तरक्क़ी समय ने पायी है

15-03-2020

तरक्क़ी समय ने पायी है

राजनन्दन सिंह

तरक्क़ी मैंने नहीं समय ने पायी है
वह मेरा नाम पता फोन सब जानता है
जहाँ-जहाँ भी मुझसे मतलब है समय का
वहाँ से मीठी आवाज़ में फोन आता है
समय मुझे सर बुलाता है
"क्या मेरी बात... जी से हो रही है?"
समय मुझे प्यार से उलझाता है
वह मेरी कमज़ोरी मेरी ज़रूरतें 
मेरी महत्वाकांक्षाएँ 
मेरी गुप्त व निजी योजनाएँ
सब जानता है
मुझे सपने दिखाता है
मेरे हौसले उकसाता है
बड़े प्रयासों से दबाए हुए
मेरे मन के सुप्त 
"प्रदर्शन प्रभाव" को जगाता है।
मुझे रास्ता सुझाता है
मेरी तरक्क़ी का नहीं
अपने मतलब का
जहाँ-जहाँ से समय मुझसे 
कमा सकता है या कमाता है 
होम लोन पर्सनल लोन
कार लोन सोसायटी लोन
सब समय ने सुझाया है
चरपहिया गाड़ी, क्रेडिट कार्ड, 
डेबिट कार्ड, शॅापिंग कार्ड, 
क्लब कार्ड, हाथ में फोन
समय ने थमाया है।
मैंने तो अपने दिन बेचे हैं
रातें गिरवी रखी है
रिश्ते-नाते भुलाए है
पर्व-त्योहार गँवाया है
ख़ुद को भाड़े पर लगाया है
पर मैं भ्रमित नहीं हूँ
मुझे पता है
जो कल बलवान था
वह कल भी रहेगा
वह सदा दबायेगा 
जिसने सदा दबाया है
तरक्क़ी मैंने नहीं 
समय ने पायी है

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
किशोर साहित्य कविता
बाल साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
नज़्म
विडियो
ऑडियो