(एक)
ये तेरा है, ये मेरा है,
ऐसा क्यों होता है।
सरहद पर ख़ून के छींटे,
क्या किसी ने पहचाने हैं।

 

शहीद की माँ,
आतंकी की विधवा,
अश्रुओं की बहती धारा को,
कब किसी ने रोका है।

 

तनी हुई संगीन,
उठी हुई तलवार,
काटती धड़कनें,
बर्फ़ के चेहरे,
वो अंतिम इंतज़ार
जमे हुए दर्द की सिल्ली,
कब शौर्य चक्र से फूटी है।

 

राष्ट्रपति का संदेश,
पच्चीस लाख रुपये,
वो काँसे का मैडल,
दो दिन की सहानुभूति,
एक और शिलान्यास,
शहीदों की मज़ार पर,
कब सूनी कोख की मरती 
आरज़ू को रोका है।

 

नेताओं की स्वार्थ,
आत्मप्रवंचना,
शहीदों के मूल्य,
समझौतों की नीतियाँ,
बसों आवाजाही,
सरहद के पार की ख़रीदारी,
कब दिलों की सरहद को तोड़ा है।

(दो)
आमंत्रण - निमंत्रण,
शाहजहाँ के प्यार,
हसरत के दो टुकड़े,
क्या नहीं,
आगरा सम्मेलन।

बीत गई 
आधी सदी,
और होते रहेंगे,
सुपुर्द-ए-ख़ाक,
समझौतों की मज़ार पर
नए जन्मे सपने।

सुनो।
ध्यान से सुनो।
घोड़ों की टापें,
मद्धम हिनहिनाहट,
शांति के रश्मि रथी की।

शायद,
होगी आसान,
अब शहीदों की मौत।

शायद,
होगा छोटा,
अब शहीदों का क़ब्रिस्तान। 
 

0 Comments

Leave a Comment