20-02-2019

तेलुगु की सर्वकालिक लोकप्रिय पौराणिक फ़िल्म ‘मायाबजार‘

डॉ. एम. वेंकटेश्वर

भारतीय सिनेमा का इतिहास दादा साहब फाल्के द्वारा सन् 1913 में निर्मित प्रथम मूक फ़िल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से प्रारम्भ होता है। सन् 1931 में आर्देश ईरानी द्वारा निर्मित ‘आलम आरा‘ से भारतीय सिनेमा में सवाक् फ़िल्मों का युग प्रारम्भ हुआ। भारतीय सिनेमा का आरंभिक दौर प्रधानत: ऐतिहासिक, पौराणिक एवं धार्मिक फ़िल्मों का रहा है। भारतीय सिनेमा, मुख्यत: हिंदी सिनेमा और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में निर्मित फ़िल्मों का सम्मिलित रूप है। भारतीय सिनेमा में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषा में निर्मित फ़िल्मों ने प्रभाव एवं उद्देश्य के धरातल पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सिनेमा का मूल प्रयोजन मनोरंजन और व्यापार होता है किन्तु इस प्रक्रिया में सिनेमा दर्शक वर्ग को कई स्तरों पर प्रभावित भी करता है। भारतीय जनमानस में धार्मिक आस्थाओं का महत्व अधिक है जिसका प्रतिफलन भारतीय कला परंपरा में स्पष्ट परिलक्षित होता है। भारतीय नृत्य एवं नाट्य कलाएँ धार्मिक एवं पौराणिक कथा-वस्तुओं से ही मूलत: निर्मित हैं। रामायण और महाभारत से उद्भूत असंख्य आख्यान और संदर्भ नाट्य एवं नृत्य कला के अंग हैं। भारतीय संगीत, नृत्य और नाट्य कला प्राचीन काल से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हैं । आधुनिक काल में सिनेमा नामक एक तकनीकी दृश्य-श्रव्य माध्यम ने नाटक और रंगमंच को प्रतिस्थापित कर दिया। धार्मिक एवं पौराणिक कथा-वस्तुओं पर आधारित फ़िल्में भारतीय सिनेमा का लोकप्रिय हिस्सा रहीं हैं। पौराणिक कथा वस्तुओं पर सर्वाधिक और सार्वकालिक सफल, सशक्त और अत्यंत लोकप्रिय फ़िल्मों का निर्माण दक्षिण की भाषाओं में हुआ। दक्षिण भाषाई फ़िल्में कथा-वस्तु, एवं फिल्मांकन के क्षेत्र में हिंदी फ़िल्मों से कई गुना श्रेष्ठ सिद्ध हुई हैं। धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथा-वस्तुओं पर तेलुगु, तमिल, कन्नड और मलयालम भाषाओं में अनेक कालजयी फ़िल्मों का निर्माण पचास के दशक से ही होता रहा है, हालाँकि इसकी गति में इधर कुछ दशकों में अपेक्षाकृत ह्रास की स्थिति उत्पन्न हुई है। भारतीय जीवन जिस रूप से भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद की चपेट में आकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटकर अलग होता जा रहा है उसी के फलस्वरूप कला, साहित्य और संस्कृति के धरातल पर भी इस बदलाव को देखा जा सकता है। पाश्चात्य जीवन शैली, चिंतन पद्धति और सूचना-प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव ने कलाओं के प्रति भारतीयों की पारंपारिक सोच में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। आज ऐतिहासिक फ़िल्में बहुत कम निर्मित होती हैं, पौराणिक फ़िल्मों का दौर लगभग समाप्त हो चुका है तथा धार्मिक फ़िल्में समाप्त हो गईं। कभी-कभार जोधा-अकबर, बाजीराव-मस्तानी, पद्मावती या बाहुबली जैसी फ़िल्में प्रकट होकर फिर से भारतीय सिनेमा के सुवर्णिम युग की याद दिला देती हैं। आज सिनेमा ने तकनीक के धरातल पर कल्पनातीत प्रगति की है। दृश्य और ध्वनि दोनों ही अत्याधुनिक तकनीक से लेस होकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। फ़ेंटेसी अब फ़िल्म का एक हिस्सा बन गई है। विज्ञान कथाओं पर आधारित कल्पना और चमत्कार से भरपूर भविष्यदर्शी कथावस्तुओं का संयोजन करके हॉलीवुड ने सिनेमा का एक नया कल्पना लोक सृजित कर दिया है जो कि समूचे विश्व सिनेमा को अपनी गिरफ़्त में ले चुका है। अभी तक भारतीय सिनेमा विज्ञान-कथा प्रधान नहीं हुआ है किन्तु निकट भविष्य में इसकी संभावना है। आरंभिक काल से पौराणिक फ़िल्मों में फेंटेसी और अतिरंजना का तत्व विद्यमान था जो कि दर्शकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। 

सशक्त ऐतिहासिक एवं पौराणिक फ़िल्मों के निर्माण के लिए तेलुगु सिनेमा चालीस के दशक से ही लोकप्रिय रहा है। तेलुगु सिनेमा जगत अनेक कारणों से भारतीय सिनेमा का महत्वपूर्ण अंग रहा है। तेलुगु के फ़िल्मकारों ने पचास के दशक में अनेक बांग्ला उपन्यासों पर सफल और सशक्त फ़िल्में बनाईं जिसे तेलुगु दर्शकों ने ख़ूब पसंद किया। ये फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं। शरतचंद्र का कथा-साहित्य तेलुगु में उन पर बनी सशक्त फ़िल्मों के कारण ही प्रसिद्ध है। शरतचंद्र के अधिकांश उपन्यासों पर तेलुगु में प्रभावशाली फ़िल्में बनी हैं। इस संदर्भ में ग़ौरतलब है कि शरतचंद्र कृत देवदास उपन्यास पर तेलुगु में निर्मित ‘देवदास‘ (1953) आज भी एक कालजयी फ़िल्म के रूप में ख्याति प्राप्त है। देवदास उपन्यास पर विभिन्न भाषाओं में निर्मित लगभग सोलह फ़िल्मों में तेलुगु की 1953 में निर्मित ‘देवदास‘ सर्वश्रेष्ठ स्वीकारी गयी है। तेलुगु में उत्कृष्ट सामाजिक-रोमांटिक फ़िल्मों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है जिसकी ओर हिंदी फ़िल्मी जगत आकर्षित हुआ। तेलुगु में पारिवारिक मूल्यों की पक्षधर फ़िल्मों की परंपरा ने हिंदी फ़िल्मकारों का ध्यान आकर्षित किया जिसके परिणाम-स्वरूप तेलुगु की अनेक लोकप्रिय रोमांटिक पारिवारिक फ़िल्मों को हिंदी में भी निर्मित किया गया। चेन्नई में स्थित जेमिनी, ए वी एम, वाहिनी, प्रसाद, आदि अनेक फ़िल्म निर्माण संस्थाओं ने अनेक संदेशात्मक कुटुंबप्रधान फ़िल्मों को हिंदी जगत को दिया। भारतीय सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में तेलुगु सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। 

तेलुगु सिनेमा की ख्याति, प्रारम्भ से ही ऐतिहासिक एवं पौराणिक फ़िल्मों की लोकप्रियता के लिए रही है। भक्ति प्रधान फ़िल्मों की भी सुदीर्घ परंपरा तेलुगु में है। विभिन्न प्रान्तों के संतों और भक्त कवियों के जीवन पर आधारित संदेशात्मक फ़िल्में तेलुगु सिनेमा की धरोहर हैं। ये फ़िल्में सदा के लिए सिनेमा प्रेमियों की पहली पसंद बन गईं हैं। तेलुगु में ‘भक्त- तुकाराम, भक्त-रामदास, योगी-वेमना, अन्नमाचार्य, स्वामी-अय्यप्पा, त्यागराय, महाकवि कालिदास, भक्त जयदेव, चैतन्य महाप्रभु आदि फ़िल्में महत्वपूर्ण हैं । तेलुगु में रामायण और महाभारत पर आधारित फ़िल्मों की संख्या अधिक है। आज भी राम-कथा तेलुगु फ़िल्मकारों की पहली पसंद है। महाभारत के अनेक प्रसंग लोकप्रिय फ़िल्मों में रूपांतरित हुए हैं जिन्हें वर्तमान युवा पीढ़ी बड़े चाव से देखती है। तेलुगु भाषा समास-प्रधान और संस्कृतनिष्ठ होने के कारण पौराणिक कथावस्तुओं के लिए अनुकूल है। तेलुगु भाषा की अनेक विशेषताएँ हिंदी भाषा में उपलब्ध नहीं हैं। पौराणिक फ़िल्मों में पद्यात्मक संवाद जिस स्वाभाविकता और प्रभाववत्ता को उत्पन्न करते हैं, वह प्रभाववत्ता अन्य भाषाओं में संभव नहीं है। तेलुगु पौराणिक फ़िल्मों के संवादों में पद्य-शैली का प्रयोग होता है जिसे पार्श्व संगीत से अधिक प्रभावी बनाया जाता है। पात्रों के बीच पद्य-संवादों में ही संभाषण चलता है। आवेश भरे संवाद, युद्ध के लिए चुनौती आदि संदर्भ के संवाद, पद्य शैली में आलाप के साथ गाते हुए पात्र दर्शकों में संवेदना के स्थाई भाव को उद्दीप्त करते हैं। तेलुगु की ऐतिहासिक, पौराणिक फ़िल्में महँगे आकर्षक भारी-भरकम सेटों के लिए विख्यात हैं। भारी सेटों की परंपरा तेलुगु फ़िल्मों में शुरू से ही विद्यमान है। तेलुगु में ऐतिहासिक और पौराणिक फ़िल्मों की एक स्वतंत्र विधा है जो कि सामाजिक-रोमांटिक फ़िल्मों से कई गुना अधिक लोकप्रिय और जनरंजक मानी गयी है। इन फ़िल्मों का संबंध तेलुगु रंगमंच से घनिष्ठता से जुड़ा है। सिनेमा से पहले नाट्यशालाओं में नियमित खेले जाने वाले पौराणिक नाटक और गीति-नाट्य बहुत प्रसिद्ध थे। दर्शक रात भर जागकर नाटकों का आनंद लेते थे। तेलुगु प्रदेशों में गाँवों और शहरों में ऐसे नाटक खेले जाते थे और लोग इनका भरपूर आनंद लेते थे। जन-सामान्य का रुझान पौराणिक नाटकों की ओर अधिक हुआ करता था। पौराणिक नाटकों के प्रति रुझान और आसक्ति, सिनेमा के लिए भी चरितार्थ हुई। इसीलिए सिनेमा के लिए पौराणिक कथा वस्तुओं को ही प्राथमिकता दी गई और एक से बढ़कर एक महान पौराणिक फ़िल्में तेलुगु में निर्मित हुईं जो सर्वकालिक लोकप्रिय फ़िल्मों के रूप में भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्थिर हो गईं। रामायण पर आधारित तेलुगु फ़िल्मों में संपूर्ण रामायणम, सीता-राम कल्याणम, सीता कल्याणम, लव-कुश, रामंजनेय युद्धम आदि, महाभारत पर आधारित फ़िल्मों में पांडव-वनवासम, श्रीकृष्णार्जुन युद्धम, श्री कृष्ण पांडवीयम, श्रीकृष्ण सत्या, श्रीकृष्ण तुलाभारम, नर्तनशाला, भीष्म, कुरुक्षेत्रम, शशिरखा परिणयम, मायाबजार, यशोदा-कृष्ण, श्रीकृष्ण लीललु आदि प्रमुख हैं। ये सभी फ़िल्में भारी सेट, मधुर संगीत, सशक्त कथावस्तु और कलाकारों के विलक्षण, अभिनय-कौशल के लिए समादृत हुईं। तेलुगु की पौराणिक फ़िल्मों की शृंखला में ‘मायाबजार‘ (1957) एक कालजयी फ़िल्म है जो सार्वकालिक मनोरंजक, कलात्मक वैभव-संपन्न फ़िल्म है। इसकी कथावस्तु का मूल आधार महाभारत की एक अंतर्कथा है जिसे कलात्मक कौशल के साथ के वी रेड्डी के निर्देशन में नागिरेड्डी-चक्रपाणी निर्माताओं ने सुदीर्घ शोध और अथक परिश्रम से फिल्मी परदे पर जीवंत कर दिखाया। भव्यता, कलात्मकता, आकर्षक अभिनय-कौशल, सशक्त पटकथा, मधुर संगीत, अनूठी सिनेमाटोग्राफी, पौराणिक संदर्भों की आश्चर्यजनक कल्पनात्मक अभिव्यक्ति, कथा एवं पात्रानुकूल संवाद, अलंकारिक पद्य-संवाद, राक्षसी मायाजाल और तिलस्म, वैभवपूर्ण वेषभूषा, दैवीय चमत्कार के दृश्य, इस फ़िल्म को चिरस्मरणीय बनाते हैं। ‘मायाबजार‘ तेलुगु सिनेमा जगत की एक अभूतपूर्व घटना मानी जाती है। 

‘मायाबजार‘ पांडवों के अज्ञातवास की पृष्ठभूमि में श्रीकृष्ण की द्वारकापुरी में घटित अभिमन्यु-शशिरेखा के प्रणय और परिणय की कथा है। इस कथा का स्रोत न तो पूरी तरह से महाभारत है और न ही अष्टादश पुराणों में से किसी पुराण में यह कथा पाई जाती है फिर भी इस कथा का स्रोत पुराण ही माना गया है। इस कथा में कल्पना का अंश अधिक है। यह प्रणय कथा चरम परिणति तक पहुँचने के लिए अनेक अवांतरकारी घटनाओं से होकर गुज़रती है। इस प्रेमी युगल के विवाह में उत्पन्न होने वाली बाधाओं को लीलाधारी श्रीकृष्ण सभी का मन मोहकर दूर करते हैं,। दुर्योधन द्वारा द्यूतक्रीड़ा में पांडवों के पराजय से उत्पन्न स्थितियों में अर्जुन की पत्नी और श्रीकृष्ण-बलराम की बहन सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु सहित द्वारकापुरी में निवास करने के लिए आती है। अभिमन्यु और शशिरेखा बचपन से एक दूसरे से प्रेम करते थे। अभिमन्यु की माता सुभद्रा को भी शशिरेखा के प्रति विशेष अनुराग था। वह शशिरेखा को उसकी बाल्यावस्था से ही पुत्रवधू के रूप में कल्पना करती थी। 

शशिरेखा की बाल्यावस्था में एक संदर्भ में बलराम, सुभद्रा को एक वर देते हैं, जिसके अनुसार भविष्य में शशिरेखा और अभिमन्यु के विवाह के लिए बलराम और रेवती दोनों अपनी स्वीकृति दे देते हैं। बलराम की पत्नी रेवती का स्वभाव लोभी और ऐश्वर्य-प्रिय था, वह पांडवों को वैभव से चमत्कृत होकर ही शशिरेखा-अभिमन्यु के विवाह के लिए मान जाती है और बलराम का समर्थन करती है। 

समय करवट बदलता है, जैसे ही पांडव राज्यश्री को द्यूतक्रीड़ा में हार जाते हैं और पराभव की स्थिति में जंगलों की राह लेते हैं, वैसे ही बलराम और रेवती का व्यवहार पांडवों के साथ सुभद्रा के प्रति भी पूरी तरह बदल जाता है। सुभद्रा, द्वारकापुरी में अपने ज्येष्ठ भ्राता बलराम के राजप्रासाद में भाभी रेवती देवी द्वारा हर पल अपमानित होती रहती है। बचपन से यौवन के द्वार पर पहुँची सौंदर्यवती शशिरेखा के मन में अभिमन्यु ही बालपन से बसा था। 

दुर्योधन और शकुनि जिस तरह से पांडवों को छल और कपट से द्यूतक्रीड़ा में पराजित कर भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण कर अपमानित करते हैं, तब श्रीकृष्ण दिव्य शक्ति से द्रौपदी के लाज की रक्षा कर, भाई बलराम को पांडवों के प्रति दुर्योधन के अन्याय और दुराचरण से अवगत कराते हैं। बलराम, प्रिय शिष्य दुर्योधन के अन्यायपूर्ण आचरण से क्रोधित होकर अपने हल अस्त्र को धारण कर दुर्योधन को दंडित कर पांडवों को उनका राजपाट वापस दिलाने के उद्देश्य से हस्तिनापुर चल पड़ते हैं। क्रोधित बलराम के हस्तिनापुर आगमन के समाचार को गुप्तचरों द्वारा प्राप्त कर शकुनि, दुर्योधन को अपने गुरुदेव बलराम को प्रसन्न करने का उपाय सुझाता है। शकुनि के अनुसार बलराम अल्पसंतोषी और सत्वर प्रसन्न होने वाले सरल हृदय के यदुवंशी राजा थे। दुर्योधन और शकुनि दोनों मिलकर बलराम का भव्य स्वागत करते हैं। बलराम का हृदय जीतने के लिए दुर्योधन द्यूत-क्रीड़ा में विजित राज्य एवं संपत्ति को पांडवों को लौटाने के लिए तत्परता का ढोंग करता है जिससे बलराम, दुर्योधन की धर्मनिष्ठा के प्रति अभिभूत होकर उसको एक वर प्रदान करते हैं, दुर्योधन और शकुनि इसी अवसर की प्रतीक्षा में थे। उन दोनों को भविष्य में कौरव-पांडव के मध्य भीषण संग्राम का पूर्वानुमान हो चुका था। बलराम और उनके द्वारा श्रीकृष्ण को अपने पक्ष में कर लेने के लिए दुर्योधन और शकुनि कुटिल प्रयत्न करना चाहते थे। इस उद्देश्य से दुर्योधन और शकुनि दोनों समवेत स्वर में बलराम से उनकी पुत्री शशिरेखा का हाथ दुर्योधन-पुत्र लक्ष्मण कुमार के लिए माँग लेते हैं। बलराम बिना कुछ सोचे-विचारे उसी क्षण दुर्योधन की माँग को स्वीकार कर दुर्योधन के द्वारा समर्पित बहुमूल्य उपहारों को लेकर द्वारका लौटते हैं। द्वारका में वे रेवती देवी से दुर्योधन की आज्ञाकारिता और आतिथ्य सत्कार का बखान करते हैं, और वे दुर्योधन को दिए अपने वचन का भी उल्लेख कर देते हैं। रेवती, पति की इस दूरदर्शिता से प्रसन्न होकर इस प्रसंग को सुभद्रा के सम्मुख व्यक्त न करने का आग्रह करती है। रेवती देवी, दुर्योधन-पुत्र लक्ष्मण कुमार से शशि के रिश्ते का समाचार पाकर फूली नहीं समाती है। वह पांडवों के राज्य वंचित होने की घटना से शशी के संबंध में क्लांत अवस्था में थी। उसे अब अभिमन्यु और शशिरेखा का सांगत्य बिलकुल नहीं सुहा रहा था। ऐसी स्थिति में उसके लिए बलराम द्वारा कौरवराज दुर्योधन को दिया गया वचन उसे प्रफुल्लित करने लगा। किन्तु बलराम, दुर्योधन को दिए हुए वचन से स्वयं असमंजस में पड़ गए। बरसों पूर्व सुभद्रा को दिये वचन को भंग करते हुए उन्हें संकोच हो रहा था किन्तु रेवती के लिए कौरवों का वर्तमान वैभव ज्यादा आकर्षक था। रेवती, पांडवों की दु:स्थिति को कारण बताकर कौरवराज दुर्योधन को दिए वचन को ही सर्वोपरि मानती है। जब यह समाचार सुभद्रा को ज्ञात होता है तो वह दु:खी होकर अपमानित मन:थिति में भैया बलराम और भाभी रेवती देवी को उनके वचन को स्मरण कराती है। वह शशिरेखा और अभिमन्यु के प्रेम को नष्ट न करने की विनती करती है। किन्तु बलराम और रेवती दोनों मिलकर सुभद्रा को अपमानित कर तिरस्कृत करते हैं। अकस्मात पांडवों और साथ में सुभद्रा-अभिमन्यु के प्रति अपमान और तिरस्कार के भाव को शशिरेखा स्वीकार नहीं कर पाती है। अभिमन्यु माता-सुभद्रा को अपने मामा बलराम द्वारा अपमानित होता देख आक्रोश से भर उठता है। ऐश्वर्य की तुलना में वह शौर्य और पराक्रम को ही वरेण्य मानता है। वह मामा बलराम को पांडवों के साहस और वीरता का स्मरण करा कर, दुर्योधन पुत्र लक्ष्मण कुमार को युद्ध में पराजित कर शशिरेखा का वरण करने की प्रतिज्ञा करता है। किन्तु बलराम, दुर्योधन के पराक्रम के सम्मुख पांडवों के पराक्रम को तुच्छ कहकर उसका उपहास करते हैं। रुक्मिणी, शशिरेखा का पक्ष लेकर रेवती को समझाना चाहती है किन्तु रेवती उसका भी अपमान करती है। श्रीकृष्ण विवाद को शांत करने के उद्देश्य से सुभद्रा को पुत्र सहित द्वारका त्याग कर चले जाने की आज्ञा देते हैं। पीछे से वे अपने विश्वासपात्र सारथी ‘दारुक‘ को सुभद्रा-अभिमन्यु को राक्षस राज ‘घटोत्कच’ के आश्रम में पहुँचा आने की आज्ञा देते हैं। सुभद्रा और अभिमन्यु, श्रीकृष्ण की आज्ञा से द्वारका त्याग देते हैं। 

यहाँ से कहानी का दूसरा भाग शुरू होता है। राक्षस राज घटोत्कच, अर्जुन के अग्रज भीमसेन और राक्षस कुल की स्त्री हिडिंबा का पुत्र है जो दुर्गम पर्वतों में स्थापित अपने स्थविर में कौरव-पांडव संग्राम में पांडव सेना की का साथ देने के लिए अपनी राक्षस वाहिनी को संसिद्ध करने में व्यस्त रहता है। घटोत्कच के आधिपत्य की वन्य सीमा में सुभद्रा-अभिमन्यु के रथ के प्रवेश करते ही घटोत्कच को बाह्य शत्रु के उसकी सीमा में प्रवेश करने के ध्वनि संकेत प्राप्त हो जाते हैं। घटोत्कच शत्रु का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए अपने मायावी राक्षस सैनिक को भेजता है, जिसे अभिमन्यु अपने बाणों से आहत कर देता है। ज़ख्मी राक्षस अनुचर अपने स्वामी के स्थविर में पहुँचकर, एक साहसी युवक द्वारा किए गए वार से हुई अपनी दुर्गति को बताता है। राक्षस राज घटोत्कच अपने अनुचर की दुर्गति को देख क्रोधित होकर उस शत्रु को हताहत करने के लिए तत्काल आकाशमार्ग से निकल पड़ता है। घटोत्कच अपने विशालकाय रूप में एक पर्वत शिखर पर प्रकट होता है। वह उस आगंतुक का परिचय पूछता है। अभिमन्यु अपना परिचय न देकर बाणों से घटोत्कच पर प्रहार करता है। घटोत्कच, अभिमन्यु के मंत्र-सिद्ध बाणों को निष्फल करता जाता है। अभिमन्यु और घटोत्कच के बीच घमासान युद्ध होता है। घटोत्कच अपनी राक्षस माया का प्रयोग कर अभिमन्यु को भ्रमित करता जाता है। अभिमन्यु भी मंत्रोच्चार के साथ घातक बाणों से घटोत्कच पर आक्रमण करता है किन्तु घटोत्कच भी अपने एक से बढ़कर एक प्रक्षेपास्त्रों का प्रयोग करता है। अंत में घटोत्कच का एक घातक अस्त्र आकाश से तीव्र वेग से आकर अभिमन्यु को आहत कर देता है। अभिमन्यु धराशायी होकर मूर्छित हो जाता है। रथ पर सवार सुभद्रा, पुत्र अभिमन्यु को धराशायी देखकर घटोत्कच को ललकारती हुई, अपना परिचय देती है। वह स्वयं को कुंती पुत्र वीर अर्जुन की पत्नी घोषित करती हुई घटोत्कच पर वार करने के लिए धनुष धारण कर उस पर बाण चढ़ाती है। वीरांगना सुभद्रा के मुख से अर्जुन का नाम सुनते ही राक्षस राज घटोत्कच भूमि पर उतर आकर सुभद्रा के चरणों का स्पर्श करता है। घटोत्कच स्वयं को भीमसेन का पुत्र बताता है और सुभद्रा से अपनी धृष्टता के लिए क्षमा याचना करता है। इस बीच अभिमन्यु की मूर्छा दूर हो जाती है और वह पुन: वार करने के लिए आकाश की ओर देखता है। उसी क्षण घटोत्कच स्वयं को माता सुभद्रा की रक्षा में निमग्न बताता है। सुभद्रा उसका परिचय अभिमन्यु से कराती है। दोनों एक दूसरे के गले मिलते हैं। इसी क्षण घटोत्कच की माता हिडिंबा वहाँ पहुँचकर सुभद्रा का परिचय पाकर हर्षित होती है। घटोत्कच और हिडिंबा, सुभद्रा और अभिमन्यु को अपने आश्रम में आमंत्रित कर उन्हें साथ ले जाते हैं। वहाँ पहुँचकर, सुभद्रा अपने तिरस्कार की कथा हिडिंबा को सुनाती है। बलराम के वचन-भंग और सुभद्रा के अपमान की घटना को सुनकर घटोत्कच आक्रोश से उसी क्षण बलराम के विरुद्ध युद्ध छेड़ने को तत्पर हो जाता है। 

सुभद्रा, घटोत्कच के क्रोध को देखकर किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो जाती है। वह घटोत्कच को संयम और धीरज धरने का आग्रह करती है। वह घटोत्कच को द्वारका जाकर श्रीकृष्ण से मिलकर उनसे ही अभिमन्यु-शशिरेखा के विवाह को सम्पन्न कराने का उपाय पूछने की आज्ञा देती है। सुभद्रा की आज्ञा के अनुसार घटोत्कच अभिमन्यु को अपने स्थविर का नायक घोषित कर वह द्वारका के लिए आकाश मार्ग से प्रस्थान करता है। 

अर्द्धरात्रि के समय विशाल गदाधारी घटोत्कच लघुकाय रूप धारण कर द्वारका नगर में प्रवेश करता है। वह द्वारका के राज-प्रासाद के प्रहरियों को अपने माया जाल से मूर्छित कर महल के अंत:पुर में निद्रामग्न स्त्रियों में बलराम की रूपवती पुत्री शशिरेखा को ढूँढ़ता है किन्तु वह शशिरेखा को नहीं पहचान पाता। उसे अपनी इस असहाय स्थिति पर खीझ होती है। अपार शक्तिमान गदाधारी घटोत्कच किंकर्तव्यविमूढ़ होकर राजप्रासाद के प्रांगण में भटकता रहता है, तभी श्रीकृष्ण प्रकट होकर गुप्त मंत्रणा द्वारा उसको आगे की सारी कार्य योजना समझाते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं अभिमन्यु-शशिरेखा के विवाह को विधिवत सम्पन्न कराने के लिए घटोत्कच को सहायक बनाते हैं। श्रीकृष्ण तो वैसे भी जगन्नाटक सूत्रधारी कहलाते हैं। 

वे अभिमन्यु-शशिरेखा को परिणय को कौरव-पांडव वैमनस्य एवं प्रतिद्वंद्विता के बीच सम्पन्न कर परोक्ष रूप से अधर्मी कौरव राज दुर्योधन के छल-छद्म को ज्येष्ठ भ्राता बलराम के सम्मुख उद्घाटित कर देना चाहते हैं। घटोत्कच, श्रीकृष्ण के ही उपदेश के अनुसार अंत:पुर में निद्रामग्न शशिरेखा को शैय्या समेत अपने बाहुबल से उठाकर आकाश मार्ग से अपने स्थविर की ओर ले उड़ता है। घटोत्कच द्वारा निद्रावस्था में लाई गयी शशिरेखा को देखकर माता हिडिंबा और सुभद्रा हर्षित होते हैं। विरहाकुल अभिमन्यु का हृदय शशिरेखा को निकट पाकर प्रफुल्लित हो उठता है। घटोत्कच अभिमन्यु और शशिरेखा का विवाह अपने स्थविर में सम्पन्न करने के लिए माता हिडिंबा को कहकर स्वयं माया-शशिरेखा का रूप धारण कर द्वारकापुरी के राजप्रासाद में शशिरेखा के शयन कक्ष में उसके स्थान पर निद्रामग्न हो जाता है। श्रीकृष्ण के अतिरिक्त यह रहस्य कोई नहीं जानता है कि महल में शशिरेखा के रूप में कोई इतर व्यक्ति विद्यमान है। शशिरेखा जो अभिमन्यु के वियोग में व्याकुल थी, बदले हुए रूप में वह लक्ष्मण कुमार के संग विवाह करने के लिए लालायित दिखाई देती है जिससे रेवती देवी और बलराम राहत की साँस लेते हैं। वास्तव मेन राक्षसराज घटोत्कच स्वयं को शशिरेखा के रूप में ढालकर सबका मनोरंजन करते हैं। 

दूसरी ओर दुर्योधन, शकुनि एवं अन्य कौरव बंधुओं द्वारा निर्धारित मुहूर्त जिसका समर्थन बलराम और श्रीकृष्ण ने किया था, उसी मुहूर्त में लक्ष्मण कुमार और शशिरेखा के विवाह के लिए कौरवराज दुर्योधन अपने शतभ्राताओं और शकुनि, दु:शासन, कर्ण आदि बंधुओं सहित द्वारकापुरी में प्रवेश करते हैं। कौरव वरपक्ष के बारातियों के स्वागत के लिए द्वारकापुरी की वीथियों और प्रासादों को भव्य रूप से अलंकृत किया जाता है। कौरव बंधुओं के के आतिथ्य के लिए, घटोत्कच के स्थविर में राक्षस सेना को अस्त्र-शस्त्र के साथ राक्षसी माया और तंत्र विद्या में प्रदान करने वाले गुरु चिन्नमया, अपने दो प्रिय शिष्यों को साथ लेकर एक मायानगरी (मायाबजार) का निर्माण करते हैं। मायाबजार फ़िल्म में यह माया नगरी विशेष आकर्षण का केंद्र है। इस मायाबजार (माया नगरी) को ऐंद्रजालिक करिश्मे से कल्पनातीत सौन्दर्य से भर दिया जाता है जिसे देखकर कौरव समूह दिग्भ्रमित हो जाता है। शकुनि और दुर्योधन दोनों बलराम-श्रीकृष्ण के आवभगत से चमत्कृत और अभिभूत हो जाते हैं। घटोत्कच शशिरेखा का छद्म रूप धारण कर शकुनि और लक्ष्मण कुमार आदि सभी को अपने असामान्य और विनोदात्मक व्यवहार से तरह-तरह के भ्रम जाल फैलाता है। इस विचित्र विवाहोत्सव में घटोत्कच की राक्षस सेना छद्म वेश में कौरव समूह में शामिल होकर अनुकूल अवसर पर उपद्रव और उत्पात मचाने के लिए तैयार रहते हैं। उनका उद्देश्य उस विवाह को किसी भी तरह से भंग कर वहाँ अराजक स्थिति पैदा करना था। इस मायाजाल के व्यूहकर्ता राक्षस-गुरु चिन्नमया थे। 

विवाह का मुहूर्त आ पहुँचता है। वर और वधू दोनों को विवाह की वेदी पर बिठाया जाता है। वर लक्ष्मण कुमार के सम्मुख वधू शशिरेखा स्थान ग्रहण करती है। मंत्रोच्चार के मध्य वर-वधू एक दूसरे को निहारने की चेष्टा करते हैं। शशिरेखा एकाएक विकराल भयानक दैत्य के रूप में लक्ष्मण कुमार को दिखाई देती है। वर लक्ष्मण कुमार वधू के स्थान पर भयानक दैत्य को देखकर मूर्छित हो जाता है, उसका उपचार कर पुन: उसे वधू के सम्मुख बिठाया जाता है किन्तु हर बार उसे शशिरेखा के स्थान पर कभी बाघ तो कभी भालू दिखाई देता है। वह विवाह की वेदी से उठकर भाग खड़ा होता है। विवाह की वेदी के सम्मुख बंधुमित्रों के संग विराजे दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण और शकुनि आदि लक्ष्मण कुमार के इस असामान्य आचरण से बौखला उठते हैं, उन्हें लक्ष्मण कुमार की कायरता पर क्रोध आता है। जब वे शशिरेखा के असामान्य व्यवहार को देखते हैं तब शकुनि को अचानक श्रीकृष्ण की कूटनीति और चतुराई का आभास होता है। शकुनि को संदेह होता है कि श्रीकृष्ण ने कोई कुटिल चाल चली है। उसे अनुमान हो जाता है कि विवाह के मंडप में शशिरेखा असली नहीं है बल्कि कोई और छद्म रूप धारण कर उसके स्थान पर आसीन है। वह अपनी शंका उपस्थित लोगों के सामने व्यक्त कर देता है। वह श्रीकृष्ण द्वारा फैलाये गए भ्रम और छल का पटाक्षेप कर देता है। शकुनि, श्रीकृष्ण पर आरोप लगाता है कि उसने छल किया है, शशिरेखा के भेष में किसी राक्षसनी को विवाह की वेदी पर बिठाया है। शकुनि के इस आरोप से बलराम क्रोधित हो उठते हैं। विवाह मंडप में हड़कंप मच जाता है। वधू पक्ष में खलबली बच जाती है। बलराम के बंधुओं में से सात्यकि नामक एक यादव-वीर इस विवाह के पीछे छिपे शकुनि के कपटी इरादों को उसी के मुख से स्वीकार कराने के लिए उद्यत होता है। राजसूय यज्ञ के अवसर पर पांडवों के द्वारा बलराम को उपहार में दिए गए सत्यपीठ पर शकुनि को खड़ा करके उससे सच्चाई उगलवाने के लिए, शकुनि को आमंत्रित करता है। सत्यपीठ एक ऐसा पीठ था जो व्यक्ति के अंत:करण में छिपे सत्य को निकलवाने के लिए ही निर्मित एक विलक्षण पीठ था। दुर्योधन इस विकट स्थिति से घबराकर, शकुनि को सत्यपीठ पर जाने से रोकता है। किन्तु शकुनि को विश्वास था कि जब तक वह न चाहे कोई भी उसके मन के भेद को नहीं उगलवा सकता इसलिए वह सत्यपीठ पर खड़ा हो जाता है। सत्यपीठ की महिमा से वह सारा सत्य उगल देता है। शकुनि बता देता है कि जब बलराम, दुर्योधन को दंडित करने के लिए हस्तिनापुर आये थे उसी की कुटिल बुद्धि से वे बलराम की ठकुर सुहाती प्रवृत्ति को भाँपकर उन्हें आतिथ्य सत्कार से लुभाकर कर, श्रीकृष्ण को भी अपने पक्ष में कर लेने के लिए ही शशिरेखा का हाथ लक्ष्मण कुमार के लिए वरदान के रूप में माँग लिया था। यह सब उसके ही द्वारा रचा गया षडयंत्र था। शकुनि के इस आत्मसाक्ष्य से दुर्योधन के षडयंत्र का पर्दाफ़ाश हो जाता है। 

उसी क्षण माया-शशिरेखा रूपी घटोत्कच अपने असली राक्षसी रूप में प्रकट होकर विवाह प्रांगण में छद्म वेश में मौजूद अपने राक्षसगणों को कौरव समूह में उत्पात मचाकर उन सबको हताहत करने की आज्ञा देता है। विशाल घटोत्कच अपनी माया शक्ति से दुर्योधन, शकुनि और उनके सभी बंधुओं को, इस चेतावनी के साथ कि वे भविष्य में फिर कभी पांडवों के विरुद्ध षडयंत्र न रचें, रस्से से बाँधकर गठरी बनाकर आकाशमार्ग से हस्तिनापुर रवाना कर देता है। 

बलराम और रेवती, पुत्री शशिरेखा के लिए चिंतित होकर घटोत्कच से इस सारे प्रकरण का रहस्य पूछते हैं, घटोत्कच श्रीकृष्ण की आज्ञा लेकर उन्हें यह शुभ समाचार देता है कि इसी मुहूर्त में अभिमन्यु और शशिरेखा का विवाह श्रीकृष्ण के समक्ष उसके स्थविर में हो चुका है। उसी समय तत्काल घटोत्कच के संग सभी परिजन उसके स्थविर पहुँचते हैं और नवविवाहित अभिमन्यु और शशिरेखा को आशीर्वाद देते हैं। कहानी का समापन घटोत्कच द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति के साथ होता है। 

इस जटिल और विस्तृत कल्पित कथा को मधुर संगीतबद्ध गीतों, सम्मोहक दृश्यों और आकर्षक अभिनय कौशल के साथ एक कालजयी कलात्मक फ़िल्म के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय तेलुगु के कुशल कलाकारों द्वारा ही संभव हो पाया। इस फ़िल्म का निर्माण तेलुगु में सन् 1957 में सुप्रसिद्ध निर्देशक के वी रेड्डी के निर्देशन में निर्माता-द्वय नागीरेड्डी-चक्रपाणि के द्वारा किया गया। सुप्रसिद्ध गायक और संगीतकार ‘घंटशाला’ ने इस फ़िल्म का संगीत निर्देशन किया। इस फ़िल्म का छायांकन (सिनेमाटोग्राफी) उस समय के विख्यात छायाकार मार्कस बर्ट्ले ने किया जिनकी सिनेमाटोग्राफी अद्भुत प्रभावशाली थी। यह फ़िल्म आज तक इसकी अद्भुत विस्मयकारी फ़िल्मांकन के लिए याद की जाती है, इसीलिए इसे दर्शक बार-बार देखकर आनंद लेना चाहते हैं। इस फ़िल्म की फोटोग्राफी को देखकर लोगों को उसकी कलाकारी और विलक्षण प्रभाव के लिए आश्चर्य होता है। राक्षसी माया से पात्रों के अदृश्य और प्रकट होने के दृश्य, श्रीकृष्ण की लीलाओं के दृश्य, राक्षसराज घटोत्कच के राक्षसगणों के तंत्र विद्या में निष्णात गुरु चिन्नमया और उनके शिष्यों के जादुई कारनामें, विवाह-प्रांगण के भोजनागार में घटोत्कच द्वारा विराट रूप धारण कर समस्त सुस्वादु व्यंजनों का विनोदात्मक ढंग से भोजन करना। पकवानों के सुविशाल पात्रों को अपने हाथ के इशारे से अपनी ओर खींच लेना और उन सबका उसके मुख में समा जाना। घटोत्कच के सेवन के पश्चात रिक्त विशाल पात्रों को उन्हीं व्यंजनों से तत्काल अपनी माया-विद्या से चिन्नमया द्वारा पुन: भर देना, बारातियों के लिए तरह-तरह के विनोदात्मक इंद्रजालिक प्रदर्शन का प्रबंध करना आदि इस फ़िल्म को मनोरंजक बनाते हैं। फ़िल्म की कथा पांडवों के इर्दगिर्द ही चलती है किन्तु फ़िल्म में एक भी पांडव पात्र मौजूद नहीं हैं, फिर भी हर दृश्य में पांडवों की उपस्थिति का आभास निरंतर दर्शकों को होता है। यही इस फ़िल्म की विशेषता है। तेलुगु फ़िल्म संसार के सारे कलाकार इस फ़िल्म में किसी न किसी पात्र की भूमिका में दिखाई देते हैं, यहभी इसकी विशेषता है। यह फ़िल्म नव रसों से परिपूर्ण फ़िल्म है जो मनोरंजन के साथ साथ पौराणिक पौराणिक संदर्भों को भी कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। 

श्रीकृष्ण के रूप में एन टी रामाराव, अभिमन्यु के रूप में अक्कनेनी नागेश्वर राव, शशिरेखा के रूप में तेलुगु सिनेमा की महान अभिनेत्री सावित्री ने तेलुगु सिनेमा के इतिहास में अपने अभिनय कौशल से नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। सावित्री का अभिनय माया-शशिरेखा की भूमिका में अद्भुत है। माया-शशिरेखा के व्यक्तित्व में घटोत्कच के राक्षसी पौरुषयुक्त हावभाव का प्रदर्शन चिरस्मरणीय बन गया। हास्य और विनोदात्मक भूमिकाओं में उस समय के मशहूर कलाकार, रेलंगी (लक्ष्मण कुमार), रमणा रेड्डी (चिन्नमया), दुर्योधन की भूमिका में मुक्कामला, बलराम की भूमिका में सुप्रसिद्ध अभिनेता गुम्मड़ि वेंकटेश्वर राव और सर्वप्रमुख वीर घटोत्कच की भूमिका में विशाल व्यक्तित्व के महान अभिनेता एस वी रंगाराव अमर हो कर रह गए। रेवती देवी के लिए सुप्रसिद्ध छायादेवी को और रुक्मिणी के लिए संध्या को चुना गया। इनके अतिरिक असंख्य कलाकार दास-दासियों, राक्षस गणों और नृत्यांगनाओं के रूप में इस फ़िल्म में अपने अभिनय कौशल से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। 

शकुनि की भूमिका के लिए तेलुगु सिनेमा जगत में सी एस आर नामक अभिनेता ने स्वयं को सदा के लिए अमर कर लिया। ‘मायाबजार‘ शीर्षक शशिरेखा-लक्ष्मण कुमार के विवाह के अवसर पर द्वारका नागरी के बाहर कौरव-बारातियों के लिए विशेष रूप से सृजित मायानगरी के लिए किया गया नामकरण है। निश्चित रूप से यह शीर्षक फ़िल्म को सार्थक करता है। 

‘मायाबजार‘ में अभिमन्यु और शशिरेखा का प्रेम, बहुत ही सुंदर ढंग से फ़िल्माया गया है जो कि इस फ़िल्म का प्राण तत्व है। इनके प्रेम के संयोग और वियोग दोनों स्थितियों का चित्रण आकर्षक और मनमोहक बन पड़ा है। इस फ़िल्म की विशेषता पात्रों का सौन्दर्य, उदात्त चरित्र और मर्यादित अभिनय कौशल है। इस फ़िल्म का प्रमुख आकर्षण, बलराम की सुपुत्री शशिरेखा की भूमिका में, तेलुगु सिनेमा की महान अभिनेत्री सावित्री का अद्भुत सौन्दर्य, वेषभूषा, राजसी आभूषण और अभिनय। फ़िल्म के अनेक दृश्य सम्मोहक और इतने आकर्षक हैं कि इन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। पूर्ण चंद्रमा की खिली चमकीली चाँदनी रात में अभिमन्यु और शशिरेखा के नौका विहार का संगीतमय दृश्यांकन ‘मायाबजार‘ का विशेष उल्लेखनीय आकर्षण है। पौराणिक पात्रों के लिए सुप्रसिद्ध एस वी रंगाराव ‘मायाबजार‘ में राक्षसराज घटोत्कच के रूप में पूरे फ़िल्म पर छाए रहते हैं। श्रीकृष्ण की दिव्यता को एन टी रामाराव ने चिरकालिक लोकलुभावन स्वरूप प्रदान किया है। 

अभिमन्यु (अक्कीनेनी नागेश्वर राव) और घटोत्कच (एस वी रंगाराव) का आमना-सामना प्रथम बार जब होता है तो वे दोनों अपने शौर्य का प्रदर्शन परस्पर घात-प्रतिघात करके करते हैं। अभिमन्यु अपनी धनुर्विद्या और घटोत्कच अपने भीषण अमोघ अस्त्र विद्या का प्रयोग करते हैं। फ़िल्म में यह प्रकरण बहुत ही आकर्षक और सराहनीय है। अभिमन्यु के रूप में अक्कीनेनी नागेश्वर राव बहुत आकर्षक बन पड़े हैं। शशिरेखा और अभिमन्यु की जोड़ी (सावित्री और नागेश्वरराव) ने शाश्वत कीर्ति अर्जित की है।

भारतीय पौराणिक फ़िल्मों की परंपरा में तेलुगु फ़िल्म ‘मायाबजार‘ सर्वश्रेष्ठ, सर्वकालीन लोकप्रिय फ़िल्म के रूप में भारत और विदेशों में भी याद किया जाता है। 

शशिरेखा-अभिमन्यु की प्रेम कथा, भीमसेन पुत्र राक्षसराज घटोत्कच और श्रीकृष्ण के मायाजाल से युक्त यह कथा सर्वप्रथम सन् 1925 में ‘मायाबजार उर्फ सुरेखा हरण‘ के नाम से बाबूराव पेंटर के निर्देशन में एक मूक फ़िल्म के रूप में आई , जिसमें श्रीकृष्ण का अभिनय वी शांताराम ने किया था। इसके पश्चात इस पौराणिक कथा पर 1984 तक 11 फ़िल्में तेलुगु, तमिल, मराठी, हिंदी और गुजराती भाषाओं में निर्मित हुईं। 1957 में श्वेत-श्याम रूप में निर्मित तेलुगु मायाबजार को सन् 2010 में गोल्डस्टोन टेक्नोलोजीस नामक संस्था ने अत्याधुनिक डिजिटल तकनीक से सँवारकर रंगीन बनाया गया और 30 जनवरी 2010 को इसे रिलीज़ किया गया। मायाबजार के रंगीन संस्करण ने फिर एक बार 1957 जैसी ही लोकप्रियता हासिल की। आज की युवा पीढ़ी ने भी फ़िल्म की कथावस्तु, कलाकारों के अभिनय, गीत-संगीत और विशेषकर इसकी सिनेमाटोग्राफी को मनोमुग्धकारी डिजिटल रंगीन रूप में देखकर ख़ूब सराहा और पचास के दशक के निर्माताद्वय नागिरेड्डी-चक्रपाणी और निर्देशक के वी रेड्डी के मुरीद हो गए। मार्कस बर्ट्ले के द्वारा सृजित स्पेशेल एफ़ेक्ट्स (चमत्कारी छायांकन और चित्रांकन) को देखकर दर्शक आज भी अचंभित होते हैं। 

‘माया बाजार‘ की कथा पर निर्मित फ़िल्मों की सूची :- 

 

निर्माण वर्ष

भाषा

फ़िल्म

निर्माता/निर्देशक

1.

1925

मूक फ़िल्म

 मायाबजार उर्फ सुरेखा हरण

बाबूराव पेंटर

2.

1932

हिंदी

मायाबजार उर्फ सुरेखा हरण

नानूभाई वकील

3.

1935

तमिल

 मायाबजार उर्फ वत्सला कल्याणम

आर पद्मनाभन

4.

1935

तेलुगु

मायाबजार उर्फ शशिरेखा परिणयम

पीवी दस

5.

1939

मराठी

 मायाबजार

जी पी पवार

6.

1949

हिंदी/मराठी

मायाबजार उर्फ वत्सला हरण

दत्ता धर्माधिकारी

7.

1949

हिंदी

 वीर घटोत्कच उर्फ सुरेखा हरण

नानाभाई भट्ट

8.

1957

तेलुगु/तमिल

 मायाबजार

के वी रेड्डी

9.

1958

हिंदी

मायाबजार

बाबूभाई मिस्त्री

10.

1970

तेलुगू/कन्नड/तमिल

वीर घटोत्कच

शांतीलाल सोनी

11.

1971

हिंदी में अनूदित

मायाबजार

के वी रेड्डी

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