सिर-फिरा कबीरा

डॉ. राजेन्द्र गौतम

फूल खिले हैं 
तितली नाचे 
आओ इन पर गीत लिखें हम
भूख, गरीबी या शोषण से
कविता-रानी को क्या लेना
 
महानगर की 
चौड़ी सड़कें
इन पर बंदर-नाच दिखाएँ
अपनी उत्सव-संध्याओं में
भाड़ा दे कर भाँड बुलाएँ

हम हैं-- 
संस्कृति के रखवाले
इसे रखेंगे शो-केसों में 
मूढ़-गँवारों की चीखों से
शाश्वत वाणी को क्या लेना
 
लिए लुकाठी 
रहा घूमता
गली-गली सिर-फिरा कबीरा
दो कोड़ी की साख नहीं थी 
 कैसे उसको मिला हीरा
 
लखटकिया-
छंदों का स्वागत
राजसभा के द्वार करेंगे
निपट निराले
तेरे स्वर से 
इस ’रजधानी‘ को क्या लेना।
 

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