उदास लड़की

इन्दु जैन

(कुछ न कुछ टकराएगा ज़रूर)
प्रेषक : रेखा सेठी

 

वह एक उदास लड़की
हँसती है उदासी छलकाती हुई
पनपे बीज को
पानी के लिए तरसाती हुई
औरों पर मुनस्सर
हवा से बचती
बचाती हुई
वह एक उदास लड़की है
बहुत-सी उदास लड़कियों की क़तार में

 

ऊब की गन्ध पीती हुई
सब कुछ करती
अकर्मण्य
सपाट दीवार पर
दूसरे की बनायी तस्वीर सजाती
हर आहट पर चौंकती
बहरी बनी लड़की
सुनती नहीं अन्दर बजता ढोल

 

बुरा लगता है शोर
कोई आता है तो
इस प्रतीक्षा में बातें करती है
कि कब जाए
और फिर अपनी उदासी में लौट आए
वह उदास लड़की

 

अख़बार उठा सके
एक पर्दे की तरह
अपने और अपने बीच में

 

जब तक वह उदास रहती है
मशीन सुचारु चलती है
पानी का घूँट भरते ही
लड़खड़ाने लगते हैं पैर
बहक को रोक
ख़ुश्क कर लेती है जड़ें
लौट पड़ती है
एकरस घटाटोप में
सुरक्षित सँभली समझदार लड़की।

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