संघर्ष (कविता झा)

01-09-2020

संघर्ष (कविता झा)

कविता झा

लहरों से खेलने का शौक़ देख कर,
सोचा सागर किनारे घर बसायें,
मोती पाने कि चाहत देख कर,
सोचा लहरों से टकरा ही जायें,
बड़े प्यार से तिनका-तिनका जोड़ ,
हमने अपने सपनों का घर बनाया,
उस घर में कई अरमानों को सजाया,
कि तभी एक दिन भँवर की एक लहर,
हमारे सपनों के घर तक दस्तक दे गई,
और पल में ही मेरा घर हो लिया,
साथ उन ज़िद्दी लहरों के,
जिनसे टकराने का हमारा इरादा था,
क्योंकि हमें नहीं सागर किनारे घर बसाना था,
हमें तो बस मोती ही पाना था,
हम भी दौड़ पड़े उन लहरों के पीछे,
साथ जिनके मेरे ख़्वाबों का घर जा रहा था,
लड़ पड़े उन भँवर के सैलाब से,
कभी वो हम पर, तो कभी हम उन पर,
कभी हम उन पर, तो कभी वो हम पर,
कि अचानक क्या देखते हैं तभी,
हार के हम से सागर की लहरें,
दे गईं हमें सारे मोती,
और इज़ाज़त कि सागर किनारे घर बनाएँ,
अपने अरमानों को सजाएँ,
सभी ख़्वाबों को खुल के  जिएँ॥

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