शैलेश मटियानी और उनकी कविताएँ

01-05-2020

शैलेश मटियानी और उनकी कविताएँ

डॉ. पवनेश ठकुराठी

24 अप्रैल पुण्य तिथि पर विशेष

 

शैलेश मटियानी आधुनिक हिन्दी साहित्य संसार में नयी कहानी आन्दोलन के प्रसिद्ध कथाकार थे। उनके विपुल और उत्कृष्ट साहित्य सृजन का ही परिणाम है कि प्रतिवर्ष चयनित शिक्षकों को उत्तराखण्ड सरकार द्वारा 'शैलेश मटियानी राज्य शिक्षक पुरस्कार' प्रदान किया जाता है।

कथाकार शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जनपद में स्थित बाड़ेछीना नामक गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचन्द्र सिंह मटियानी था। आपके पिता का नाम बिशन सिंह मटियानी और माता का नाम श्रीमती लक्षमी देवी था। बारह वर्ष की अवस्था में आपके माता-पिता का देहांत हो गया। तब आप पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे। इसके बाद आप अपने चाचा लोगों के संरक्षण में रहे। आर्थिक कठिनाइयों के कारण आपकी पढ़ाई बीच में ही रुक गई। इस बीच आपको बूचड़खाने तथा जुए की नाल उघाने का काम करना पड़ा। पाँच साल बाद 17 वर्ष की उम्र में आपने फिर से पढ़ना शुरू किया।

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आपने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1951में आप रोज़गार की तलाश हेतु गाँव छोड़कर में दिल्ली आ गये। यहाँ आप 'अमर कहानी' के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के संपर्क में रहे। इसी बीच आपको रोज़गार हेतु इलाहाबाद, मुजफ्फरनगर, दिल्ली, बंबई आदि कई स्थानों में भटकना पड़ा। 1956 में आपको बंबई के श्रीकृष्णपुरी हाउस में काम मिला, जहाँ आपने अगले साढ़े तीन साल तक कार्य किया और अपना लेखन जारी रखा। बंबई से फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए आप इलाहाबाद आ गये और कई वर्षों तक वहीं रहे। 1992 में छोटे पुत्र की मृत्यु के बाद आपका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। शैलेश मटियानी जीवन के अंतिम वर्षों में हल्द्वानी आ गए। विक्षिप्तता की स्थिति में ही 24 अप्रैल, 2001 को उनकी मृत्यु दिल्ली के शहादरा अस्पताल में हुई।

शैलेश मटियानी ने 1950 से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं। प्रारंभ में वे रमेश मटियानी 'शैलेश' नाम से लिखते थे। उनकी आरंभिक कहानियाँ 'रंगमहल' और 'अमर कहानी' पत्रिका में प्रकाशित हुई। उन्होंने 'अमर कहानी' के लिए 'शक्ति ही जीवन है' (1951) और 'दोराहा' (1951) नामक लघु उपन्यास भी लिखे। उनका पहला कहानी संग्रह 'मेरी तैंतीस कहानियाँ' 1961 में प्रकाशित हुआ।

शैलेश मटियानी हिंदी जगत में मुख्यतः कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने लगभग 20 से अधिक कहानी संग्रह और 30 से अधिक उपन्यास हिंदी साहित्य को प्रदान किये। शैलेश मटियानी ने मेरी तैंतीस कहानियाँ (1961), दो दुखों का एक सुख (1966), दूसरों के लिए (1967), सुहागिनी तथा अन्य कहानियाँ (1968), सफर पर जाने के पहले (1969), हारा हुआ (1970), अतीत तथा अन्य कहानियाँ (1972), मेरी प्रिय कहानियाँ' (1972), पाप मुक्ति तथा अन्य कहानियाँ' (1973), हत्यारे (1973), बर्फ की चट्टानें (1974), जंगल में मंगल (1975), महाभोज (1975), चील (1976), प्यास और पत्थर (1982), नाच जमूरे नाच (1981), माता तथा अन्य कहानियाँ (1993), भविष्य तथा अन्य कहानियाँ, अहिंसा तथा अन्य कहानियाँ, भेंड़े और गड़ेरिए आदि कहानी संग्रह लिखे हैं।

इन्होंने बोरीवली से बोरीबन्दर (1959), कबूतरखाना (1960), हौलदार (1961), चिट्‌ठीरसैन (1961), तिरिया भली न काठ की (1961), किस्सा नर्मदाबेन गंगू बाई' (1961), चौथी मुट्ठी (1961), बारूद और बचुली (1962), मुख सरोवर के हंस (1962), एक मूठ सरसों (1962), बेला हुई अबेर (1962), कोई अजनबी नहीं (1966), दो बूँद जल (1966), भागे हुए लोग (1966), पुनर्जन्म के बाद (1970), जलतरंग (1972), बर्फ गिर चुकने के बाद (1975), उगते सूरज की किरण (1976), छोटे-छोटे पक्षी (1977), रामकली (1978), सर्पगन्धा (1971), आकाश कितना अनंत है (1971), उत्तरकाण्ड (1980), डेरेवाले (1980), सवित्तरी (1980), गोपुली गफूरन (1981), बावन नदियों का संगम (1981), अर्द्ध कुम्भ की यात्रा (1983), मुठभेड़ (1983), नागवल्लरी (1985), माया सरोवर (1987), चंद औरतों का शहर (1992) आदि उपन्यासों का सृजन किया।

मटियानी जी के कई निबंध संग्रह एवं संस्मरण भी प्रकाशित हुए। मुख्य धारा का सवाल, कागज की नाव, राष्ट्रभाषा का सवाल, यदा कदा, लेखक की हैसियत से, किसके राम कैसे राम, जनता और साहित्य, यथा प्रसंग, कभी-कभार, राष्ट्रीयता की चुनौतियां, किसे पता है राष्ट्रीय शर्म का मतलब आदि उनके निबंध संग्रह हैं। लेखक और संवेदना (1983 ) शीर्षक से उनका एक पत्र संकलन भी प्रकाशित हुआ है। बिल्ली के बच्चे, मां की वापसी, कालीपार की लोक कथाएं, हाथी चींटीं की लड़ाई, चांदी का रुपैया और रानी गौरेया, फूलों की नगरी, भरत मिलाप, सुबह के सूरज आदि इनकी बाल साहित्य संबंधी रचनाएँ हैं। मटियानी जी ने 'विकल्प' और 'जनपक्ष' नामक दो पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

शैलेश मटियानी को साहित्य सेवा हेतु कई पुरस्कार व सम्मान भी प्राप्त हुए। उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत हुआ। 'महाभोज' कहानी पर उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘प्रेमचंद पुरस्कार' प्राप्त हुआ। उन्हें बिहार सरकार की ओर से ‘फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से शारदा सम्मान, संस्थागत सम्मान, देवरिया केडिया संस्थान द्वारा साधना सम्मान, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा लोहिया सम्मान, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार आदि पुरस्कारों से नवाज़ा गया। 1994 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डी.लिट.' की मानद उपाधि प्रदान की।

शैलेश मटियानी ने प्रसिद्धि प्रमुखतः एक कथाकार के रूप में प्राप्त की। हिंदी
 जगत उन्हें एक श्रेष्ठ कथाकार के रूप में पहचानता है। प्रसिद्ध कथाकार राजेंद्र यादव ने उनकी कहानियों के विषय में कहा है- "वे उन कहानीकारों में हैं, जिनके पास सबसे अधिक संख्या में 10-12 की संख्या में ए-वन कहानियाँ हैं। प्रेमचंद सहित हम सब के पास 5-6 से ज्यादा टॉप की कहानियाँ नहीं हैं, जो कहानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वस्तर पर खड़ी हो सके। मेरे पास 2-4, भारती और राकेश के पास 2-4 होंगी। बाक़ी की सभी एक मिनिमम स्टैंडर्ड हैं परंतु जिसे आउटस्टैंडिंग कहानी कहते हैं वो नहीं है। उनके पास सबसे ज़्यादा हैं।"

मूलतः कथाकार होने के बावजूद मटियानी जी ने कुछ कविताएँ भी लिखी हैं। संख्या की दृष्टि से ये कविताएँ बहुत कम हैं। वस्तुतः अधिकांश लेखकों की तरह ही शैलेश मटियानी के लेखन की शुरुआत भी कविता लेखन से ही हुई थी। इनकी पहली कविता 'शिथिल है साधना मेरी' 1950 ई० में प्रकाशित हुई थी, जब वे हाईस्कूल के विद्यार्थी थे। उनकी एक कुमाउनी कविता भी 1969 में 'शिखरों के स्वर' पत्रिका में 'शिव हरी कैलाश बटी' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। बाद में इनके गीत और कविताएँ ज्ञानोदय, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए। राष्ट्र ध्वजा का प्रश्न, नया इतिहास, संकल्प, लेखनी धर्म, दर्द, खंडित सपन आदि शैलेश मटियानी की प्रमुख कविताएँ हैं।

शैलेश मटियानी की कविताओं में राष्ट्र प्रेम प्रमुखता से मुखरित हुआ है। 'राष्ट्र ध्वजा का प्रश्न' कविता में वे लिखते हैं-

प्रश्न पूछती फिरती सबसे
राष्ट्र-ध्वजा इस देश की-
'तुमको ममता मेरी ज़्यादा है,
या अपनी देह की?
क्या उत्तर दोगे
तुम अपनी आने वाली पीढ़ी को-
अपने जीने की ख़ातिर यदि
मेरी इज़्ज़त बेच दी?

वे अपनी 'दर्द' कविता के माध्यम से कहते हैं कि दर्द ग़ैरों के समक्ष नहीं, बल्कि अपनों के ही समक्ष व्यक्त किया जाता है-

होंठ हँसते हैं,
मगर मन तो दहा जाता है
सत्य को इस तरह
सपनों से कहा जाता है ।
ख़ुद ही सहने की जब
सामर्थ्य नहीं रह जाती
दर्द उस रोज़ ही
अपनों से कहा जाता है !


इनकी 'नया इतिहास' कविता में ओज गुण प्रमुखता से व्यक्त हुआ है। कवि के अनुसार हिमालय यानि अपनी माटी और अपने लोगों की अस्मिता की रक्षा के लिए मर-मिट जाना पड़े तो भी कम है-

अभय होकर बहे गंगा,
हमें विश्वास देना है
हिमालय को शहादत से
धुला आकाश देना है!
हमारी शांतिप्रियता का
नहीं है अर्थ कायरता-
हमें फिर ख़ून से लिखकर
नया इतिहास देना है।

इसी तरह एक और 'संकल्प' शीर्षक की ओजपूर्ण कविता में वे देश के दुश्मनों को ललकारते हुए कहते हैं कि प्राण रहते हुए हम अपने देश की तिल भर ज़मीं भी किसी को नहीं देंगे-

गीत को उगते हुए
सूरज-सरीखे छंद दो
शौर्य को फिर शत्रु की
हुंकार का अनुबंध दो ।
प्राण रहते तो न देंगे
भूमि तिल-भर देश की
फिर भुजाओं को नए
संकल्प-रक्षाबंध दो।

वे जानते हैं कि एक रचनाकार का कर्तव्य है कि वह युग सत्य को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति दे-

शांति से रक्षा न हो,
तो युद्ध में अनुरक्ति दे।
लेखनी का धर्म है,
युग-सत्य को अभिव्यक्ति दे।

इस प्रकार शैलेश मटियानी की इन कविताओं को पढ़कर हम कह सकते हैं कि यदि वे कविताएँ भी निरंतर रचते रहते तो वे एक ओजस्वी और राष्ट्र प्रेमी कवि के रूप में हमारे सामने होते, फिर भी उनका अल्प काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
- डॉ. पवनेश ठकुराठी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड। मो०-9528557051

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