नौकरी खोना आसान है, लेकिन नौकरी मिलना मुश्किल। यहाँ ऑटोरियो, कनाडा में नौकरी से रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं है इसलिये सेहत और सहूलियत के हिसाब से कोई भी किसी भी उम्र तक नौकरी कर सकता है पर सहूलियत किसकी? उसके जैसे क्लर्क और निम्न स्तरीय कर्मचारियों के इस प्रश्न का उत्तर अधिकारियों (मैनेजमेंट) के हक़ में ही होता है।

मैनेजर, ऐन ने उस को इतनी बड़ी चोट देने से पहले सहानुभूति जताने की कोशिश की थी। ईवान, ऐन और उसके परिवार के लिये क्रिसमस पर तोहफ़े लाती यहाँ तक कि एक बार उसने क्रोशिया का मफ़लर भी ऐन को बना कर दिया। लंबी मीटिंग के बाद जब ऐन अपने कमरे में पहुँचती तो वह उस के लिए कॉफी और डोनट लेकर पहुँच जाती... और तब अपनी भागती ज़िंदगी से थकी हुई ऐन ऑफ़िस और घर के दुखड़े उसे सुनाने लगती। वह जानती थी कि ईवान इन बातों को किसी से नहीं कहेगी इसी से कई बार सिर तक पहुँचे अपने दुख के काले पानी को वो ईवान के सामने बह जाने देती। ईवान धैर्य से सुनती और कई बार कारगर सलाहें भी दे देती।

आज वह ऐन को मानवीय होने की सलाह देना चाहती थी। सहज मानवीयता एक मूल्य है जिसे सिखाया नहीं जा सकता, कितने भाषण दे लो, कितने वर्कशॉप कर लो। किसी में यह होती है तो होती ही है और नहीं होती तो नहीं ही होती पर इन सब बातों का भी अब कोई मूल्य नहीं रह गया। मामला सारा आमदनी और ख़र्चे का है। तन्ख्वाह जितनी दी गई है, उससे चार गुना अधिक काम न करवाया तो क्या किया। यह काम मानवीयता से हो, आवश्यक विनम्रता दिखाने से हो, कड़े बन कर हो या अक्खड़ बन कर, अंतत: मतलब काम से है। मूल्यांकन की इस मीटिंग में ऐन ने कई बार ईवान को अपनी विवशता बताई कि उसे ऊपर, अपनी मैनेजर से विभाग के संगठन के बारे में हिदायत आई है। रटी-रटायी बातों को दोहराते हुये ऐन ने कहा था; “कम्पनी ईवान के काम की महत्ता को समझती है पर नयी संकल्पना में कम्पनी अपने ख़र्चे कम करने की चेष्टा कर रही है, इस लाभ को देखे बिना कम्पनी आगे नहीं बढ़ सकती”! ऐसा कहते हुये ऐन के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ऐन मँजी हुई व्यावसायिक महिला है, वह जानती है कि अगर आज वह ईवान के साथ सहानुभूति दिखायेगी तो कल उसकी अपनी कुर्सी ख़तरे में होगी। उसने ईवान को यह समझाने की चेष्टा की कि कम्पनी के नये सॉफ़्टवेयर से बहुत से आंकड़े और सूचनायें आसानी से “सिस्टम” में डाली जा सकती हैं और इस कारण बहुत से काम वापस विभिन्न विभागों को दे देने की बात हो रही है। इस नई संकल्पना के चलते केवल ईवान ही नहीं, बहुत से कर्मचारियों के भी निकाले जाने की संभावना है। ऐन ने उसे सांत्वना देते हुये कहा था कि उसे अभी तुरंत ही नहीं निकाला जा रहा परन्तु अगले ६ महीने में कम्पनी में बहुत से परिवर्तन किये जायेंगे। उसने समझाया था कि यह व्यवसाय के नियमों के अनुकूल की जाने वाली प्रगति है अतएव वह उसे “पर्सनली” (व्यक्तिगत रूप से) न ले’। ईवान इस बात पर कुछ रोष से बोली थी, “पर्सनल’ तो यह है ऐन, मेरी अपनी ज़िंदगी पर जिस बात का असर पड़े, वह पर्सनल ही होगी न!”

ऐन ने समझाना चाहा था, “मतलब किसी व्यक्तिगत नाराज़गी के तहत यह बात नहीं होगी, बल्कि कम्पनी की नीति के कारण होगा।”

ईवान ने ये बातें अनेकों बार व्यापार संबंधी लेखों में पढ़ी हैं, टी.वी. की ख़बरों में सुना है और ख़ुद भी झेला है कि कैसे कम्पनियाँ आगे बढ़ जाती हैं पर उसके लोग पीछे रह जाते हैं, अपने भाग्य में उड़ती धूल और जूते चटकाती बेरोज़गारी से जूझते! इस उम्र में शायद यह सच ज़्यादा चोट दे रहा था। 

 

१९ साल की उम्र से वह काम कर रही है। उसकी सबसे पहली नौकरी एक “कैफे” में चाय बनाने/ पिलाने की थी, दो साल उसने वह काम किया। अचानक एक दिन उस कैफे के मालिक ने घोषणा की कि अगले दो सप्ताह में वह यह कैफे नुकसान होने के कारण बंद कर रहा है, तब वह अपने माता-पिता के साथ ही रह रही थी। एक भाई और वह, यही छोटा सा परिवार था। इस अचानक आयी विपदा से लड़ने के लिये उसके पिता का सहारा उसके पास था। उन्होंने ही उसे समझाया था और कह-सुन कर उसका दाखिला “ऑटो कैड” के कोर्स में करवा दिया था। वे ख़ुद उस समय बिल्डिंग बनाने वाली कंपनी में काम करते थे और सोचते थे कि अगर ईवान यह कोर्स कर लेगी तो उसे एक अच्छी नौकरी मिल सकती है। उनकी बात सही थी, उसने एक लंबे अरसे तक एक कम्पनी में नौकरी की......लगभग २५ साल, फिर वह कम्पनी बिक गई और उसे नये सिरे से बदलती दुनिया के लायक़ बनना पड़ा। यह वो दुनिया थी जो हर साल नये फोन और हर दूसरे साल कम्प्यूटर में नयी विंडोज़ यानी खिड़कियाँ खोल कर जीवन की सहूलियत को बढ़ा रही थी पर ईवान इस दुनिया में बहुत असुविधा महसूस कर रही थी पर फिर भी उसने खिड़कियाँ खोलीं!! शुरू होने पर ही समाप्त होने के रहस्य को कम्प्यूटर के “स्टार्ट’ बटन से समझा और फिर इस तिलिस्म के कुछ पहलुओं को समझ कर उसने ज़िंदगी एक बार फिर पटरी पर बैठायी। उसे लगता था कि उसकी मैनेजर उसके काम से ख़ुश है। अक्सर ऐन उसे धन्यवाद भी देती कि जिन कामों पर किसी की निगाह नहीं रहती, वे काम भी ईवान के कारण ठीक रहते हैं! ईवान पहले से ऐन या अन्य संबंधित व्यक्तियों के लिये सब फ़ाइलें तैयार कर के रखती और जब ऐन, मीटिंग से ठीक पहले हड़बड़ायी सी उसके पास आती तो अपेक्षा के अनुसार उसे ईवान से मीटिंग संबंधित सारे प्रिंटिड काग़ज़ तैयार मिलते। कितनी ही बार वह शाम को देर तक रुकी, कितनी ही बार अपनी ड्यूटी के बाहर के काम उसने सँभाले, उसके विभाग की नैंसी, डॉना और इलेन उसे मना भी करती थीं कि अपनी ड्य़ूटी के बाहर के काम मत किया करो, अपना लंच टाइम लो, पर अपनी आदत के अनुसार वह इसकी-उसकी ज़रूरत पूरा करते हुये ही वह अपना लंच का समय बिता देती थी। उसे लगता कि ये नई लड़कियाँ हैं, “ओल्ड स्कूल” की काम करने की मूल्यधर्मिता से अपरिचित!! उसे गर्व था अपने काम पर और काम और कम्पनी के प्रति अपने स्नेह पर!!

अब??? ईवान अपने से जूझ रही थी! आ गई उसकी “ओल्ड स्कूल” वैल्यूज़ काम में??? वो उबल रही थी। मन कर रहा था, ऐन के सामने जा कर बैठ जाये और बहस करे कि किस बात के लिये उसे यह नोटिस सा दिया जा रहा है? उसके काम में कोई कमी है? उसने कभी मना किया किसी काम के लिये??

वैसे ऐन ने कोई तारीख़ नहीं दी उसे निकालने की पर इस-उस तरह से यह तो कह ही दिया है कि नौकरी ख़तरे में है उसकी! यह उसके स्वाभिमान को आहत कर रहा है, वो किसी से कम नहीं, फिर भी उसे……??? अंदर से रुलाई उमड़ रही थी। खड़े-खड़े उसने २ सिगरेट फूँकी या तीन, उसे पता नहीं….१५ मिनट की जगह वो शायद आधे घंटे का ब्रेक ले चुकी थी पर हर बार की तरह वह हड़बड़ाई नहीं! 

पहले कभी ब्रेक लंबा हो जाता तो उसे लगता कि कोई न कोई उसे ज़रूर ढूँढ़ रहा होगा और उसे ऑफ़िस के घंटों में हर समय उपलब्ध होना चाहिये! इन्हीं बातों के चलते बहुत से लोग उस पर हँसते भी थे कि ईवान का बस चले तो वह ऑफ़िस में ही सोए कि शायद किसी को कुछ चाहिये होगा और काग़ज़ों और हर तरह के सामान से लदी उसकी मेज़ पर तो उन्हें कुछ मिलने से रहा। यह मेज़ विभाग के बाकी सहकर्मियों के लिये सिरदर्दी पैदा करती थी कि इसके चलते उनका कमरा सुन्दर नहीं दिखता पर वह सबको झिड़क देती थी कि “मेरी मेज़ है, मेरा सामान है, तुम लोगों को क्या? अपनी मेज़ साफ़ रखो”!!

एलिवेटर से ऊपर आते हुये वह अपने पर हँसी, “मेरी मेज़!! मेरा सामान!!” किस पर ग़ुरूर करे, जिस काम पर ग़ुरूर करती थी, वह किसी को पसंद नहीं आ रहा, जिस मेज़ को “भानुमती के कुनबे” की तरह सँभाले बैठी थी, वह भी उसका नहीं और सामान, फ़ाइलें तो हैं ही नहीं उस की!! ये साथी जो आज बहुत सगे की तरह दिखते हैं, जिनके साथ वह दिन के ८ घंटे हर रोज़ बिताती है, उस दिन तक ही सगे हैं, जब तक नौकरी है, नौकरी गई कि सब ख़त्म!! ऐसा नहीं कि वह यह जानती नहीं, पर जानने, मानने, भोगने और अनचाहे को सहने में बहुत अंतर होता है और ईवान का मन यह चोट भोग रहा था, सह रहा था।

पिता के जाने के बाद से उसे अपने परिवार से केवल रुखाई ही मिली थी। २४ की उम्र में उसका तलाक हुआ था, तब निकी दो साल का था। अपनी मर्ज़ी से जल्दबाज़ी मचा कर उसने शादी की थी और फिर पूरी उम्र उसके फल निकी को अकेले हाथ पाला। अपने बारे में सोचने का ध्यान बहुत कम आया क्योंकि निकी के बड़ा होते-होते तक पिता बीमार रहने लगे। ईवान को अपने पिता से बहुत लगाव था, उनके न रहने के बाद माँ की पुरानी रुखाई, कड़वे शब्दों में पूरे ज़ोर से लौट आई थी, साथ ही छह साल पहले घर से किनारा कर गया भाई भी अपनी बीबी-बच्चे समेत लौट आया था। पिता की पाँच साल की बीमारी में जिसका एक फोन नहीं आया, पिता की मृत्यु के पाँच महीने बाद वो लौट आये, हैरान ही रह गई थी ईवान। वो सोचती-दुनिया भी बड़ी शातिर चीज़ है! कैसे पता चल गया भाई को कि पिता नहीं रहे? माँ अपने प्यारे बेटे को पाकर पति के जाने का दुख भूल गई थी। दिन-रात माँ–बेटे की खिचड़ी पकती। पर माँ भी बुढ़ापे के कारण एक न एक रोग से परेशान ही रहतीं और अपना सारा ग़ुस्सा ईवान को ताने मार कर और नीचा दिखा कर निकालती। अपनी असुविधा का सोच कर भाई ने घर पर उनके साथ रहने की नहीं सोची, वही ग़नीमत थी! अगर भाई की निगाह उनके घर पर है तो ले ले वो मकान! यह पिता का मकान है, अपना घर तो माँ-बाप की देखभाल के ख़्याल से कभी उसने बनाने की कोशिश भी नहीं की। निकी भी वहीं पला-बढ़ा और अब तो उसकी ज़िम्मेदारी भी ईवान पर नहीं है। शादीशुदा है, अपना खाता-कमाता है और अलग रहता है। नानी की बकझक से परेशान और अपनी माँ की चुप्पी से नाराज़! एक लंबी साँस छोड़ी ईवान ने, सबको मनाते-मनाते, सबका ध्यान रखते-रखते अब वह थक गयी है।

उसके भीतर कुछ चटक रहा था, कसक रहा था….रहें लोग उस से नाराज़, जाये नौकरी …! वह सबके बिना जी लेगी। वह सोचने लगी कि कैसे हैं ये “कारपोरेट नियम”? कैसी है यह आज की दुनिया? पहले एक संस्था में काम करने वाले लोग एक दूसरे को सहारा देकर चलते हुये एक टीम की तरह से होते थे, वे अपना सुख-दुख बाँटते, साथ-साथ हँसने-रोने वाले लोग थे। ये नये लोग कहते हैं ’चुप रहो, अपने काम से काम रखो और जितना काम तुम्हारे ज़िम्मे है, उतना ही करो”। इसके चलते तो सारी संयुक्त भावना ही ख़त्म हो जाती है, सब एक दूसरे के गले पर पैर रखकर आगे बढ़ने को तैयार हैं, एक-दूसरे को उठाकर साथ चलने की बात तो दूर रही। क्या पहले तरक़्क़ी नहीं हो रही थी पर अब?? लेकिन उसके सोचने से क्या होता है? जब “ओल्ड स्कूल” ही नहीं रहा तो उनकी “वैल्यूज़” (मूल्य) लेकर वो क्यों बैठी है। वह पसंद करे या नहीं, पर यही समय का सच है जो ईवान की आँखों के सामने अपने पूरे नग्न रूप में खड़ा है। उसे लग रहा था कि उसकी पूरी ज़िंदगी भ्रम में निकल गई कि कुछ लोग हैं जो उसके अपने हैं, घर में भी और बाहर भी। भ्रम ही तो था, लेकिन घर पर निकी ने और अब ऐन ने बता दिया था कि समय बदल गया है, अब यह उसके निर्णय का समय है कि वह बदलना चाहती है या टूटना? 

इस साल निकी क्रिसमस पर भी घर नहीं आया था, केवल फोन कर के शुभकामनायें दे दी थीं। उसके पूछने पर कि “क्या वह घर नहीं आयेगा?” केवल इतना ही कहा था उसने कि अगर ईवान चाहे तो वह उनके साथ, उसकी पत्नी किम के घर क्रिसमस डिनर पर आ सकती है पर वह अब नानी के ताने नहीं सुन सकता!” ईवान बहुत आहत हुई थी। फिर स्वाभिमान ने उसकी गर्दन जैसे आधा इंच और तान दी हो, सधे स्वर में उसने कहा था, “बुढापे में उन्हें क्रिसमस के दिन अकेले छोड़ कर वह घर से बाहर कैसे जा सकती है”। वह जानती है कि निकी ने खिन्न हो कर फोन पटक दिया था कि “तुम कभी नहीं बदलोगी”। जिस माँ के पीछे उसने बेटे का दिल दुखाया था, उसने क्रिसमस पर बनाये उसके विशेष खाने की थाली, एक कौर के बाद सरका कर कहा था कि “इस बुढापे में तो अच्छा खाना बनाना सीख, इतना ख़राब खाना तो कोई कुत्ते को भी नहीं खिलाता”। उस पूरी रात वह तकिये में मुँह छिपाये रही थी। उस दिन भी उसे लगा था कि “बस, बहुत हो गया अब!”

अपना पूरा जीवन उसे आँखों के आगे घूमता लगा। किस गर्व में जी रही है वो? यह गर्व ही अब उसके लिये दलदल बन गया है। इस से उसे बाहर आना ही होगा। वह न इतनी बूढ़ी है और न इतनी कमज़ोर कि अपने को बदल न सके। वो चाहे और मेहनत करे तो कोई दूसरी नौकरी भी उसे मिल सकती है! ऐसे थोड़े ही हिम्मत हार कर वह बैठा जाता है! वह अपने को साधने लगी, समेटने लगी!!

 

कुछ दिन और बीते, सबको ईवान में बहुत परिवर्तन दिखाई दे रहा था। वह अपने काम से काम रखती और अपनी ड्यूटी के बाहर के कामों के लिये मना कर देती। सबकी छोटी-छोटी सुविधाओं का अनायास ध्यान रखने वाली ईवान जैसे अपने में गुम हो गयी थी। अपने मेज़ की फ़ाइलों में से अनावश्यक फ़ाइलें उसने निकाल दीं और जो दूसरे विभागों की ज़रूरी फ़ाइलें थीं उन्हें संबद्ध विभागों में पहुँचा दिया। हरेक के लिये पिन से लेकर स्टेपलर आदि अपनी मेज़ पर रखने वाली ईवान ने ये सब सामान अपनी मेज़ से हटा कर ऑफ़िस स्टोर पहुँचा दिया। वह अपने से पूछती कि “वो क्यों सबकी माँ बनी बैठी है?” जिसको जो चाहिये, अपने आप उसका प्रबंध करे। उसे अब “प्रोफ़ेशनल” बनना था, इन बड़ी मैनेजरों जैसे। अब ऐन के फोन आने पर ही वह उसके कमरे में जाती, पहले की तरह कॉफी और डोनट लेकर उस के पास नहीं पहुँचती। जितना कम बोलो, उतना ही अच्छा! इस होड़ की ज़िंदगी में कब कौन किसके मुँह से निकली बात को मुद्दा बना कर गला काटे, क्या पता? 

लंच के समय वह बिल्डिंग से बाहर चली जाती और पूरा समय बिता कर ही वापस लौटती। १५ दिन में उसने अपनी मेज़ साफ़ कर ली, अपने सारे कागज़ों, फ़ाइलों को ठीक करके, अपने सारे कामों की लिस्ट बना ली, इस लिस्ट ने उसे भी हैरान कर दिया कि कितने ही काम वह अपने सिर लिये है, “कोई कर के तो दिखाये” का गर्व भी एक बार जागा! काम करने वालों के लिये काम की कोई कमी नहीं होती! वह अपने टूटे अक्स जोड़ रही थी, बस, मन वाला हिस्सा उसने चुपके से निकाल कर अपने लिये रख लिया था। वह बार-बार मन में दोहराती जैसे अपने को यह बात रटा रही थी कि रिश्तों को दूर से ही बरतना चाहिये, चाहें वे घर के रिश्ते हों या काम पर बने रिश्ते! 

उसकी मेज़ पर अब कुछ ही फ़ाइलें रह गयीं थीं जिनमें से एक वह भी थी जिसमें उसने अपनी सारी ज़िम्मेदारियों और कामों की लंबी लिस्ट नत्थी कर दी थी। कल को कोई पूछे कि “तुम्हारा क्या रोल है और क्या-क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं तो वह उन्हें फ़ाइल पकड़ा कर कहेगी कि “ख़ुद पढ़ कर देख लें, उसके लिये सब कुछ बताना कठिन होगा”! 
साफ़ मेज़ की तरफ़ देखते हुये उसके चेहरे पर एक उजली सी मुस्कान खिल आई! अब वह तैयार थी। 

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