स्वलीनता

01-07-2020

स्वलीनता

आरती पाण्डेय

स्वलीनता (Autism) - एक असाध्य रोग जो रोगी के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है... दूसरी तरफ़ अवसाद एवं कुप्रथाओं का रोग जो समाज के व्यवहार को प्रभावित करता है।

 

ख़ास हूँ मैं भी! तुम्हारी तरह,
अरदास हूँ, बंद पलकों की।
अवसादों से घिरा मष्तिस्क
हुआ विचलित अंतकरण भी,
लीन हूँ अंधकार में,
यह रोग ही ऐसा है, 
स्वलीन हूँ मैं
स्वलीन हूँ मैं।


अब डर नहीं लगता, इस डर से भी,
यह निम्न है उस ख़ौफ़ से
जो खुरच खुरच बनी 
अकलुष शोभा में है,
रकतरंजित महावर में,
दर दर भटकती 
उस अपवित्र 
कोख में,
और उस झुलसती हुई सुहागन में भी।


भावनाओ के बवंडर में खो गई
क्योंकि स्वलीन हूँ मैं।


स्याहता की कालिख रिश्तों मे पोत कर,
उम्मीदों का रौद्र चक्रवात,
घुट जाती है संत्रासों की सिसकियाँ।
उर स्थल रौंदते हुए राख हुई अस्थियाँ,
भावनाओं का हुआ द्वन्द्व।


जो दर्प तुमको ख़ुद पर है,
क्यों करते हो, 
गर्व यूँ ही।
मदान्धता के उछाह ने ,
कुचल दी अस्मिता उसकी,
अलाप, राग, झंकार, अवसाद रहित करते परन्तु,
यही मेरे मन को विकृति का आदेश देते और
अट्टहास भरते।


मेरी अजीब आवाज़ें
जो मुझे ही डराती हैं
बेसुरी क्यों है?
ये परिमिति है दूरी की।
बेज़ुबान जिबह की चीत्कार,
ख़ामोशियों में जब चीख़ती हैं।
क्यों नहीं फट जाते कर्णपटल,
कर्णकटु हुआ सघन!


समक्ष होकर भी अदृश्य,
अपने ही अंतर्मन का द्वंद्व
अहसास जिसकी अनुभूति नहीं;
व्यथित मन, आकुल चितवन
निर्मम, नृशंस, हिंसक!


मनोव्यथा है या प्रतिघात
यह पथराई  पुतलियाँ,
हुई भावशून्य,
चेतन ही भाव विहीन।


अंतराल सुरों का नगण्य कर
आस को विश्वास दे,
लक्ष्य प्रत्यक्ष कर,
कोरों की नमी कपोल से पोंछ,
दया के भार को 
व्यथा से उभार कर...


बस एक सवाल!


मैं स्वलीन हूँ.... 
फिर तुम क्यों विलीन हो?

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें