सत्य पर मेरे प्रयोग: महात्मा गाँधी जी की आत्म कथा के अंश - 2 : बचपन

01-11-2019

सत्य पर मेरे प्रयोग: महात्मा गाँधी जी की आत्म कथा के अंश - 2 : बचपन

सुदर्शन कुमार सोनी

भारत को 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिलने के साथ दो सौ वर्षों की अँग्रेज़ी दासता के राज का ख़ात्मा हुआ। आज़ादी की लड़ाई में अनेक दिग्गज नेताओं ने अपना योगदान दिया। महात्मा गाँधी जी का योगदान उनकी अहिंसा, सत्याग्रह के विचारों के कारण ऐतिहासिक है। आज़ादी मिलने के अगले वर्ष ही एक उन्मादी की गोली से उनके प्राणों का उत्सर्ग हो गया। वर्ष 2019 इस अर्थ में ऐतिहासिक है कि यह राष्ट्रपिता का 150 वां जन्म दिवस है। सारा राष्ट्र, व पूरा विश्व उनको याद कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी उनको याद किया। उनकी स्मृति में वर्ष भर भारत में चलने वाले कार्यक्रम आगामी 2 अक्टूबर 2020 को समाप्त होंगे।

अल्बर्ट आईंस्टाईन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ आश्चर्य करेंगी कि विश्व में हाड़-मांस का एक ऐसा व्यक्ति भी विचरण करता था। बापू की आत्मकथा पुस्तक ’सत्य पर मेरे प्रयोग’ के नाम से जानी जाती है। उसके विविध अंश इस लेख माला के माध्यम से साहित्य कुंज डॉट नेट के अंकों में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। श्री सुमन घई जी व साहित्य कुंज डॉट नेट की टीम इसके लिये बधाई की पात्र है कि उन्होंने यह नेक कार्य करने का मुझे अवसर दिया। 

प्रस्तुत है उनकी आत्म कथा का दूसरा संपादित अंश। जिसका पुस्तक में शीर्षक है - 

बचपन -

पोरबंदर से पिताजी राजस्थानिक कोर्ट के सदस्य बनकर राजकोट गए। उस समय मेरी उमर सात साल की होगी। मुझे राजकोट की ग्रामशाला में भरती किया गया। इस शाला के दिन मुझे अच्छी तरह याद हैं। शिक्षकों के नाम-धाम भी याद हैं। पोरबंदर की तरह यहाँ की पढ़ाई के बारे में भी ज्ञान के लायक़ कोई ख़ास बात नहीं हैं। मैं मुश्किल से साधारण श्रेणी का विद्यार्थी रहा होऊँगा। ग्रामशाला से उपनगर की शाला में और वहाँ से हाईस्कूल में। यहाँ तक पहुँचने में मेरा बारहवाँ वर्ष बीत गया। मुझे याद नहीं पड़ता कि इस बीच मैंने किसी भी समय शिक्षकों को धोखा दिया हो। न तब तक किसी को मित्र बनाने का स्मरण हैं। मैं बहुत ही शर्मीला लड़का था। घंटी बजने के समय पहुँचता और पाठशाला के बंद होते ही घर भागता। ‘भागना‘ शब्द मैं जान-बूझकर लिख रहा हूँ, क्योंकि बातें करना मुझे अच्छा न लगता था। साथ ही यह डर भी रहता था कि कोई मेरा मज़ाक उड़ाएगा तो?

हाईस्कूल के पहले ही वर्ष की, परीक्षा के समय की एक घटना उल्लेखनीय है। शिक्षा विभाग के इन्स्पेक्टर जाइल्स विद्यालय का निरीक्षण करने आए थे। उन्होंने पहली कक्षा के विद्यार्थियों को अँग्रेज़ी के पाँच शब्द लिखाए। उनमें एक शब्द ‘केटल‘ (Kettle) था। मैंने उसके हिज्जे ग़लत लिखे थे। शिक्षक ने अपने बूट की नोक मारकर मुझे सावधान किया। लेकिन मैं क्यों सावधान होने लगा? मुझे यह ख़याल ही नहीं हो सका कि शिक्षक मुझे पासवाले लड़के की पट्टी देखकर हिज्जे सुधार लेने को कहते हैं। मैंने यह माना था कि शिक्षक तो यह देख रहे हैं कि हम एक-दूसरे की पट्टी में देखकर चोरी न करें। सब लड़कों के पाँचों शब्द सही निकले और अकेला मैं बेवकूफ़ ठहरा। शिक्षक ने मुझे मेरी बेवकूफ़ी बाद में समझाई लेकिन मेरे मन पर कोई असर न हुआ। मैं दूसरे लड़कों की पट्टी में देखकर चोरी करना कभी न सीख सका।

इतने पर भी शिक्षक के प्रति मेरा विनय कभी कम न हुआ। बड़ों के दोष न देखने का गुण मुझमें स्वभाव से ही था। बाद में इन शिक्षक के दूसरे दोष भी मुझे मालूम हुए थे। फिर भी उनके प्रति मेरा आदर बना ही रहा। मैं यह जानता था कि बड़ों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। वे जो कहें सो करना उसके काज़ी न बनना।

इसी समय के दो और प्रसंग मुझे हमेशा याद रहे हैं। साधारणतः पाठशाला की पुस्तकों को छोड़कर और कुछ पढ़ने का मुझे शौक़ नहीं था। सबक याद करना चाहिए, उलाहना सहा नहीं जाता, शिक्षक को धोखा देना ठीक नहीं, इसलिए मैं पाठ याद करता था। लेकिन मन अलसा जाता, इससे अक्सर सबक़ कच्चा रह जाता। ऐसी हालत में दूसरी कोई चीज़ पढ़ने की इच्छा क्यों कर होती? किंतु पिताजी की ख़रीदी हुई एक पुस्तक पर मेरी दृष्टि पड़ी। नाम था ‘श्रवण-पितृभक्ति नाटक‘। मेरी इच्छा उसे पढ़ने की हुई और मैं उसे बड़े चाव के साथ पढ़ गया। उन्हीं दिनों शीशे में चित्र दिखाने वाले भी घर-घर आते थे। उनके पास मैंने श्रवण का वह दृश्य भी देखा, जिसमें वह अपने माता-पिता को काँवर में बैठाकर यात्रा पर ले जाता है। दोनों चीज़ों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। मन में इच्छा होती कि मुझे भी श्रवण के समान बनना चाहिए। श्रवण की मृत्यु पर उसके माता-पिता का विलाप मुझे आज भी याद है। उस ललित छंद को मैंने बाजे पर बजाना भी सीख लिया था। मुझे बाजा सीखने का शौक़ था और पिताजी ने एक बाजा दिला भी दिया था।

इन्हीं दिनों कोई नाटक कंपनी आई थी और उसका नाटक देखने की इजाज़त मुझे मिली थी। हरिश्चंद्र का आख्यान था। उसे बार-बार देखने की इच्छा होती थी। उस नाटक को देखते हुए मैं थकता ही न था। उसे बार-बार देखने की इच्छा होती थी। लेकिन यों बार-बार जाने कौन देता? पर अपने मन में मैंने उस नाटक को सैकड़ों बार खेला होगा। मुझे हरिश्चंद्र के सपने आते। हरिश्चंद्र की तरह सत्यवादी सब क्यों नहीं होते? यह धुन बनी रहती। हरिश्चंद्र पर जैसी विपत्तियाँ पड़ीं वैसी विपत्तियों को भोगना और सत्य का पालन करना ही वास्तविक सत्य है। मैंने यह मान लिया था कि नाटक में जैसी लिखी हैं, वैसी विपत्तियाँ हरिश्चंद्र पर पड़ी होंगी। हरिश्चंद्र के दुख देखकर उसका स्मरण करके मैं ख़ूब रोया हूँ। आज मेरी बुद्धि समझती है कि हरिश्चंद्र कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं था। फिर भी मेरे विचार में हरिश्चंद्र और श्रवण आज भी जीवित हैं। मैं मानता हूँ कि आज भी उन नाटकों को पढ़ूँ तो आज भी मेरी आँखों से आँसू बह निकलेंगे।

- क्रमशः

1 Comments

  • 7 Nov, 2019 11:33 AM

    बहुत अच्छा लग रहा है । हाई स्कूल में गांधी जी की यह किताब पढ़ी थी । आपके लेख द्वारा दुबारा पढ़ने की इच्छा हो रही है ।

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