संवेदना में डूबी तरल कहानियाँ : कछु अकथ कहानी 

15-01-2020

संवेदना में डूबी तरल कहानियाँ : कछु अकथ कहानी 

गोविन्द सेन 

कथा संग्रह : कछु अकथ कहानी
लेखिका : कविता वर्मा
प्रकाशक : कलमकार प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान)
संस्करण : प्रथम, जून, 2019 
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ठ : 96

हर कथाकार अकथनीय को कथनीय बनाने की जद्दोजेहद में लगा रहता है। इसके लिए उसके पास शब्दों के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। वह शब्दों से रेखाएँ खींच आकार बनाता है और शब्दों से ही उस आकार में रंग भरता है। कभी यह रचना मूर्त होती है तो कभी अमूर्त और कभी मूर्त-अमूर्त के बीच झूलती रहती है।उसका मूर्त रूप भी अच्छा लगता है और अमूर्त रूप भी।

कविता वर्मा जी  का यह दूसरा कहानी संग्रह है। इसके पहले एक उपन्यास ‘छूटी गलियाँ’ और कहानी संग्रह ‘परछाइयों के उजाले’ आ चुका है। ‘कछु अकथ कहानी’ की कहानियाँ अपने समय के ज़रूरी सवालों से अपने ढंग से टकराती हैं। एकाधिक कहानियाँ स्त्री-मन की उथल-पुथल के ज़रिए पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की अस्मिता, समानता और स्वतंत्रता के लिए ज़रूरी संघर्ष को रेखांकित है। स्त्री के मज़बूत क़दमों की आहट इन कहानियों में सुनी जा सकती है। इन कहानियाँ की औरतें प्रौढ़ भी हैं तो वृद्धाएँ भी। इसका मतलब यह नहीं कि कविता जी  की कहानियाँ केवल स्त्री की समस्याओं तक ही सीमित हैं, इनकी कहानियों का फलक विस्तृत है। यहाँ अकेलेपन और उपेक्षा भोगते बूढ़े हैं, इस लम्पट दौर में भी अपनी ईमानदारी और खरेपन के साथ खड़े आदिवासी, हुनरमंद ग़रीब कारीगर हैं, साम्प्रदायिक संकीर्णता के बजाय मानवता पर भरोसा रखने वाले सहृदय पात्र भी हैं।

कहानी ‘दरख्तों के साये में धूप’ में पुरुष प्रधान भारतीय समाज में अपना स्पेस तलाशने वाली स्त्री का आत्म-संघर्ष है। अपनी छोटी-सी इच्छा और निर्णय के लिए उसे बेटे और पति पर निर्भर रहना पड़ता है पर वह पिंजरे में क़ैद चिड़िया नहीं है। अंत में वह ख़ुद को इस क़ैद से मुक्त कर लेती है। ‘बहुरि अकेला’ में अपनी उदासी और अकेलेपन के साथ अकेली यात्रा करने वाली मैडम है जो बस में काम करने वाले लड़के से संवेदना के एक सूक्ष्म तार से जुड़ जाती है। पूरी कहानी में उदासी और अकेलेपन की झिलमिल है। ‘कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं’ कहानी स्त्री के भीतर की दुनिया के अंतरंग को उकेरती है। ‘यूँ ही मैं बावरी’ में एक सख़्त मिज़ाज प्रिंसिपल मैडम की मनोदशा का चित्रण है। उसका व्यवहार विस्थापन के दर्द से संचालित है। गीत ‘चल उड़ जा रे पंछी के अब देश हुआ बेगाना’ उसके छुपे हुए दर्द को सतह पर ले आता है। ‘दाग दाग उजाला’ में स्त्री-पुरुषों के संबंधों की शाश्वत ऊहापोह है। ‘अपारदर्शी सच’ में स्त्री-पुरुष संबंधों की एक अलग गुत्थी है। कविता जी की कहानियों में  स्त्रियाँ विपरीत स्थितियों से लड़ने वाली मज़बूत स्त्रियाँ हैं। ‘विदा’ की पैंतीस वर्षीय दाखा अपने ताऊ-काका की नीयत को भाँपकर अपना रास्ता ख़ुद बनाती है और उसमें सफल भी होती है। ‘सामराज’ की बूढ़ी बेटों के द्वारा असहाय छोड़ दिए जाने के बावजूद अपनी टेक नहीं छोड़ती। उसके भीतर ग़रीबों की मदद करने वाली एक स्वाभिमानी ठकुराइन ज़िन्दा रहती है। ‘अभिमन्यु लड़ रहा है’ का अभिमन्यु फ़ौज में सूबेदार है, उसे नव विवाहिता पत्नी सावी को छोड़कर अपनी ड्यूटी पर जाना पड़ता है। मोर्चे पर अभिमन्यु को दोहरा युद्ध लड़ना पड़ता है। एक सचमुच के दुश्मन से और दूसरा दुश्मन के वेश धरने वाले सावी और बचपन के मित्र विनय जैसे अपनों से। 

कहानी ‘आदत’ यह रेखांकित करती है कि साम्प्रदायिकता के संकीर्ण दायरे के ऊपर इंसानियत है। इन्सान से इन्सान का रिश्ता महत्वपूर्ण है। पचास साल तक पड़ोसी रहे महादेव और अल्ताफ़ के आपसी प्रेम को मज़हब की दीवारें अलग और ख़त्म नहीं कर पाती हैं। ‘दिवस गंध’ में सुरजीत के बाल-मन पर लगी लगी खरोचों की कहानी है। पुलिस अपनी संकीर्ण साम्प्रदायिक सोच के चलते एक निरीह-निर्दोष सिख बच्चे पर डंडे चलाने में शर्मिंदा नहीं होती। सुरजीत के बाल-मन पर वही सब कुछ छपा था। 

कहानी ‘मोको कहाँ ढूँढे’ के रिटायर्ड बुज़ुर्ग महेश बाबू हर जगह शोर पाते हैं। मंदिर में भी शांति नहीं मिल पाती। महेश बाबू की खिन्नता के ज़रिए कहानी लोगों का शांति के स्थान पर शोर को प्राथमिकता देने की मनोवृत्ति को उजागर करती है। कहानी ‘कछु अकथ कहानी’ दर्शाती है कि तमाम विपरीत स्थितियों के बावजूद झेमरिया जैसे आदिवासी जन ईमानदारी, खरेपन और मनुष्यता में कथित सभ्य समाज से कहीं आगे हैं। ‘आसान राह की मुश्किल’ में देवला की मुश्किल है, वह कुटिल सेठ सुजानमल से भूसी के दाम कम नहीं करवा पाता। कहानी में सेठ की क्रूर और शोषणकारी करतूतों और देवला के अंतर्द्वंद का सूक्ष्म चित्रण है। ‘विलुप्त’ सिल टाँकने वाले ग़रीब कारीगर की मर्मस्पर्शी कहानी है जो अपने काम के लिए भर दोपहर घूमता रहता है। चूँकि अब सिल-बट्टे ख़तम हो गए हैं, इसलिए उसका काम विलुप्ति के कगार पर है। वह कथा नायिका के घर की सिल टाँकता है। पर उसकी मेहनत का बेशक़ीमती बीस का नोट वहीं छूट जाता है। कथा नायिका को वह नोट टीसता है।

कुल मिलाकर कविता जी की इन 15 कहानियाँ में आज का समय झलकता है। इनमें मध्यम और निम्न वर्ग के पात्रों का आत्मसंघर्ष चित्रित हुआ है। ये पाठकों की संवेदना जागृत करती है। कविता जी की कहानियाँ इन पात्रों के भीतर अधिक घटती है, बाहर कम। पीली पृष्ठभूमि पर काले रंग का रेखांकन से सजा संग्रह का आमुख कहानियों के मूल स्वर के अनुरूप अर्थपूर्ण लगता है। इस पठनीय संग्रह की कीमत भी वाजिब है।

समीक्षक: गोविंद सेन
मनावर-454446, जिला-धार,मप्र
मो:9893010439

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