तेरे अपनेपन ने

नरेंद्र श्रीवास्तव

तेरे अपनेपन ने मेरे, सूनेपन को दूर किया।
दुःख तो दूर हुये ही सारे, सुख से भी भरपूर किया॥

 

जीवन के संघर्षों को सह-सह
मैं तिनके-सा टूट रहा था।
दुनिया से ख़ुद के रिश्ते का
नाता जैसे छूट रहा था॥


तूने आ के भाग्य सँवारा, कोयले से कोहिनूर किया।
दुःख तो दूर हुये ही सारे, सुख से भी भरपूर किया॥

 

जैसे सूरज-चंदा के बिन
सूना-सा आकाश दिखे है।
जैसे पतझड़ के मौसम में
वन-उपवन उदास लगे है॥


मेरे जीवन का अँधियारा, हर के पूनम-नूर किया।
दुःख तो दूर हुए ही सारे, सुख से भी भरपूर किया॥

 

पावन प्रीत करिश्मे वाली
सारी पीड़ा हर लेती है।
आँखों के आँसू को पोंछे
खुशियों से वो भर देती है॥


तेरी सच्ची हमदर्दी ने, निभा वही दस्तूर किया।
दुःख तो दूर हुये ही सारे, सुख से भी भरपूर किया॥

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