उदयाचल: जीवन-निष्ठा की कविता 

15-04-2020

उदयाचल: जीवन-निष्ठा की कविता 

डॉ. राजेन्द्र  वर्मा

समीक्ष्य पुस्तक : उदयाचल (काव्य-संग्रह)
लेखक : कुँवर दिनेश
प्रकाशक : नमन प्रकाशन 4231/1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002)

जीवन प्रत्येक व्यक्ति के लिए रहस्य है। अज्ञेय ने ‘कितनी नावों में कितनी बार’ नामक अपनी प्रसिद्ध कविता में जीवन के इसी रहस्य को अभिव्यक्ति दी है। जीवन को जानने की कोशिश में ही ज्ञान-विज्ञान के विविध विषयों का विकास हुआ है। कविता में जीवन के अनुभूत्यात्मक पक्ष को अभिव्यक्ति मिलती है। कुँवर दिनेश की कविता व्यापक जीवन दर्शन से जुड़ती है, वह जीवन से ही सत्व प्राप्त करती है और जीवन को ही संप्रेषित हैं। ‘स्वप्न’ नामक कविता में कुँवर दिनेश ने सृजनात्मकता की उर्वर भूमि को चिह्नित कर दिया है, जब वे कहते हैं— “कर सकते हो रचना / तुम भी संसार की / यदि है तुम में क्षमता / स्वप्न देखने की, / है स्वप्न ही— / सर्वथा मौलिक रचना।”(पृ. 18) इस प्रकार स्वप्न देखना और सृजन करना कुँवर दिनेश का स्वभाव भी है और संस्कार भी। उनके अनुसार सर्जना स्वप्न की दुहिता है। कुँवर दिनेश अंगरेजी के सुप्रतिष्ठित कवि हैं किन्तु हिन्दी-भाषी होने के नाते हिन्दी भाषा पर भी उनका सहज और समान अधिकार है। ‘उदयाचल’ कुँवर दिनेश का हिंदी माध्यम में रचित तीसरा काव्य-संग्रह है। 

जब ‘निश्चय’ नामक चार पंक्तियों की कविता में वे कहते हैं कि ‘दरिया सी आदत बना ली है मैंने,’ तो समझ में आता है कि उनके सहज-सृजनशील हृतल में भावों और विचारों का प्रवाह निरंतर और अनायास बहता रहता है। किन्तु कुँवर दिनेश केवल भावनाओं में बहने वाले कवि नहीं हैं वे बहुश्रुत हैं, बहु-पठित हैं, जागरूक हैं, सक्रिय हैं इसलिए उनकी नज़र सितारों पर भी है (अक्रियता-पृ.13)। अर्थ यह कि कुँवर दिनेश ने एक बौद्धिक समझ भी विकसित कर ली है और उनकी काव्य-मेधा हृदय रूपी धरती और बुद्धि रूपी आकाश के विस्तृत क्षेत्र की अंतर्यात्रा करती है। उनका सम्पूर्ण कृती-व्यक्तित्व आकाश की ओर अनावृत, अग्नि की ओर उन्मुख है तथा धरती, वायु और जल से जीवन-सत्व ग्रहण करते हुए भी काव्य-सृजन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को रहस्यमयी मानता है (पृ.14-15)। स्वप्न और सृजन का यह सम्बन्ध स्वतःसंभूत और रहस्यमयी है। ऐसा कहते हुए वे स्वयं ही स्वच्छंद कवियों की श्रेणी में आ जाते हैं। कुँवर दिनेश संकुचित अर्थों में वादी, पक्षधर अथवा प्रतिबद्ध कवि नहीं हैं। उनकी प्रतिबद्धता अपनी सृजनशीलता के प्रति है। उनके आरंभिक काव्य-संग्रहों की कविताओं की अभिव्यक्ति और भाषा को देख कर भी यह स्पष्ट हो जाता है। एक और अर्थ में यही “अक्रियता” नामक कविता मानव जीवन के द्वैत को भी व्याख्यायित करती है। मानव अस्तित्व की व्याख्या केवल भौतिक दृष्टि से नहीं हो सकती किन्तु वस्तु-सत्य जानने के लिए भौतिक अस्तित्व की अनिवार्यता भी है। क्या अद्वैत की परिकल्पना द्वैत की समझ की निष्फल परिणति की ही उपज है? कवि जब कहता है की वह आकाश की ओर अनावृत है किन्तु उसे परासरित करने में असमर्थ है अथवा अग्नि की ओर उन्मुख है किन्तु उसे स्पर्श करने में अक्षम है इत्यादि, तो वह सामान्य व्यक्ति की उस वेदना की भी अभिव्यक्त करता है जिसके कारण उसके तथाकथित सीमित बोध के कारण उसको अज्ञानी ठहरा दिया जाता है। “देवदारु” कविता में भी जीवन के गूढ़ अर्थ को पकड़ने का सार्थक प्रयास किया गया है। फूल जहाँ अल्पावधि के लिए सुगंधी बिखेर कर काल का ग्रास बन जाते हैं, वहीं देवदारु हरित-भरित रह कर जीवन का ही सीवन करते हैं। फूलों की तुलना में देवदारु को रख कर सामान्य व्यक्ति और उच्चाशय व्यक्ति द्वारा गृहीत जीवन के अर्थ की तुलना करते हुए जीवन को वृहतर सन्दर्भ में देखने-समझने-समझाने की चेष्टा की गई है। युवाओं के लिए एक समझाइश भी है। अन्तर्हित लक्षणा श्लाघनीय है।(पृ.16-17)

“महासागर” नामक कविता में कवि ने उनके व्यक्ति की महासागर की-सी व्यग्रता, विलोल, आतुरता और अधीरता को समझने के लिए आमंत्रित किया है। सागर की बाहरी स्थिरता, प्रशान्तता उनके व्यक्तित्व के सम्पूर्ण आयाम को प्रदर्शित नहीं करती है। अंतर का स्वानुशासन, संयम, मर्यादा और संकल्प ही वास्तविक सत्व है। उस बोध को गृहीत करने की अधीरता भी वहाँ विद्यमान है अर्थात् एक अंतःसंघर्ष वहाँ विद्यमान है और वांछित अनुशासन भी। “लहरों का संघर्ष” नामक कविता में भी व्यष्टि के जीवन संघर्ष की भावात्मक अभिव्यक्ति हुई है। “मिथक : एक नदी” नामक कविता में वस्तुतः मिथकीय दृष्टि से सम्पूर्ण जीवन की संकल्पना को अभिव्यक्ति मिली है। कुँवर दिनेश का भारतीय अध्यात्म की ओर सहज आकर्षण है किन्तु कदाचित् वे इस वास्तविकता के कारण दुखी भी हैं कि धार्मिक रूढ़ियों के घटाटोप के कारण सामान्य मानव, जीवन के वास्तविक रस से वंचित है। इसीलिए भयंकर भूचालों, तूफानों, प्रलयंकर बाढ़ों से असहाय दीनों-निर्बलों की चीख़ पुकार उन्हें असहनीय है और वे कहते हैं— “मुझसे नहीं देखा जाता यह सब / चुप-चुप रह कर— / क्योंकि मैं नहीं हूँ भगवान— / स्थितप्रज्ञ असीम धैर्ययुक्त, / प्रत्येक स्थिति-परस्थिति में / समभाव युक्त— / मैं नहीं हूँ ईश्वर” और जब कवि कहता है कि— “हर प्रातः मैं / पैदा होता हूँ, / हर सायं मैं / मर जाता हूँ, / हर रोज़ मैं / जीता हूँ— / नया एक जीवन” (पृ. 35-36) तो समझ में आता है कि वे निर्लिप्त जीवन जीना चाहते हैं, किन्तु जीवन से पलायन करके नहीं। इसीलिए मानव-जाति के समक्ष उपस्थित तमाम प्रश्न कवि को झकझोरते हैं और कवि को यह भी असहनीय है की कुटिल चीते, भेड़िये, बिच्छू, कौए, सर्प, सियार प्रकृति के मक्कार लोग फलते-फूलते रहें और कपोत, गाय, गौरैये, मृग, कीट-पतंगे की तरह निरीह लोग उनका शिकार बनते रहें।(वही)

कोई संदेह नहीं कि सर्वहित से परिचालित ऐसी उच्चाशय, उदारचेता, सदाशय मनीषा कई बार ‘उदयाचल’ के मानिंद निमित्त रूप में सबको प्रकाश बांटने के बावजूद उसी प्रकाश को सबसे बाद प्राप्त कर पाता है, जब वही सूर्य पश्चिमी क्षितिज पर डूबने को होता है। सम्पूर्ण संग्रह की कविताओं में अभिव्यक्त विचार-श्रृंखला की कड़ियों को जोड़ते हुए देखें तो व्यंग्य कदाचित् यह भी कि भले ही हमने राजनीतिक व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र को अपनाया है, किन्तु राजकीय स्थिति सामंती-धार्मिक गठजोड़ के ज़माने से भिन्न नहीं है और अभी भी व्यवहार में ‘अँधा बाँटे रेवड़ी मुड़-मुड़ अपने को दे’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। किसी भी नेता में इतना धैर्य और क्षमता नहीं है कि वह उदयाचल बन कर पहले सूदूर पश्चिम को प्रकाशमान होने दें। निमित्त रूप में जो कुछ भी उपलब्ध है, उसको सब के बीच में बाँट कर जो कुछ शेष रह जाए उसको ईश्वर का प्रसाद मान कर ग्रहण कर तृप्त हो जाना यह भाव भारतीय मातृत्व की पहचान है, किन्तु राजनीतिक और शासकीय वर्ग को यदि यह बात समझ में आ जाए और प्रभु बनने की महत्त्वाकांक्षा समाप्त हो जाए तो फिर यह धरती स्वर्ग ही बन जाए और तब साधारण मनुष्य के लिए स्वर्ग और मुक्ति की अभिलाषाएँ भी कदाचित् निरर्थक हो जाएँ और ईश्वर के नाम पर चल रहा सारा कारोबार भी समाप्त हो जाए।(पृ. 39-40) इसीलिए कवि घोषणा करता है— ‘मैं नहीं हूँ ईश्वर’(पृ.35) और शायद ईश्वर की ज़रूरत ही नहीं यदि हम प्राप्त ऐश्वर्य का मानवीय भाव से उपभोग करें। “दिवस, निशा और हम” नामक कविता में भी मनुष्य की स्वार्थ-लिप्सा और पक्षपात को बहुत ही व्यंजक रूप में अभिव्यक्ति मिली है। कोई आश्चर्य नहीं है यदि इस स्थिति में “निशा” सुदूर एकांत शून्य आकाश में स्थित शुक्रतारे को अपना प्रिय मान ले। 

आत्मा और परमात्मा के प्रश्न को “अधिकार-कर्तव्यम्” (पृ. 46-47) नामक एक और कविता में कवि ने चुनौती दी है। पंछी रूपी आत्मा द्वारा शरीर रूपी नीड़ का उपयोग करने के बाद संघर्ष से क्लांत मन और शरीर को छोड़ कर चले जाना आखिर जीवन के संघर्ष को निरर्थक साबित नहीं कर देता? और इसीलिए कवि बार-बार सामान्य मानवी के साथ खड़े हो कर उनकी अभिलाषाओं को वाणी देता है— “मेरे उर में है / अतृप्य इच्छा— / एक ऐसे पूर्णचन्द्र की / जिसका कभी क्षय न हो,/......एक ऐसे दिवस की / जिसका अन्धकार में विलय न हो, /..... एक ऐसे नभ की / जिसका क्षितिज अनन्त न हो, /....एक ऐसे तन की / जो नश्वर न हो, /....एक ऐसी आत्मा की / जो निराकार न हो,”(पृ. 32-33)। इन में कुछ ऐसी सदिच्छाएँ भी हैं जिनसे बड़े विपर्यय की सम्भावनाएँ हैं अथवा वे कुछ आध्यात्मिक, आत्मिक मान्यताओं को मानो चुनौती दे रहे हैं— यथा इच्छा “एक ऐसे नभ की / जिसका क्षितिज अनन्त न हो,”— अर्थात् सांत हो अर्थात् यदि नभ-पुरुष, अस्तित्व का प्रतीक तो उसको जानना प्रत्येक व्यक्ति की सीमा में हो या कि यह उन अवधारणाओं को चुनौती है जो जीवन की व्याख्या करते हुए उसे सामान्य मानव से बहुत दूर ले जाते हैं और जीवन जीने के उसके प्रयासों को तुच्छ साबित करने का प्रयास करते हैं। इच्छा “एक ऐसी आत्मा की / जो निराकार न हो,”— यह भी काफ़ी उलझन भरी आकांक्षा है किन्तु ज्ञानालोक के अनुसंधान में क्या बहुत कुछ ऐसा नहीं है जो सामान्य मानवी से बहुत दूर बताया गया है और उस तक पहुँचने के लिए आपको किसी को प्रभु मानना ही पड़ेगा नहीं तो वह लक्ष्य हस्तगत नहीं हो सकता। इतना तो स्पष्ट है कि कवि जीवन के प्रश्नों से बड़ी शिद्दत के साथ जूझ रहा है। इच्छा “एक ऐसे तन की / जो नश्वर न हो,” — इस विपर्यय से क्या हासिल किन्तु यदि इन इच्छाओं को बहुत बौद्धिक-आध्यात्मिक आयाम में अनूदित करने का प्रयास न किया जाए, तो भी इनमें इस मर्त्य-लोक में लोगों द्वारा ओढ़ ली गई जटिलताओं— जिसके कारण लोगों में आमतौर पर शांति और आत्मिक समृद्धि का अभाव है, को सुलझाकर जीवन को सुन्दर बनाने की आकांक्षा सर्वोपरि है। 

इतिहास, संस्कृति, शिक्षा, संस्कार से मनुष्य का जीवन वस्तुतः जटिल हुआ है। हर व्यक्ति विचित्र चरित्र बन गया है। वह राजा भी है तो भिक्षु भी, आस्तिक भी और नास्तिक भी, धार्मिक भी है तो विधर्मी भी, द्वैतवादी भी है तो अद्वैतवादी भी। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व पर अनेक परतें चढ़ गई हैं, जिससे वह अपने वास्तविक अस्तित्व की पहचान नहीं कर पाता। कवि संकेत करता है कि— “मेरे एक चेहरे में / हैं चेहरे अनेक— / अत एव स्वयं को मैं / कहता हूँ— / हम।”(पृ. 50) इस आतंरिक उलझन के कारण फिर ‘मैं’ को ‘हम’ में परिवर्तित होते देर नहीं लगती और फिर अधिकार और प्रभुता-प्रतिष्ठ व्यक्ति— ‘हम’ को कवि एक युक्ति भी सुझाता है— सामाजिक प्रतिरोधों, विवादों, प्रवादों, संघर्षों को दूर करने के लिए— और वह सबको लाल, नीले, हरे, पीले रंग के चश्में उतार कर जल रूपी जीवन को देखने की प्रेरणा देता है, क्योंकि इन चश्मों के माध्यम से देखने से जल रूपी जीवन के वास्तविक रंग का पता नहीं चल पाता।(पृ. 51-52) कवि की एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द गहरी अर्थवत्ता और व्यंजकता से परिपूर्ण है। 

“हम” नामक कविता में कवि आधुनिक जीवन में मनुष्य के व्यवहार में आए परिवर्तन को बहुत ही सरल शब्दों में अभिव्यक्ति देता है। प्रेम और सौहार्द्र के अभाव में मनुष्य के व्यवहार में जो दुराव-छिपाव और कृत्रिमता आई है, उससे वास्तव में जीवन जीवन नहीं रहा।(पृ.59) “मुझे संदेह है....” नामक कविता में कवि ने आधुनिक मनुष्य के दोगलेपन को सीधे-सीधे और स्पष्ट रूप में निरावरण किया है जब वह अधिक हँसने वालों, अधिक रोने वालों, अधिक बोलने वालों और अधिक चुप रहने वालों तथा अत्यधिक अनुरक्त, गुस्सैल, दर्पयुक्त और विनयशील व्यक्तियों के व्यक्तित्व पर संदेह करता है। ‘चेहरा मन का आईना होता है’— कवि स्पष्ट तौर पर इस मान्यता का प्रतिवाद करता है। अन्यत्र कवि ने मनुष्य के मन के ऊपर चढ़ी सैंकड़ों संस्कारों की परतों को मनुष्य के दोगलेपन और दिखावे से परिपूर्ण व्यवहार का कारण बताया है।(पृ. 48-50) 

“कल्कि के नाम फैक्स” नामक कविता दर्शाती है कि कवि वर्तमान विध्वंसक मानव की आसुरी प्रवृति के प्रति कितना संवेदनशील है। क्या हमारी व्यवस्थाएँ इस ओर ध्यान दे रही हैं? कल्कि को सचेत किया गया है कि वर्तमान युग में लोगों ने किस प्रकार विध्वंसक अस्त्र-शस्त्र एकत्र कर लिए हैं, इसलिए उसे भी आधुनिक यांत्रिक-प्रणाली से लैस हो कर आना पड़ेगा।(पृ. 62-63) भ्रष्ट-आचरण से जीवन की सब प्रकार की सुविधाओं, धन-धान्य का भोग कर परिश्रम-जीवी लोगों को षड़यंत्र-पूर्वक परिधि पर रखने में कामयाब हुए लोगों को “स्तब्धता” नामक कविता में आईना दिखाया गया है। क्योंकि बड़ी चालाकी से सोच यह बना दी जाती है कि समाज में व्याप्त सुविधा-दुविधा, सम्पन्नता-विपन्नता, अमीरी-गरीबी किसी प्रारब्ध अथवा देवयोग के कारण है। इस कविता में कुँवर दिनेश इसी प्रकार के विचार पर प्रश्न-चिह्न लगाते हैं। सच भी है सामाजिक व्यवस्थाएँ सुयोग-दुर्योग की संगति-असंगति से प्रभावित नहीं हो सकती, वैसे मठाधीशों के पास इन परिस्थितियों को लेकर अपने तर्क अथवा व्याख्याएँ हो सकती हैं। कुँवर दिनेश वस्तु-स्थिति का बखान कर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर देते बल्कि “युवाशक्ति जगेगी जब....” नामक कविता में वे विश्वविद्यालयों अथवा शिक्षा संस्थानों में व्याप्त हिंसा और उसके कारण रक्तपात तथा कभी-कभी छात्रों की मृत्यु तक की घटनाओं के प्रति राजनीतिक लोगों को चेतावनी भी देते हैं— “इन कच्चे घड़ों को अनुचित आकार न दो / इनके आर्जव को कोई विकार न दो” और यह भी कि— “कल वे अपने रक्त की प्रत्येक बूँद का करेंगे मूल्य वसूल / यह कोमल प्रसून चुभेंगे बन कर पैने शूल”।(पृ.66) इस चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। युवा-सुलभ ऊर्जा को सृजनात्मक दिशा देना कदाचित् आज शासकीय–वर्ग के सामने सब से बड़ी चुनौती है। 

“शांति” और “शांति का पाठ” नामक दो कविताएँ यथार्थ के धरातल पर एक बार फिर सचेत करती हैं— बन्दूक की नोक पर अर्जित संज्ञाविहीन शांति आखिर किस काम की और फिर आज विश्व में शांति का मसीहा बना अमेरिका किस तरह शांति की बात कर सकता है। कवि उद्घोषित करता है— “शांति एक प्रश्न है— / हल जिसका नहीं है सेनाओं के पास, / हल इसका तो है केवल उनके पास— / जो हैं सहृदय, सरल ह्रदय, काव्यात्मा,” और कवि व्यंग्यात्मक लहजे में दुखती रग पर हाथ रख देता है जब वह कहता है— “शांति नहीं है अभियान— / किसी नोबेल पुरस्कार के लिए,”।(पृ.70) “आम आदमी” और “अभी आया कहाँ वसंत” कविताएँ भी राजनीतिक व्यंग्य लिए हुए हैं। एक उदाहरण द्रष्टव्य है— “भ्रष्टाचारी राज में, / लुजलुज समाज में, / देश का आज असुंदर है, भद्दा है, / झूठ का, फरेब का, जुर्म का परचम लहरा रहा है / नेता दुष्टचेता, जन-जन व्यसनी, दुर्वृत, संत कुसंत, / नैतिकता का सच्चाई का पतझड़ जारी है, / अभी आया कहाँ वसंत?”(पृ. 76) स्पष्ट है कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी वसंत की अपेक्षा ही है, किन्तु यह वसंत कदाचित् कभी आएगा भी? क्योंकि अमेरिका जैसा बनना हमारे लिए सपना है किन्तु जब अमेरिका की वस्तुस्थिति को देखते हैं तो वह दुःस्वप्न से कम नहीं। कवि की वसंत की परिभाषा वास्तव में अमेरिका की परिभाषा से मेल नहीं खाती, और ऐसी होड़ बेमानी है। 

सामाजिक चिंता से इतर “पूनम की रात” नामक कविता में प्रेमाविष्ट व्यक्ति की अनुभूति को अभिव्यक्ति मिली है। दिवस के प्रकाश में वह आनंद कहाँ जो पूनम की रात के शुभ्र प्रकाश में है। प्रेम की अभिव्यक्ति इतनी व्यक्तिनिष्ठ होते हुए, इतनी उदात्त भी हो सकती है यह कवि की कवित्व-क्षमता का सहज प्रमाण है। कवि पार्थिव प्रेम का अनुभव करते हुए भी जीवन सत्य के प्रति कितना सजग है, यह निम्न पंक्तियों में स्पष्ट हो जाता है— “एक लम्बी डगर पर / कुछ दूर तक ही सही मगर / मेरे लिए पूनम का साथ / एक वरदान सा लग रहा था.../ पहली बार आभास हो रहा था / रात्रि में भी सन्देश हैं कितने / पूनम की रात में हैं / वे आनन्द जो सम्भवतः / दिवस के प्रकाश में नहीं”(पृ.54-55) इस प्रकार कवि बहुत गहरे स्तर पर जीवन को पकड़ने का प्रयास करता है। एक और कविता “प्रेताविष्ट एकाकीपन” के माध्यम से एक और रहस्य भी खुलता है और वह यह कि काव्य-रचना वास्तव में कवि के एकाकीपन बल्कि कवि के ही शब्दों में प्रेताविष्ट एकाकीपन में उत्पन्न नकारात्मक भावों को संतुलित कर देती है यथा— “विलग प्रेम की स्मृति में / एक काव्यानुभूति / बन ओझा करती है / झाड़-फूँक / करने को वशीभूत / मेरे भीतर का भूत : मेरा प्रेताविष्ठ एकाकीपन।”(पृ.58)

“अब” शृंखला की नौ कविताएँ भी वर्तमान यथार्थ को बहुविध अभिव्यक्ति देती हैं। मानवीय संवेदना को सहलाती हुई यह कविताएँ भी कुछ यूँ संकेतित कर रही हैं कि तथाकथित विकास की दौड़ में, लोकतंत्र की दुहाई देते हुए भी हमारा वर्तमान, हमारा यथार्थ हमें अपने स्वभाव और स्वाभाविकता से कितना दूर ले गया है। कवि की नज़र कदाचित् सांस्कृतिक स्खलन पर है और वह पूरी जागरूकता से आम-जन से ठिठक कर इस सांस्कृतिक स्खलन को देखने और थामने के लिए आग्रह कर रहा है। “अब” शीर्षक कविताओं की पहली और अंतिम पंक्तियों को क्रमशः उद्धृत कर इस व्यंजना को पहचाना जा सकता है— अब बारिश में रिमझिम कहाँ? अब बारिश में है मधुरिम कहाँ? अब हवा में है वसंत कहाँ? हवा के विषाद का अंत कहाँ? अब नदी में कलरव कहाँ? अब नदी में उत्सव कहाँ? अब अवनि में सहिष्णुता कहाँ? अब अवनि में है करुणा कहाँ? अब लहर में खरोश कहाँ? अब लहर पुरहोश कहाँ? अब भोर में है उत्साह कहाँ? भोर में भरोसे की राह कहाँ? अब नींद आरामदायक कहाँ? अब नींद शांतिप्रदायक कहाँ? अब हँसी में उल्लसन कहाँ? अब हँसी में हर्षस्वन कहाँ? अब पुरवा में है पर्व कहाँ? पुरवा को पूर्व का गर्व कहाँ?(पृ.77-85) “कविता के कटि-तट पर” कविता शैल्पिक दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इस कविता में कवि ने कविता-कामिनी का सजीव चित्र खींचा है। “मृत्यु का स्वप्न’ नामक एक अन्य कविता में कवि ने सृजन और संहार के दर्शन को भावात्मक रूप में अभिव्यक्ति दी है। स्वप्न में कवि सृजन भी करता है और महाकाल भी बन जाता है। जापानी ‘हाइकू’ को कुँवर दिनेश ने हिंदी में ‘अल्पिष्ठ काव्य’ के रूप में गृहीत किया है और इस काव्य-संग्रह में “वनाटन” और “प्रणयालाप” शीर्षक के अन्तर्गत कुछ हाइकू को भी स्थान मिला है। कुँवर दिनेश हाइकू शैली के सिद्धहस्त कवि हैं और अंगरेजी में इन्होंने हाइकू शैली में स्वतन्त्र काव्य-कृति का प्रकाशन भी करवाया है। अभी हाल ही में ‘दोहा शैली’ को अपना कर इन्होंने एक और मार्ग प्रशस्त किया है। कुल मिलाकर कुँवर दिनेश जीवन को इसके सम्पूर्ण वैविध्य में तमाम विसंगतियों और विडम्बनाओं के साथ कलात्मक कौशल सहित उकेरने में सफल हुए हैं। 

 सम्पूर्ण काव्य-संग्रह की कविताओं में कवि व्यापक और सूक्ष्म स्तर पर जीवन के सत्य को समझने के लिए प्रयासरत है और कदाचित् काव्य और सृजनात्मकता का सूक्ष्म धरातल पर अर्थ और अर्थवत्ता भी इसी में है। कवि आम आदमी के पक्ष में खड़ा है, क्योंकि आध्यात्मिक आवरण में लोगों को बरगलाने के षड्यंत्र को कवि ने भांप लिया है। “मोक्ष” नामक कविता में कवि ने स्पष्ट तौर पर घोषित किया है— “मुझे क्या पता / मोक्ष होता है क्या?”(पृ. 92) कवि मोक्ष से ज्यादा स्व को जानने के रास्ते पर अग्रसर है, किन्तु इस यात्रा में वह समाज से विमुख हो, स्व-अर्थ ही गत्यमान नहीं है।

भाषा को लेकर कुंवर दिनेश विशेष रूप से सजग रहते हैं। उनकी भाषा यूँ तो सहज-सरल होती है, किन्तु इस संग्रह में अनायास-सायास संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग हुआ है। कारण यह कि उनकी कविता में एक अविरल विचार-परंपरा अभिव्यक्ति को आतुर है, वे उस युग में लिख रहे हैं जहाँ मानव का वैज्ञानिक दंभ सिर चढ़ कर बोल रहा है, किन्तु कवि का अपना एक समृद्ध कल्पना-लोक और भाव-लोक भी है, और है एक सदिच्छा मानव जीवन को जीवंत और परितृप्त देखने की।  अनावृत, चिरात, वात्यावर्त्त, जित्मन्युता, अप्रमत्त, प्रशान्तवीक्ष्य, स्रोतापन्न, अंतर्लयित, शश, अन्तस्त्वक, सरमासुत, कुशीलव, उपोद्घात आदि ऐसे ही शब्द हैं, जिनका सप्रयोजन प्रयोग हुआ है। कुछ और शब्द भी हैं जिनके अर्थबोध के लिए थोड़ा रुकना पड़ता है, सोचना पड़ता है, गुनना पड़ता है और कई स्थानों पर सर भी धुनना पड़ता है, क्योंकि शब्दों का आकर्षण ऐसा कि भाव-समृद्ध हुए बिना आप आगे नहीं बढ़ पाते। महासागर, मिथक : एक नदी, उत्कंठा, उदयाचल, दिवस निशा और हम, सहपलायन आदि गहन जीवन-बोध की कविताओं में ऐसे शब्द आए हैं। ‘युवाशक्ति जागेगी जब’ नामक कविता में प्रत्यालीढ़ शब्द व्याख्या की माँग करता है। जिसका अर्थ है धनुष चलाते समय बायाँ पैर आगे और दायाँ पैर पीछे की ओर ले जाकर बैठने की मुद्रा अथवा शिव के वक्ष पर आरूढ़ काली की मुद्रा अर्थात् कविता के सन्दर्भ में अर्थ हुआ कि जो युवाशक्ति अभी कुण्डलिनी की तरह सुषुप्तावस्था में है, वह एक दिन जागेगी और प्रचंड रूप लेगी, ज्यों क्रोधाविष्ट काली अथवा धनुष-बाण हाथ में लिए कोई युद्धवीर, जिसके निशाने पर होंगे वे नेता जो समाज सेवा के नाम पर अपने स्वार्थ-साधन में रत हैं। 

कुँवर दिनेश अभिव्यक्ति के स्तर पर अनेकशः वैयक्तिक शैली को अपनाते हैं किन्तु उनकी कविताएँ समाज को संबोधित हैं और एक बेहतर समाज के निर्माण की भावना से अनुप्राणित हैं। उनकी अभिव्यक्ति सामान्यतः सहज-सरल है, किन्तु उसमें गहरा व्यंग्य भी अन्तर्निहित है— मानो राजनीतिक आकाओं, धार्मिक मठाधीशों, शांति के मसीहाओं की दुरभिसन्धि को कवि ने भांप लिया है और वे कवि-धर्म निभाते हुए इन सबका पर्दाफाश करते हैं। यूँ कवि विनयशील होकर कहता है— “मैं तो हूँ / एक बरसाती नाला / उतर आया हूँ / सड़क पर, / मैं चला जाऊंगा / बारिश थम जाने पर।”(पृ. 94) किन्तु यह बरसाती नाला अपने चिह्न न छोड़ जाए ऐसा हो नहीं सकता। इस संग्रह की कविताएँ गहन और स्वतन्त्र चिंतन तथा व्याख्या की मांग करती हैं। यह वह काव्य-संग्रह नहीं जिस पर सरसरी नज़र डालकर उसे पार्श्व में ठेल दिया जाए। किन्तु इतना तो स्पष्ट है कि कुँवर दिनेश की नज़र केवल जीवन के सौन्दर्यात्मक पक्ष पर नहीं है बल्कि वे जीवन को उसकी सम्पूर्णता में पकड़ने का प्रयास करते हैं। उनकी कविता जीवन-निष्ठा की कविता है। उनकी जीवन-दृष्टि व्यापक है, उनके अंतस का आन्दोलन, कविता करके ही तृप्ति पाता है और सृजन के लिए वह ‘पूनम की रात’ का मुखापेक्षी भी नहीं है।

राजेन्द्र वर्मा
“श्यामकला” ग्राम : कठार, पत्रालय : बसाल, बसाल रोड, तहसील व ज़िला सोलन, हिमाचल प्रदेश—173213 

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