स्त्री विमर्श

डॉ. मधु सन्धु

लिखा है
महर्षि दुर्वासा
अपनी असंयत क्रोधाग्नि से
उपेक्षित करने वाली 
पुंजकस्थली को
बंदरी का
शकुन्तला को 
पति-विस्मरण का 
शाप देते आए हैं

 

जानते हो
बलात्कार 
देवताओं का अधिकार क्षेत्र है
इन्द्र की तरह।
और ऋषि पति 
पत्नियों को पत्थर बनाते आए हैं
सतयुग से। (चोर चोर मौसेरे भाई)

 

तुम्हें पता है
राजकन्याओं की नियति?
डम्बो पति 
माँओं की आज्ञाएँ शिरोधार्य करते
पत्नियों को मिल बाँट चखते थे
शूरवीर पांडवों की तरह।
अम्बाएँ 
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ
लुढ़कती रही
अग्नि संचित करती रही
प्रतिशोध लेने को
जन्म जन्मान्तर तक 
द्वापर में।

 

याद है
राजरानी पत्नियों के
सतीत्व के निर्णायक सुप्रीम कोर्ट
धोबी घाट में लगते थे
और
धर्मपरायण राजा
सिर झुकाए दंड विधान मानते थे
त्रेतायुग में।

 

और कहते हैं कि
सफ़ेद संगमरमर से बना
आगरे का ताजमहल
एक बादशाह ने
अपनी पत्नी की कब्र हेतु
बनवाया था
मृत्युपरान्त का स्थायी निवास
कलिकाल में।
 

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