उसने कहा

16-10-2014

मैंने उस दिन ऐसे ही कहा कि-
तुम बड़ी चालाक हो,
सब के साथ कोई न कोई रिश्ता बनाकर रखती हो

 

इस पर उसने फिर कहा –
तुम्हारे साथ कौन सा रिश्ता है?

 

मैंने कहा –
प्यार, विश्वास और दोस्ती का

 

उसने कहा -
प्यार मैं तुम्हें करती नहीं
विश्वास तुम मेरा तोड़ चुके हो
और जिस पर विश्वास न हो,
वह दोस्त कैसा?

 

उसकी बातें कड़वी थीं,
पर सच्ची थीं
मेरी ख़ामोशी ने,
उसे पिघलाया और वह बोली –

 

मेरा तुम्हारे साथ अतीत का रिश्ता है,
जो वर्तमान में अपनी पहचान खो चुका है
लेकिन मेरा वर्तमान और भविष्य,
मेरे अतीत से बेहतर नहीं है
और हो भी जाए तब भी,
अतीत की बातें मैं,
भूल नहीं सकती
क्योंकि मैं –
सबके साथ, कोई न कोई रिश्ता
बना कर रखती हूँ।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

शोध निबन्ध
साहित्यिक आलेख
सामाजिक आलेख
कविता
कविता - क्षणिका
कहानी
विडियो
ऑडियो