सिक्किम की यात्रा - 1

15-01-2020

सिक्किम की यात्रा - 1

डॉ. मनीष गोहिल

मनुष्य जन्म एक प्रवासी का रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त वह एक सफ़र ही करता है। यह सफ़र ज़िन्दगी के साथ का होता है। मनुष्य अवतार मिला है, तो उसको व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। कुदरत ने इतना सारा वैविध्य इस पृथ्वी पर दे दिया है कि उसके ख़ूबसूरत मंज़र को देखने में भी शायद यह जन्म अधूरा रहे। मेरी जिज्ञासा यही रही है कि इस मनुष्य जन्म में जितना हो सके बस घूमता रहूँ। गुजराती के प्रसिद्ध साहित्यकार निरंजन भगत कहते हैं कि- "इस पृथ्वी पर मनुष्य गृहवासी बना, ग्रामवासी बना, नगरवासी बना उससे पहले वह गुफावासी था, वनवासी था और उससे पहले वह प्रवासी था, आज भी है। मनुष्य सतत प्रवासी रहा है और रहेगा। इस सदी के आरंभ में वह अवकाश यात्री बना है।....रवीन्द्रनाथ ने गाया है.... आमि चंचल, आमिसुदूरेर पियासी..."1. सही में प्रवासी बनना मानो दुनिया को देखना।

जब से शिमला-मनाली की यात्रा की तब से लेकर लद्दाख के सफ़र तक पहाड़ ही पहाड़ देखे हैं। अत: पहाड़ियों पर घूमने का मेरा अनुभव अब विशेष हो गया है। हिमालय की पहाड़ियाँ को जो घूम लेता है, उसके लिए और पहाड़ियाँ घूमना आसान हो जाता है। एक बात है कि भौगोलिक हिसाब से हर पहाड़ी अपनी विशेष पहचान लिए हुए रहती है। जैसे लद्दाख की पहाड़ियाँ कोरे पत्थर और ऊपर बर्फ़ से ढकीं हैं, तो सिक्किम की पहाड़ियाँ पेड़ों से घिरी हुई हैं। यहाँ के पहाड़ पूरी तरह से हरे-भरे दिख रहे हैं। पहाड़ है पर सारे के सारे घनी झाड़ियों से लदे हुए। इन पहाड़ियों को देखने पर मन तृप्त हो जाता है, आँखें हरी-भरी हो जाती हैं। गुजराती के महान कवि उमाशंकर जोशी ने पहाड़ों को लेकर कविता लिखी है। - "भोमिया विना मारे भमवाता डुंगरा, जंगलनी कुंजकुंज जोवी हती, जोवी ती कोतरो ने जोवी ती कंदरा, रोता झरणांनी आंख ल्होवी हती.......आखो अवतार मारे भमवा डुंगरिया, जंगलनी कुंजकुंज जोवी फरी, भोमियो भूले एवी भमवी रे कंदरा, अंतरनी आंखड़ी ल्होवी जरी...."2 उमाशंकर की कविता व्यक्ति के घुमक्कड़पने को प्रस्तुत कर मनुष्य अवतार को व्यर्थ न गँवाने की बात करती है।

इस बार मैं भारत के ’सेवेन सिस्टर’ में जिसे गिना जाता है, ऐसे सिक्किम के सफ़र पर गया था। मेरा सफ़र बागडोगरा एयरपोर्ट से शुरू हुआ। हर बार की तरह मन में एक प्रकार की जिज्ञासा लिए मैं पश्चिम बंगाल के बागडोगरा एयरपोर्ट पर उतरा। सामान्य सा एयरपोर्ट है। जो हवाई सफ़र का नयापन जो पहली सफ़र में होता है, वह बाद के सफ़र में नहीं होता। मेरे लिए हवाई सफ़र अब एक रूटीन बन गया है। सो अब वो नयेपन का एहसास नहीं रहता। बागडोगरा से क़रीबन चार घण्टे का रास्ता है गेंगटोक जाने का। दोनों के बीच की दूरी क़रीबन 123 कि.मी. की है। यह नेशनल हाई-वे दस से जुड़ा है। गेंगटोक सिक्किम की राजधानी है और सिक्किम का सबसे बड़ा और आकर्षक शहर।

सिक्किम को सिखिम भी कहा जाता है। यह एक अँगूठे के आकार का राज्य है। सिक्किम पश्चिम में नेपाल उत्तर तथा पूर्व में तिब्बत जो अभी चीन के शासन में है और दक्षिण-पूर्व में भूटान से तथा पश्चिम बंगाल इसके दक्षिण में स्थित है। भौगोलिक रूप से यह राज्य तीनों ओर से देश की सीमा के लिए अत्यन्त संवेदनशील भू भाग में गिना जाएगा। मन में लम्बे समय से इच्छा थी कि कब भारत के पूर्व में सफ़र करूँ। जो अब पूरी हुई। मूलत: सिक्किम भारत के साथ आज़ादी के कई वर्षों बाद जुड़ा। तब तक सिक्किम में राजाशाही चल रही थी। सिक्किम पर नाम ग्याल वंश का राज था पर उनके द्वारा प्रजा के साथ नाइन्साफ़ी के चलते प्रजा में बग़ावत हुई और जनमत के द्वारा 1975 में भारत में विलीन कर दिया गया। तब से सिक्किम भारत का एक अभिन्न अंग बन गया है। सिक्किम को तिब्बती भाषा में चावल की घाटी से जाना जाता है। जबकि सामान्य लिम्बू भाषा के शब्द सु अर्थात् नवीन तथा ख्यिम अर्थात् महल या घर को जोड़कर बना है। पूरा अर्थ होता है- नवीन महल या घर। यहाँ पर हिंदी, अँग्रेज़ी, भूटिया, नेपाली, लेप्चा, लिंबू प्रमुख भाषाएँ हैं। पर ज़्यादातर व्यवहार अँग्रेज़ी में चलता है। यहाँ पर हिन्दु और बौद्ध धर्म का प्रचलन विशेष है। पूरा सिक्किम बौद्ध मोनेस्टरी से भरा पड़ा है। सिक्किम का सुंदर नज़ारा सड़क के किनारों पर लहराती रंगबिरंगी ध्वजाओं से खिल उठता है। ध्वजाओं ने मुझे याद दिला दी लद्दाख की। लद्दाख में भी बौद्ध धर्म के प्रतीक समान फरफराती ध्वजाएँ आँखों को एक प्रकार का सुकून देती रहतीं थीं।

बागडोगरा से हम भारत के नये घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। जैसे-जैसे मेरी कार गेंगटोक की ओर पहाड़ी चढ़ रही थी वैसे-वैसे वातावरण में एक ठंडक का एहसास हो रहा था। मैं अहमदाबाद की पैंतालीस डिग्री गरमी से दौड़ता हुआ सिक्किम के ठंडे मौसम में पहुँच रहा था। गेंगटोक में मई के महीने में भी क़रीबन चौदह से सोलह डिग्री तापमान रहता है। रास्ता घुमावदार था। हमारा ड्रायवर अनुभवी था सो ट्रैफ़िक होने के बावजूद भी हमें पौने चार घण्टे में गेंगटोक हमारे होटल पर ले आया। रास्ते भर मैंने अपने टूर मैनेजर से कई बातों की जानकारी ले ली। उसके द्वारा ज्ञात हुआ कि दूसरे दिन हमें नाथुला पास जाना है, पर नाथुला पास का परमिट मिलेगा तो ही हम वहाँ जा सकेंगे, परमिट नहीं मिला तो सिर्फ़ बाबा मंदिर तक ही जा सकेंगे। मैनेजर की बात ने मुझे थोड़ा निराश किया। पर एक अजीब आत्मविश्वास था कि हम नाथुला पास जाकर ही आयेंगे। सिक्किम गवर्मेण्ट ने कई स्थान पर जाने के लिए परमिट कम्पलसरी कर दिए हैं। परमिट के बिना आप उन स्थानों पर नहीं जा सकते। होटल पर जाने के बाद मैनेजर मेरे कमरे में आया और दूसरे दिन के कार्यक्रम का ब्यौरा देकर मेरे पासपोर्ट फोटो और पहचान पत्र की प्रतिलिपि ले गया और कहता हुआ गया कि मैं नाथुला पास के परमिट के लिए प्रयत्न करता हूँ। मन में थोड़ी आशा बँधी जिससे खाने में थोड़ा मन लगा। अहमदाबाद से प्रात: चार बजे का निकला रात को पौने नौ के क़रीब गेंगटोक पहुँचा था। होटल अच्छा साफ़–सुथरा था।

भले हवाई सफ़र हो पर कनेक्टिविटी में समय काफ़ी बर्बाद होता है। सिक्किम का अपना एयरपोर्ट नहीं है। पर अब सिक्किम का एयरपोर्ट तैयार हो चुका है, बस उसका उद्घाटन बाक़ी है। बाद में सिक्किम की सीधी फ़्लाइट मिलेगी। हमारे देश में विकास के नाम पर सरकारें बन जाती हैं, पर जो प्रजा के साथ जुड़ी हुई बातें हों तो भी उद्घाटन नामक बिमारी को पकड़कर रखना पड़ता है और विकास की धज्जियाँ उड़ जाती हैं। ड्राइवर से पता चला था कि एयरपोर्ट की टेस्टिंग भी हो चुकी है। कुछ फ़्लाइट लैंण्ड और टेकऑफ़ भी हुई हैं। बस तैयार एयरपोर्ट उद्घाटन की राह देख रहा है। इधर मैं थका हुआ दूसरे दिन के सफ़र को मन में लिए सोने की तैयारी कर रहा था।

मेरे लिए सिक्किम की यात्रा महज़ एक यात्रा नहीं पर उससे कई गुना ज़्यादा एक नये प्रदेश के बारे में जानना था। मैं कोई भी जगह मात्र घूमने के लिए नहीं जाता पर उस स्थान की भौगोलिक तथा उस स्थान से जुड़ी सारी जानकारी को प्राप्त करना महत्वपूर्ण समझता हूँ। अत: यहाँ पर आने से पूर्व मैंने यहाँ कि सारी जानकारी प्राप्त कर ली थी। प्रात: आठ बजे हमें तैयार रहने को कहा गया था। सो हम ब्रेकफ़ास्ट करके होटल के लाउन्ज में आ गये थे। आज गेंगटोक का मौसम बादलों से घिरा हुआ था। धूप अभी तक नहीं निकली थी। शरीर को ठंडी का एहसास हो रहा था। थोड़ी ही देर में हमारी कार आ गयी और हम लोग नाथुला के लिए रवाना हुए। कार गेंगटोक के सँकरे रास्तों पर धीरे–धीरे आगे बढ़ रही थी, पर मेरी आँखें तो शहर को देखने में व्यस्त थीं। पहली बार सिक्किम की राजधानी को देख रहा था। सँकरे रास्तों से भरा हुआ शहर था। पूरा गेंगटोक, रास्ते के किनारों पर पहाड़ियाँ काट-काटकर बनाया गया था। घर की ऊपरी मंज़िल घर की छत भी हो सकती थी या प्रवेश द्वार। बाद में नीचे और कमरे। ज़्यादातर घर हों या होटल ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं। मुझे पता चला कि यहाँ पर ट्रैफ़िक के नियम बड़े कड़े हैं, रखने पड़े नहीं तो ट्रैफ़िक जाम ही मिले। कोई भी गाड़ी ओवरटेक नहीं कर सकती। आगेवाली गाड़ी के पीछे-पीछे ही जाना है और बिना स्टैंड के गाड़ी को रोका नहीं जा सकता। ख़ासकर टैक्सीवालों को। पूरे शहर में पार्किंग की बहुत ही सीमित जगह है। प्राइवेट व्हीकल्स इसीलिए कम दिख रहे थे। शहर में ही कई जगह ऊँचे रास्तों से होकर मेरी कार नगर से बाहर आ गयी थी। अब मुझे दूर–दूर पहाड़ियाँ दिखायी देने लगीं थीं।

क़रीबन सत्तावन किलोमिटर की दूरी पर स्थित है नाथुला पास। पहाड़ियों में सफ़र लम्बा रहता है। सीधी–सी बात है कि गाड़ी की स्पीड औसतन पैंतीस-चालीस की ही रहेगी। सो सत्तावन किलोमीटर की दूरी तय करने में हमें क़रीबन पौने दो घण्टे लगे। ड्रायवर ने चांगु झील से पहले कार को रोक दिया। वहाँ पर कुछ दुकानें बनी हुईं थीं। जहाँ से हमें नाथुला के लिए हॉल बूट और जैकेट्स किराये पर लेने थे। क्योंकि नाथुला में बर्फ़ थी, सो बर्फ़ में चलने के लिए हॉल बूट की ज़रूरत पड़ सकती थी। मैंने मात्र हॉल बूट ही लिए मेरे पास मेरा जैकेट थी। हर पहाड़ी पर जहाँ ऊँचाई पर जाना होता है, बीच रास्ते में ऐसा स्थान आता ही है, जहाँ पर ये सारी चीज़ें मिलती हैं और साथ ही साथ ड्रायवर लोगों का कमीशन भी बनता है। हम भी जानते हैं कि इन लोगों के लिए टूरिस्ट सीज़न ही कमाने के लिए होता है। मुझे मेरा पहला पहाड़ी सफ़र याद आ गया जो था रोहतांग का। वहाँ पर भी हमारे ड्रायवर ने हमें बर्फ़ के बूट और जैकेट्स किराये पर दिलवाये थे। अब हम नाथुला पास के नज़दीक आ गए थे। रास्ते में दो स्थान पर परमिट के हिसाब से कार और यात्रियों को चेक किया गया। जैसे-जैसे हम ऊपर जा रहे थे कोहरा छाया हुआ मिल रहा था। कार के बाहर रास्ते के किनारे पर बर्फ़ दिखायी देने लगी थी। चारों ओर फैली पहाड़ियों पर बर्फ़ दिखायी देने लगी थी। रास्ता धुँध से पटा हुआ था। कार से उतरने से पहले ही मैंने जैकेट पहन ली थी।

मैं उस स्थान पर खड़ा था जो भारत का अंतिम उत्तर-पूर्वी हिस्सा था। यह भाग समुद्र की सतह से 14,140 फ़ुट पर स्थित है। आगे चीन की सीमा शुरू हो रही थी। वास्तव में यह सीमा तिब्बत की है। पर चीन ने कुछ सालों से अपने साथ जोड़ दिया है। नाथुला पास को नाथुला दर्रा से भी जाना जाता है। यह भारत और चीन का ज़मीन से जुड़ा भाग है। यह दर्रा दक्षिण में तिब्बत की चुम्बी घाटी से जुड़ता है। सन् 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। पर बाद में दोनों देशों के बीच के सौहार्द भरे संबंधों को देखकर 5 जुलाई 2006 में व्यापार हेतु खोल दिया गया। हमारे लिए यह रास्ता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण रहा है, क्योंकि कैलाश मानसरोवर की यात्रा इस रास्ते से भी होती है। अत: हमारी श्रद्धा का मार्ग रहा है नाथुला दर्रा। इस बार कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए पुन: इस रास्ते को खोल दिया गया है। पीछली बार भारत-चीन के बीच विवाद के चलते चीन ने इस रास्ते को बंद कर दिया था। इस दर्रे को प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा भी कहा जाता है। क्योंकि एक समय इसी रास्ते से भारत का दुनिया के अन्य देशों के साथ रेशम का व्यापार होता था। मैं ऐसे प्राचीनतम रेशमी मार्ग पर खड़ा था। 

वाक़ई में आज यह रास्ता रेशमी बन गया था बर्फ़ की वजह से। मैंने नज़रें घुमाईं तो चारों तरफ बर्फ़ ही बर्फ़ थी। साँय साँय करती हवा चल रही थी। कार से नीचे उतरते समय शरीर को बेलन्स देना ज़रूरी था। थोड़े पल मैं रुका रहा। आर्मी जवानों के अलावा उस समय ओर कोई नहीं था। हम ही पहले आ गए थे। मुझे बताया गया कि सामने के टीले पर जाना है। टीला पूरी तरह से बर्फ़ से लदा हुआ था। अब मेरे हॉल बूट काम आ रहे थे। जैसे ही मैंने चढ़ना शुरू किया तो क्षणभर लगा कि मुझे कुछ हो रहा है। शरीर में कुछ अजीब-सा लग रहा है। मैं रुक गया और अनुभव से सीखी बातों से आराम से लंबी साँसें लेने लगा। हाँ, अब ठीक लग रहा था। बस फिर तो बर्फ़ के टीले पर चढ़ना शुरू कर दिया। बर्फ़ इतनी थी कि पैर का पंजा पूरा बर्फ़ में धँस रहा था। धीरे-धीरे करके मैं बीच में बने आर्मी के केफ़ेटेरिया में जा पहुँचा। आर्मी ज़वान ने प्यार से कहा कि सा'ब गरमा गरम चाय कॉफ़ी लीजिए और फिर ऊपर जाइए। ठंड भरे मौसम में शरीर को कॉफ़ी की ज़रूरत थी, सो कॉफ़ी पीने के लिए ओर्डर दे दिया। कॉफ़ी बनानेवाली जो लड़की थी उसे मैं पहचान गया। वो मेरे साथ चेक पोस्ट से आर्मीं के अफ़सर के कहने पर हमारी कार में यहाँ आयी थी। पता चला कि वह रोज़ यहाँ आती है। वह केफ़ेटेरिया में नौकरी करती थी। मुझे यह भी बताया गया कि यहाँ से जो भी कुछ ख़रीदते हैं वह आर्मी के फंड में जमा होता है। ख़ुशी हुई कि मैं जो कॉफ़ी पी रहा था उसके पैसे भी आर्मी फंड में जमा होंगे। लौटते वक़्त मैंने इसीलिए एक तैल चित्र ख़रीदा, जो नाथुला दर्रे का मानचित्र था, पर मैं उसे कार में ही भूल गया। कॉफ़ी ने थोड़ी राहत दी। अब मैं फिर से आगे बढ़ रहा था। थोड़ी ही ऊँचाई पर वह स्थान था, जो भारत का अंतिम ज़मीनी स्थान था। आर्मी ने यहाँ पर अपनी चौकियाँ बनाईं हैं। एक मात्र रस्सी से और छुट-पुट तार की फ़ेंसिंग से दो देश, भारत और चीन खड़े थे। मैं जहाँ खड़ा था वहाँ से दो फ़ुट की दूरी पर चीन था। मैं उस धरती को छू भी सकता था पर आर्मी के जवान की चेतावनी से हम उससे दूर रहे। आर्मी के जवान हम लोगों को वहाँ की भौगोलिक जानकारी दे रहा था। थोड़ी दूरी पर एक पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए बताया कि वह पहाड़ी भारत में है, जो इस स्थान से थोड़ी आगे थी। पहाड़ी पर हमारी चौकी थी जिसमें हमारे सैनिक डटे हुए थे। वह टीला बर्फ़बारी की वजह से धुँधला दिखायी दे रहा था। पर हाँ तिरंगा लहराता दिखायी दे रहा था। यहाँ की सीमा एक लाईन में सीधी नहीं है, पर टेढ़ी-मेढ़ी है। शायद हमारी तरह चीन के लोग सीमाओं को देखने नहीं आते होंगे इसीलिए उनकी तरफ़ कोई नागरिक नहीं थे। यहाँ से क़रीबन 373 किमी तिब्बत की राजधानी लाह्सा है। उनकी सीमा पर बस एक भवन था और वहाँ पर उनका ध्वज लहरा रहा था। उनके सैनिक भी कुछ पल के लिए भवन से बाहर आये और वापिस चले गये। कितना सुकून था कि भारत की इस सीमा पर हमारे सैनिकों को तनाव जैसा नहीं लग रहा था। जबकि पाकिस्तान की सरहद पर हमारे सैनिक हर क्षण तनाव में रहते हैं। मैंने जवान से यही कहा कि सर, आपकी बदौलत हम हमारे घरों में बड़े सुकून से सोते हैं। उस जवान की आँखों में एक चमक सी दौड़ गयी। उस चमक ने मुझे देशभक्ति के जज़्बे का एहसास करा दिया। 

यहाँ पर ज़्यादा समय रुकने नहीं दिया जाता। तुरन्त आर्मी जवान ने आदेश दे दिया कि अब आप लोग यहाँ से प्रस्थान करें। मेरे मन में खरदुंगला की सफ़र याद आ गयी। वहाँ पर भी ज़्यादा समय रुक नहीं सकते थे। पतली सायँ सायँ करती हवा आपको कहीं उड़ा न ले जाए का ख़तरा रहता था। उतरते वक़्त तो मुझे फिसलन से बचकर उतरना पड़ा। एक पल में मौसम ने करवट बदल ली। ऊपर चढ़ते समय धूप के दर्शन हुए थे, जो अब अचानक कोहरे में बदल गया। धीरे-धीरे छींटे पड़ने शुरू हो गये। इस स्थान पर फोटोग्राफी करना वर्जित है, सो इस स्थान के फोटो मैं नहीं ले सका। तभी मुझे चिंता हुई मेरे जैकेट की, क्योंकि मेरा जैकेट वॉटरप्रूफ नहीं था। पर अच्छा हुआ कि बारिश न होकर सिर्फ़ कोहरा छा गया। जहाँ पर हमारी कार खड़ी थी वो भी धुँधली दिख रही थी। धीरे-धीरे मैं नीचे आ गया। बस हम उतर रहे थे तभी और टूरिस्ट आने लगे थे। अच्छा था कि हम जल्दी आ गये। नीचे रोड की साईड में बर्फ़ के ढेर के ढेर दिखायी दे रहे थे। हमने यहाँ पर कैमेरे से कुछ तस्वीरें खींच ली। अब बारिश शुरू हो चुकी थी। ड्रायवर ने इशारा किया कि सा'ब, अब यहाँ से चलने में ही भलाई है। हमारी कार नाथुला से नीचे उतर रही थी। मन ख़ुश था कि जो जगह देखने के लिए परमिट लेकर आना पड़ता है, उसे देखने का सौभाग्य मिल गया। गर मान लो हमें परमिट नहीं मिला होता तो!

मेरी कार अब जा रही थी उस स्थान पर जो इतिहास में एक रहस्य बन गया है। मैं बात कर रहा हूँ बाबा मंदिर की। जो इसी रास्ते में आता है। यह हमारे भारतीय आर्मी जवान की बात है। इतिहास कहता है कि बाबा मंदिर सीमा पर तैनात सुरक्षा जवानों ने बनाया है और यह कोई ईश्वर नहीं पर एक आम आर्मी जवान का मंदिर है। इनका पूरा नाम बाबा हरभजनसिंह है। हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, ज़िला गुजरांवाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था। हरभजन सिंह 24 वीं पंजाब रेजिमेंट के जवानथे। जो कि 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक दुर्घटना में मारे गए। हुआ यूँ कि एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे, तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफ़ी आगे निकल गया। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने ख़ुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपने शव की जगह बताई। सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद कर अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उनमें आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया। हालाँकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया, जो कि ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज़्यादा ऊँचाई पर स्थित है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।

बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे हैं। इनके लिए उन्हें बाक़ायदा तनख़्वाह भी दी जाती है, उनका सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें कुछ साल पहले तक 2महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रेन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिकों के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था, क्योंकि उस वक़्त सैनिकों को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी। लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था, जिसमें कि बड़ी संख्या में जनता इकट्ठी होने लगी थी। कुछ लोग इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे। इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते हैं। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है। जिसमें प्रतिदिन सफ़ाई करके बिस्तर लगाया जाता है। बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं। कहते हैं कि रोज़ पुनः सफ़ाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सिलवटें पाई जाती हैं।

बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिकों और लोगों, दोनों की ही आस्थाओं का केंद्र है। इस इलाक़े में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा को माथा टेकने आता है। इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगों में एक अजीब सी मान्यता यह है कि यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते हैं। इस पानी को पीने से लोगों के रोग मिट जाते हैं। इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन निषेध होता है। यह सब मैं रूबरू देखकर अचंभित रह गया। मन में कई प्रश्न ऊठे पर उसे दूर कर दिया। जहाँ पर आस्था का विषय आए, वहाँ पर मन को ओर विचारों से अलिप्त कर देना चाहिए। मैं नतमस्तक बाबा की तस्वीर को नमन कर रहा था और साथ ही साथ उन बातों को याद कर रहा था, कि कितना महान इतिहास है कि एक जवान हमारे भारत-चीन की सीमा की रखवाली मृत्यु पश्चात् भी कर रहा है। मैं धन्य-धन्य हो गया, क्योंकि बाबा हरभजन के बारे में मैंने टीवी पर कितनी बार डोक्युमेन्ट्रीस देखीं थीं। तब से मन में तय कर लिया था कि जब भी सिक्किम जाने का मौक़ा मिलेगा तो ज़रूर बाबा मंदिर अवश्य जाऊँगा। आज यह सपना सच सिद्ध हो रहा था। मुझे तो यहाँ पर मिल रहे किशमिश के प्रसाद का लालच अधिक था। कारण था कि ठंडा महौल और ऐसे में किशमिश खाने को मिल जाए तो कौन बंदा है, जो ऐसे प्रसाद को लेने से इन्कार करें। मंदिर के चारों ओर ढेर सारी भीड़ जमा हो गयी थी। जिन लोगों को नाथुला का परमिट नहीं मिलता वो लोग भी यहाँ तक तो आ ही सकते हैं। मंदिर के सामने बने आर्मी केफ़ेटेरिया के लाउडस्पीकर पर देश भक्ति के गीत बज रहे थे। ’मेरा रंग दे बसंती चोला....रंग दे..’ पूरा माहौल देशभक्ति से सराबोर था। मंदिर से दूर सुंदर और विशाल बाबा भोलेनाथ की समाधिस्थ प्रतीमा ध्यान खींच रही थी। उसके पीछे एक सुंदर झरना बह रहा था। मानो एसा लग रहा था कि बाबा भोलेनाथ की जटा से गंगा का अवतरण हो रहा हो। इतने सुदर नयनरम्य दृश्य को देखकर कैलाश तीर्थ की याद हो आना स्वाभाविक ही था।

अब मंदिर से थोड़ी दूरी पर ही स्थित छांगु या चांगु लेक की ओर जा रहे थे। कई लोग इस झील को छांगु लेक के नाम से पुकारते हैं, तो कई लोग चांगु के नाम से। जबकि अँग्रेज़ी में चांगु लेक को त्सोंगमो झील (TSONGMO LAKE) भी कहा जाता है। यह झील 3780 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। आज मौसम में बार-बार परिवर्तन हो रहा था। सो जब हम चांगु लेक पहुँचे बारिश हो रही थी और भारी मात्रा में कोहरा छाया हुआ था। पर जब हमारी कार रुकी तो बारिश भी रुक गयी। पहाड़ियों के मौसम का ऐसा ही है। मुझे 'राम तेरी गंगा मैली' के गीत की पंक्तियाँ याद आ गयी… "हुस्न पहाड़ों का क्या कहना के बारहों महीने यहाँ मौसम जाड़ों का...." सही है कि पहाड़ियों के मौसम का कोई ठिकाना नहीं। चांगु लेक की गहराई औसतन पचास फ़ुट के क़रीब है। यह झील सर्दियों में पूरी तरह से बर्फ़ में परिवर्तित हो जाती है। आज बर्फ़ थी पर झील के सामने के पहाड़ों पर। अब मौसम सुहाना हो गया था। यह झील हर मौसम में रंग बदलती रहती है। झील के किनारे मैंने तिब्बती पोशाक में कुछ फोटो खिंचवाए और झील के पास में ही बने रोप-वे में ऊपर जा कर बर्फ़ का आनंद लिया। रोप-वे ऊपर एक पहाड़ी पर ले जाता है। मुझे ऐसा लगा था कि ऊपर से मैं पूरी झील को देख सकूँगा पर जब मैं ऊपर गया तो देखा चारों ओर बर्फ़ से भरे पहाड़ नज़र आ रहे थे। मौसम ने फिर अंगड़ाई ली, बारिश फिर से शुरू हो गयी। थोड़ी दूरी पर कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। नीचे झील को देखने का मेरा अनुमान मौसम ने ग़लत सिद्ध कर दिया। हाँ, वहाँ पर कई कपल्स बर्फ़ की बारिश का आनंद उठा रहे थे। मैं भी बर्फ़ को हाथ में लेकर उसके गोले बनाकर साथी मित्रों पर फेंक रहा था। लग रहा था कि वहाँ ज़्यादा समय ठहरना उचित नहीं था, सो मैं नीचे उतरने के लिए वापिस रोप-वे स्टेशन पर आ गया। नीचे आने पर हम लोगों ने जहाँ से होल बूट लिए थे उसकी दुकान पर आ गए। वहीं साथी मित्रों ने चाय-नाश्ता किया। दोपहर हो गयी थी। अब हमें गेंगटोक वापिस जाना था। हमारी कार नाथुला को बाय-बाय करके गेंगटोक के रास्ते पर जा रही थी। मन में ख़ुशी थी कि चलो आज फिर एक भारतीय सीमा के दर्शन कर लिए। पता नहीं अब कब इस स्थान पर आयेंगे। ईश्वर ने चाहा तो इस रास्ते कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए जाना है। फ़िलहाल तो भोलेनाथ का स्मरण कर अपनी कार के बाहर दिखायी दे रही सुंदर पहाड़ियों को निहार रहा था। आगे का सफ़र शुरू होनेवाला था लाचुंग का। उसका वर्णन दूसरे भाग में रहेगा।

- क्रमशः

संदर्भ : 

  1.  निरंजन भगत, विदिशा बुक के फ्लैप पर से, प्रकाशक-आर. आर शेठनी कंपनी, अहमदाबाद।

  2. समग्र कविता, उमाशंकर जोशी, ओगस्ट-1932

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