सॉरी सरजी! 

डॉ. अशोक गौतम

सरकार ने ऑफ़िस में काम के घंटे बढ़ाने की क़वायद करते हमारे ऑफ़िस में भी बायोमीट्रिक लगवा डाली तो दस दिन पहले जो साहब ऑफ़िस में बायोमीट्रिक लगने पर फूले न समा रहे थे, दस दिन बाद वही साहब बायोमीट्रिक से इतने तंग आ गए कि जितने वे तीस साल में अपनी बीवी से भी तंग नहीं आए थे। 

अब ऑफ़िस में बायोमीट्रिक लगने के बाद से साहब ही परेशान नहीं थे बल्कि वे भी परेशान थे जो ऑफ़िस हफ़्ते में चार ही दिन आते थे। कारण, अब उन्हें पक्का लगने लगा था कि न चाहते हुए भी अब तो हर रोज़ उन्हें दस और पाँच बजे रहना ही होगा। बीच में चाहे ग़ायब रहें तो रहें। सारा दिन तो भगवान भी उन्हें ऑफ़िस में नहीं बैठा सकते। परंतु इन दोनों के साथ ही साथ तीसरे वे भी परेशान हो गए थे जो वैसे तो हर रोज़ दस से पाँच ऑफ़िस में सिर खुजलाते हुए फ़ाइलों में उलझे रहते थे, पर अब बायोमीट्रिक लगने पर उन्हें भी लगने लगा था कि जो कभी-कभार उनका मन ऑफ़िस से ग़ायब होने को हो ही जाए तो लाख चाहने के बावजूद तब भी  वे ऑफ़िस से ग़ायब होने का आनंद लेने से वंचित हो जाएँगे। और फिर हो गया ऑफ़िस में बिन सूचना दिए ऑफ़िस से ग़ायब रहने के उनके मौलिक अधिकार का भी हनन। 

असल में जबसे इस ऑफ़िस में साहब ने ज्वाइन किया था, वे सबसे अधिक परेशान किसी से थे तो बस, वर्मा से थे जो हर शनिवार को हैडऑफ़िस की ऑरडिनरी से ऑरडिनरी चिट्ठी बाई-हैंड ले हवा हो लेते और चार दिन बाद ही तरह-तरह के बहाने सजाते आते। बायोमीट्रिक लगने के बाद उन्हें कम से कम साहब को इस बात का प्रसन्नता थी कि अब वे वर्मा की ओर से तो निश्चिंत हुए।

बायोमीट्रिक लगने के बाद अब जब पीउन से लेकर साहब तक जो भी सुबह ठीक दस बजे आता, पहले तो बायोमीट्रिक को जी भर गालियाँ देता और फिर इतनी ज़ोर से उस पर अपना अँगूठा मारता ज्यों वह अपनी हाज़िरी न लगा बायोमीट्रिक का टेंटुआ दबा रहा हो। बायोमीट्रिक में अपनी हाज़िरी दर्ज करवाने के बाद वह हर मन ही मन सरकार और बायोमीट्रिक ईजाद करने वाले को जी भर कोसता और फिर लंबी-लंबी साँसें लेता अपनी अपनी सीट पर पसर जाता। अब करवा ले सरकार उससे काम! वह काम नहीं करेगा तो नहीं करेगा। वह दस बजे ऑफ़िस आ तो जाएगा पर क्या काम करने को उसके हाथों को बायोमीट्रिक उठाएगी? पता नहीं यह बहुत समझदार सरकार इतनी सी बात क्यों नहीं समझती। अरे भैयाजी! जो जनता के काम करने होते तो क्या सरकारी विभाग में कुर्सी, स्टूल तोड़ने आते? 

दस दिन बाद ही बायोमीट्रिक के चलते ऑफ़िस के क्लास फ़ोर से लेकर क्लास वन का आलम यह हो गया कि पूरा ऑफ़िस इतना साहब से भी परेशान नहीं दिखता जितना बायोमीट्रिक से परेशान। साहब अपने से भी उतने नहीं परेशान जितने बायोमीट्रिक से परेशान। शर्मा ने तो इस आफ़त के आने के चौथे दिन बाद ही तय कर लिया था कि हालाँकि उसकी रिटायरमेंट को चार महीने अभी और बचे हैं, पर यही हाल रहा तो वह कल ही रिटायरमेंट ले लेगा। आख़िर इतनी जल्दी क्या पड़ी थी विभाग को उसके ऑफ़िस में बायोमीट्रिक लगवाने की? जहाँ तीस साल इंतज़ार किया, वह चार महीने बाद बायोमीट्रिक लगवाता तो कौन सा देश चाँद पर पहुँचने में सालों लेट हो जाता? 

पहले तो छुट्टियों का हिसाब-किताब ऑफ़िस के रजिस्टर में ही रहता था। बीस-बीस छुट्टियाँ लेने के बाद भी रजिस्टर में बाबू से मिल मिला, पी-पिला पौनी-शौनी एंटर करवाईं तो करवाईं, नहीं तो ऑफ़िस से बाहर होते हुए भी पूरी बेशर्मी से ऑफ़िस में। पर अब साहब सहित ज्यों ही सबको सरकार की इस हिडन चाल का पता चला कि अब तो मिनट-मिनट का हिसाब ऊपर दर्ज होगा तो सबके हाथ-पाँव फूल गए। तब साहब को भी लगने लगा था कि साली ये काहे की अफ़सरी हुई कि पीउन की तरह वे भी बायोमीट्रिक के आगे अपना अँगूठा लिए उसका मुँह ताकते खड़े रहें, हफ़्तों सरकारी काम के बहाने हवा होने वाले मिनट-मिनट का हिसाब ऊपर दें? समाजवाद हर जगह हो सकता है, पर साहब और मातहत के बीच तो डिस्टेंस रहना ही चाहिए न! कम से कम गणतंत्र में तंत्र को  तो लिबर्टी मिलनी ही चाहिए कि नहीं? 

बस, फिर क्या था! उन्होंने पल के हार्श डिसीज़न लेते बायोमीट्रिकी समाजवाद को ख़त्म करने का क्विक डिसीज़न लिया और ऑफ़िस के हर काम को पूरी लगन से ख़राब करने में माहिर केपी को जैसे थे, उन्हें वैसे ही पीउन को मौखिक आदेश दे अपने कमरे बुलवाया। केपी कुछ भी ग़लत काम को सही करने में उतने सिद्धहस्त नहीं थे जितने ठीक काम को ग़लत करने में माहिर थे। वे अपनी सीट का काम छोड़ हर काम करने को सदा आगे रहते ताकि हर साहब के आगे गुणी बने रहें। 

ज्यों ही साहब के आदेश पा केपी कान पर पेन के बदले स्क्रू ड्राइवर धरे अपने हाथ खुजलाते मुस्कुराते साहब के कमरे में प्रवेश किए तो साहब ने उन्हें अपनी गोद में बैठाने से पहले ही कहा, “यार केपी! बहुत परेशानी में हूँ। साहबी में एक दिन इतने बुरे दिन भी देखने पड़ेंगे, ऐसा दिन में लेने वाले सपने में भी नहीं सोचा था। शेर और बकरी एक ही बायोमीट्रिक के आगे खड़े हों, ये काहे की अफ़सरशाही है?”

“तो सर?” केपी भाँप गए थे कि आज उन्हें साहब के आगे अपने को साबित करने हेतु एक सही काम को ख़राब करने का पहला मौक़ा आख़िर मिल ही गया। अब वे उनके सामने भी अपने को सिद्ध साबित करके ही रहेंगे।

“यार! देखो तुम ऑफ़िस के हर सही काम को बड़ी शिद्दत से ख़राब करने का हुनर रखते हो। अब मैं चाहता हूँ कि... यार मैंने तुम-सा टेक्निकल बंदा अपनी पूरी नौकरी में नहीं सुना सो...,” साहब ने केपी की इधर-उधर से सुनी सुनाई प्रशंसा की तो केपी फूल कर कुप्पा हुए। 

“साहब! आप एक बार हुकुम तो दीजिए बस! फिर देखिए मेरे हुनरबंद हाथों का कमाल! सर! अपना रिकार्ड है कि मेरी ख़राब की ठीक चीज़ें फ़ैक्टरी में जाकर भी ठीक नहीं हुईं। फ़ैक्टरी वालों को भी पता नहीं चला कि ये चीज़ें ख़राब हुईं तो कैसे हुईं? ऑफ़िस में जब तक मैं हूँ न सर!  आपको ऑफ़िस की कोई भी चीज़ बाहर के किसी भी ऐरे-ग़ैरे से ख़राब करवाने की कोई ज़रूरत नहीं। जब तक ऑफ़िस में मेरे जैसा कुशल टेकनिशियन है तब तक...सर! मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा कि विगत साहबों की कसौटी पर खरा उतरने वाला केपी आपकी कसौटी पर भी चौबीस कैरेट शुद्ध  उतरे।”

“गुड! वैरी गुड! मुझे तुमसे यही उम्मीद थी केपी।”
  
“ख़राब क्या करना है सर?” कहते ही केपी के हाथ कान पर रखे स्क्रू ड्राइवर पर घूमने लगे। उनके दिमाग़ में एकाएक स्क्रू ड्राइवर ही स्क्रू ड्राइवर उग आए। उस वक़्त केपी ठीक चीज़ को ख़राब करने के लिए इतने व्यग्र हो उठे थे कि उस वक़्त जो साहब आदेश देते तो वे उनका सही दिमाग़ तक ख़राब कर देते पलक झपकते। 

"यार! पहले तो मैंने सोचा था कि बायोमीट्रिक एक बजे आने वालों और दो बजे भाग जाने वालों की टाँगों में टंगेल डाल देगी पर.…"

"पर अब क्या सर?"

"पर अब लगने लगा है कि... पहले तो मैं भी दो बजे लंच के बाद ही ऑफ़िस से बहाना बनाकर चला जाता था, पर अब...सच कहूँ तो दस दिन में ही पाँच बजे तक ऑफ़िस में बैठते हुए पीछे चेयर सोल होने लगे हैं।"

"तो साहब??"

"तो क्या! मैं चाहता हूँ कि तुम अपने हुनर को बताते हुए इस बायोमीट्रिक को भी सदा-सदा के लिए ख़राब कर दो ताकि... अगर तुम अबके भी अपने हुनर का कमाल दिखा पाए तो हफ्ता भर मेरी ओर से मस्ती फ़्री। चाहो तो, अभी से बायोमीट्रिक को ख़राब करने पर काम शुरू कर दो। मुझे कल सुबह तक हर हाल में बायोमीट्रिक ख़राब चाहिए तो बस ख़राब चाहिए," कह वे केपी का मुँह ताकने लगे तो केपी ने सिर झुकाए बोले, “सर! सॉरी! नो सकोप!"

"क्या मतलब तुम्हारा? मैंने तो सुना है कि तुम हर सही चीज़ को ख़राब करने में महारत रखते हो तो... कीप इट अप यार! तुम्हारा ये करिश्मा मुझे भी तो देखने को मिले। इसमें शरमाने वाली बात नहीं। जिस एक सरकारी चीज़ को ख़राब करने पर बीसियों कर्मचारियों का फ़ायदा हो रहा हो उसे भारतमाता की जय कह आँखें मूँद कर पूरे जोश के साथ ख़राब कर देना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है। यही सरकारी कार्यप्रणाली का शाश्वत नियम है। कई बार देशहित से बड़े अपने हित हो जाया करते हैं यार केपी!"

"सो तो ठीक है पर सर..." ज्यों ही आँखों ही आँखों में साहब के आगे केपी ने अपनी विवशता ज़ाहिर करते हाथ जोड़े तो साहब ने शंकालु होते पूछा, “आख़िर क्या बात है केपी? तुम्हारे मन में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर उसके प्रति कहीं मोह तो नहीं जाग गया?"

"ऐसा कुछ नहीं सर!" केपी ने उनके चरणों में स्क्रू ड्राइवर रखते कहा, “असल में सर! ऐसा कुछ नहीं जैसा आप सोच रहे हो। मैं तो हर क़िस्म की सरकारी संपत्ति का नौकरी में ज्वाइनिंग देने के बाद से ही कट्टर दुश्मन हो गया था। पर बात सर ये है कि…"

"खुल कर कहो केपी यार! देखो, इस वक़्त यहाँ मेरे तुम्हारे सिवाय को तीसरा नहीं।"

"सर! बात ये है कि... इस मशीन का पता ही नहीं चलता कि ये खुलती कहाँ से है?" 

"मतलब??? तुमने पहले भी कोशिश की है?"

"हाँ साहब! दूसरे ऑफ़िस वालों ने मुझे अपने ऑफ़िस की हाज़िरी मशीन ख़राब करने बुलाया था।"

"तो??"

"पूरे दो दिन रात लगातार उसे ख़राब करने में जुटा रहा था तब। पर पता ही न चला कि इसे खोलूँ तो कहाँ से खोलूँ?"

“मतलब??"

"सॉरी सर! नो स्कोप! अब तो बस भगवान ही हमारा रखवाला है। कोई चमत्कार ही इसे ख़राब कर सकता है सर," कह केपी ने स्क्रू ड्राइवर साहब के चरणों में  सिर झुकाने के बाद धरा और फिर सिर झुकाए उनके कमरे से पहली बार परास्त हुए से बाहर आ गए तो साहब बड़ी देर तक कातर भाव से कभी अपने चरणों में पड़े स्क्रू ड्राइवर को देखते रहे तो कभी दो बजे ही पाँच बजाने वाली घड़ी को। 

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