कोई नहीं है फ़ुरसत में,
सब अपनी उलझन में है।
कोई किसी की नहीं सुनता,
सब अपनी टशन में हैं॥

 

लोग भरे उघान में,
पर सारे अपनी मगन में है।
कोई रमन-चमन नहीं,
हर कोई अपनी टशन में हैं॥

 

यहाँ प्रेम का मतलब पानी है,
नहीं अंतरमिलन में है।
कोई राधा-कृष्ण नहीं,
हर कोई अपनी टशन में हैं॥

 

मस्ती भोग-विलास में है,
करना वन में गमन नहीं।
कोई अनुज अब लक्ष्मण नहीं,
हर कोई अपनी टशन में हैं॥

 

माँ-बाप अकेले हैं यहाँ,
कहाँ कोई साथ भ्रमण में है।
कोई श्रवण कुमार नहीं,
हर कोई अपनी टशन में हैं॥

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