रंगकर्मियों के लिए एक उपहार है यह पुस्तक - पंकज सोनी

15-03-2020

रंगकर्मियों के लिए एक उपहार है यह पुस्तक - पंकज सोनी

पंकज सोनी

पुस्तक : सुबह अब होती है... तथा अन्य नाटक
कहानीकार : पंकज सुबीर, नाट्य रूपांतरण- नीरज गोस्वामी
प्रकाशन : शिवना प्रकाशन, पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, सीहोर, मप्र, 466001, दूरभाष- 07562405545 
प्रकाशन वर्ष : 2020, 
मूल्य : 150 रुपये
पृष्ठ : 136

हाल ही हिंदी नाटकों की एक किताब पढ़ी 'सुबह अब होती है.. तथा अन्य नाटक'। शिवना प्रकाशन की यह किताब सुप्रसिद्ध लेखक पंकज सुबीर की चार कहानियों का नाट्य रूपांतरण है। नाट्य रूपांतरण किया है सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लेखक नीरज गोस्वामी ने। इन चारों कहानियों को मैं पहले ही पढ़ चुका था। और चारों ही मेरी पसंदीदा कहानियाँ हैं। किसी कहानी को मैं उसकी समग्रता में पसंद करता हूँ। मसलन उसमें निहित सामाजिक सोद्देश्यता, रोचकता, कहानीपन और चूँकि नाटकों की दुनिया से जुड़ा हूँ तो उसमें नाटकीय  तत्वों का होना बेहद ज़रूरी है,जो कि पंकज सुबीर की लगभग हर कहानी में होते ही हैं। चारों ही कहानियाँ मन को झकझोर देती हैं; जिन पर लंबी चर्चायें की जा सकती हैं। चूँकि मैं समीक्षक नहीं हूँ; सिर्फ एक रसिक पाठक हूँ पर बतौर रंगकर्मी उसे एक अलग नज़रिये से ज़रूर देखता हूँ। मेरा मानना है कि एक सजग रंगकर्मी को पढ़ने की आदत एक साहित्यकार से भी ज़्यादा होनी चाहिये। क्योंकि यही उसकी बौद्धिक ख़ुराक है। एक बिन पढ़ा अभिनेता, रंगकर्मी कम रंगकर्मचारी ज़्यादा लगता है। 

हिंदी नाटकों में नई और अच्छी पटकथा का सर्वथा अभाव देखा गया है। उसका कारण भी यही है कि नाट्य आलेख अब कम ही लिखे जा रहे हैं। एक अच्छी पटकथा वही है जिसका मंचन संभव हो। और पटकथा लिख पाना तभी संभव है जब पटकथा लेखक के रंगकर्मियों से ताल्लुक़ात हों या लेखक ख़ुद ही रंगकर्मी हो। हिंदी साहित्य के कथा सागर में अथाह मोती हैं। बस डुबकी लगाने की ही ज़रूरत है। नीरज गोस्वामी अखंड पाठक हैं। उन्होंने कथा सागर में डुबकी लगाई और पंकज सुबीर की कहानियों के चार मोती चुन लिये। 

पटकथा लेखन बहुत ही श्रम साध्य काम है। यह इतना कठिन काम है कि आपको रस से लबालब भरे एक प्याले को हाथों में थामे एक नट की तरह रस्सी पर चलना है और मजाल है रस की एक बूँद भी छलक जाय। यह बहुत बड़ी चुनौती है कि आपको किसी कहानी का नया शरीर गढ़ना है लेकिन उसकी आत्मा को मारे बग़ैर। दरअसल पटकथा लेखक मूल कहानी की व्याख्या ही कर रहा होता है। नाटककार का बौद्धिक स्तर एक विचारक की तरह ही होना चाहिए। क्योंकि विचारों के विस्तार का ही दूसरा नाम पटकथा है। रचना संसार मे कोई पुरुष नहीं होता वहाँ सिर्फ माँयें ही होती है। क्योंकि सृजन भी जन्म देने की तरह है। विचार भी भ्रूण की तरह विकसित होते हैं। उस दौरान सृजनकार भी उतनी ही प्रसव वेदना से गुज़रता है जितनी कि कोई माँ गुज़रती है। यदि मूल लेखक उस रचना की माँ है तो उस रचना के नाटककार का दर्जा भी सेरोगेट मदर से कम नहीं है। क्योंकि वो किसी और के बच्चे को अपनी कोख में पाले उसे अपने रक्त मज्जा से सींच रहा होता है। वो भी प्रसव वेदना से गुज़रता है। हो सकता है, उस संतान में उसके जीन्स का भी हिस्सा आ जाता हो। नाट्यलेखन एक स्वतंत्र विधा है। किसी कहानी का नाट्य रूपांतरण एक प्रकार का transcreation है। इसमें एक विधा दूसरी विधा का रूप ले रही होती है। इसलिये नाट्य रूपांतरण का मूल लेख से कम योगदान नहीं होता है। कई बार वो मूल रचना से भी महान रचना हो जाती है। भीष्म साहनी के उपन्यास 'तमस' पर बनी गोविंद निहलानी की कृति 'तमस' इसका बेहतरीन उदाहरण है। पंकज सुबीर की इन चारों कहानियों के लिये भी यही कहा जा सकता है कि उनकी कहानियाँ तो श्रेष्ठ हैं ही उनके नाट्य रूपांतरण भी श्रेष्ठ हैं। और इसका श्रेय नाटककार नीरज गोस्वामी को जाता है। 

चारों नाटकों पर विस्तार से बात करना ज़रा मुश्किल है। इसलिये संक्षिप्त में ही लिख रहा हूँ। पहला नाटक है, 'सुबह अब होती है...’ इसी नाम से पंकज सुबीर की रहस्य से भरपूर कहानी है। हंस ने रहस्य विशेषांक निकाला था जिसमें यह कहानी पुरुस्कृत हुई है। हिंदी साहित्य में रहस्य कथाओं को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है। जिसे बाज़ लोग छुपकर पढ़ते हैं। लेकिन यही साहित्य जब अँग्रेज़ी में हो तो वो ड्रॉइंग रूम में शान से रखा जाता है। वो स्टेटस सिंबल बन जाता है। अपराध कथाओं को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं क्योंकि अपराध समाज का हिस्सा हैं। जब तक समाज मे असमानता है, निर्धनता है,जात-पात या अन्य क़िस्म का भेदभाव है, अपराध होते रहेंगे।  'सुबह अब होती है...’ है तो रहस्य कथा पर यह अपराध के कारण और उसके मनोविज्ञान पर बात करती है। यह अंतहीन घुटन की कहानी है। कुछ लोग अति से ज़्यादा परफ़ेक्टनिस्ट होते हैं। उन्हें हर चीज़ अनुशासित और नियम पूर्वक चाहिये। उनकी यही आदत उन्हें सनकी और ख़ब्ती बना देती है। वो यह भूल जाते हैं कि इस दुनिया में कोई भी चीज़ परफ़ेक्ट नहीं होती। क़ुदरत उनके बनाये नियमों से नहीं बल्कि अपने नियमों से चलती है। उसके अपने अनुशासन हैं। जब वो अपने अनुशासन दूसरों पर थोप देते हैं। उन्हें अहसास ही नहीं होता कि वो उनके जीवन को कितना कष्टप्रद बना देते हैं। ऐसे नमूने हर दो चार परिवार में मिल जाते हैं। उन्हें हर चीज़ यथास्थान चाहिये। वो इस हद तक यथास्थितिवादी होते हैं कि उनका बस चले तो वे मौसमों को भी बदलने से रोक दें। जबकि परिवर्तन संसार का नियम है। संसार मे शाश्वत यदि कुछ है तो वो है ख़ुद परिवर्तन। यह कहानी एक सस्पेंस के साथ आगे बढ़ती है। थाने में एक गुमनाम चिट्ठी आती है जिसमें लिखा होता है कि फलां कॉलोनी में एक बुज़ुर्ग की मौत हुई है वो स्वभाविक मौत नहीं है बल्कि हत्या है। बस उसी तफ़्तीश में कहानी परत दर परत खुलती है। जितना अच्छा शिल्प पंकज सुबीर ने गढ़ा है उससे एक इंच भी कम नहीं है नाटक का शिल्प। बल्कि नाटककार ने उसको शरीर और आवाज़ देकर उसमें प्राण ही फूँके हैं। 

दूसरा नाटक है, 'औरतों की दुनिया' यह दुनिया यदि औरतों ने बनाई होती शायद ज़्यादा बेहतर होती। शिकार युग से ही मर्दों ने औरतों की ख़ूबियों को पहचान लिया था। उन्हें अपनी सत्ता छीने जाने का डर था। उसने उस पर चौका चूल्हा और बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी से बाँध दिया। यहाँ तक कि उस पर अपना सौंदर्यबोध भी थोप दिया। वो अपने शृंगार में कुछ यूँ उलझी की उसे पता ही नहीं चला कि वो अपनी चोटी से ही बँध कर रह गयी। हज़ारों सालों से औरतों से मर्दों ने सत्ता कुछ यूँ छीनी की दुनिया मे उनके लिये कोई जगह ही छोड़ी। मजबूरन औरतों की अपनी अलग दुनिया है। उस दुनिया में प्रेम है, समर्पण है, ममता है। वहाँ घृणा नहीं है, नफ़रत नहीं है, छल कपट नहीं है,वासना नहीं है। वे किसी का अपमान नहीं करती हैं। किसी का हक़ नहीं छीनती हैं। उनमें दुःख बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता है। पुरुषों ने केवल छीना है; जीता है। तमाम युद्ध औरत की छाती पर ही लड़े जाते हैं। सुहाग भी औरत का ही मिटता है। गोद भी औरत की ही उजड़ती है। क़िस्सा कुछ यूँ है कि एक शहरी नौजवान को लगता है कि गाँव में रहने वाले उसके सगे चाचा ने चालाकी से विरसे में मिली पैतृक संपत्ति में उनके हिस्से की ज़मीन को हथिया लिया है। सो वो  मामले को कचहरी तक ले गया। परिवार के सभी लोग उसके इस क़दम के ख़िलाफ़ हैं, ख़ासकर औरतें। आगे कहानी कुछ यूँ मोड़ लेती है; जिनके ख़िलाफ़ अदालत में केस लगाया है; उन्हीं के घर पर रह रहे हैं। उन्हीं के घर का बना हुआ खा रहे हैं। खाना खाते हुए प्यार मनुहार, शिक़वे शिकायतें चलती हैं। नौजवान को लगने लगता है कि घर के मामले को कचहरी तक ले जाकर उससे वाक़ई ग़लती हो गयी। चाची सिर्फ़ चाची ही नहीं होती वो दोस्त और माँ दोनों ही होती है। चाचा एक ऐसा पिता होता है जिससे दोस्तों जैसा नाता होता है। जो बातें पिता से भी नहीं बोली जा सकती वो चाचा से शेयर की जा सकती हैं। झूठा अहम और लालच यदि न हो तो यह रिश्ता बहुत ही पवित्र होता है। नाटक के क्लाइमेक्स में एक सीन है। नौजवान पश्चाताप के आँसू बहा रहा है। उसकी चाची भावुक होकर कहती है, "अब चुप कर मुन्ना बस कर; जो हुआ सो हुआ। पहले ही घर आ जाता बेटा तो इत्ते साल तो दुःख में न बीतते। अच्छा हुआ जो आज तूने औरतों की दुनिया मे झाँकना सीख लिया। काश, अगर सब हमारी इस दुनिया की झलक पा लें तो दुनिया से नफऱत जड़ से ख़तम हो जाए।" 

तीसरा नाटक है 'कसाब.गाँधी@यरवदा.in'। यह कहानी पंकज सुबीर की सबसे ज़्यादा चर्चित कहानी है। पहली बार जब यह पढ़ी थी तब से ही यह ज़ेहन में घूम रही थी। इसको लिखने के लिये लोहे का जिगर चाहिये। ज्ञात हो कि अजमल क़साब ने जेल में गाँधी की जीवनी पढ़ी थी। और पूना की  यरवदा जेल की जिस बैरक में वो क़ैद था वहाँ कभी मोहनदास करमचंद गाँधी भी क़ैद थे। कथाकार का यह जीनियस है कि वो कल्पना करता है कि फाँसी की आख़िरी रात क़साब को आभास होता है कि उसके साथ बैरक में कोई और भी है। वो और कोई नहीं बल्कि ख़ुद महात्मा गाँधी हैं। कहानी में अजमल क़साब और गाँधी का लंबा वार्तालाप है। कहानी का ’जिस्ट’ यह है कि आतंकवादी पेड़ पर नहीं उगते हैं। वो भी व्यवस्था की ही उपज होते हैं। इस दुनिया मे अमीर और ग़रीब की लंबी खाई का नहीं बल्कि ज़मीन और आकाश का अंतर है। जहाँ एक ओर एक अमीर आदमी अपनी पत्नी को तोहफ़े में पाँच हज़ार करोड़ का मकान बनाकर देता है, वहीं दूसरी ओर इतनी ग़रीबी है कि लोग कूड़े के ढेर से खाना बटोरते हैं। जहाँ मुट्ठी भर लोग जन्नत की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं वहीं लाखों लोग जहन्नुम के कीड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं। आज़ादी के इतने साल बाद भी देश की जनता आर्थिक गुलाम है। आज भी लाखों लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मौलिक ज़रूरतों से महरूम है। दूसरा यह कि आज भी बार-बार गाँधी को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यहाँ भी गाँधी सवालों के कटघरे में खड़े हैं और क़साब उनसे सवाल पूछ रहा है। पंकज सुबीर की कहानी जब नाटक में तब्दील होती है तब नीरज गोस्वामी का जीनियस टच उसको और महान बना देता है। नाटक में गाँधी की पहचान क़ैदी नंबर 189 और क़साब की पहचान क़ैदी नंबर 7096 है। कहानी में दोनों के बीच सिर्फ संवाद है पर नीरज अपने नाटक में उसे और आगे ले जाते हैं। यहाँ कथानक में क़साब का परिवार भी आ जाता है। और बताया गया है कि कैसे ग़रीबी का फ़ायदा उठाकर घाघ राजनीतिज्ञ ग़रीबों के बच्चों से आतंकवाद जैसा घिनौने काम करवाते हैं। इसे उन्होंने नाटक में पिरोया है। नाटक में अजमल क़साब की माँ का एक संवाद है। "क्यों है इतना ख़ून ख़राबा क्यों? मैं कहती हूँ अगर माँओं के हाथ मे यह दुनिया सौंप दी जाये, तो ये सारा ख़ून-ख़राबा ये सारी हिंसा ही रुक जाये। मगर आप लोग ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि माँएँ इस दुनिया को बदल देंगी। वो बुहार देंगी दुनिया के नक्शे पर खींची गई सारी लकीरों को, इधर से उधर तक सब एक सा कर देंगी। झाड़ू लेकर साफ कर देंगी सारी बारूदों को और फेंक आएँगी उसे कूड़ेदान में। वो जानती हैं कि बारूद हमेशा किसी माँ की कोख को ही झुलसाती है। वो इस दुनिया को सचमुच रहने के क़ाबिल बना देंगी, यदि आप ये दुनियाँ उन्हें सौंप दें।" पूरा नाटक इस तरह से गढ़ा गया है कि दर्शक या पाठक ख़ुद को पात्र की तरह महसूस करने लगते हैं। आने वाले समय में लोग नीरज गोस्वामी को इस नाटक के रचयिता के रूप में जानेंगे। 

चौथी और अंतिम कहानी है 'चौथमल मास्साब और पूस की रात' आप लोगों ने प्रेमचंद की पूस की रात तो पढ़ी ही होगी। यह पंकज सुबीर की लिखी पूस की रात है। ये एक शरारत भरी कहानी है। इंसान को जीने के लिये सिर्फ़ रोटी कपड़ा और मकान की ही नहीं और भी वग़ैरह की ज़रूरत होती है। यह वग़ैरह वग़ैरह आदिम भूख का नाम है। जिसे हम ठरक कहते हैं। जो होती तो हर किसी में है। पर स्वीकारता कोई नहीं है। इस से तो देवता, दानव, यक्ष और गंधर्व भी नहीं बच पाये तो बेचारे चौथमल मास्साब तो फिर एक इंसान ही हैं। बेचारे चौथमल मास्साब घर से सौ कि.मी.दूर एक गाँव में मास्टर हैं। पूरे गाँव में वही एक पढ़े-लिखे मनुष्य हैं। गाँव में बड़ी ठाठ है उनकी। ख़ूब इज़्ज़त है। बस कमी है तो उस चीज़ की जो इस आदिम भूख को शांत कर सकती है। सरसरी तौर पर देखो तो यह एक हल्की कहानी जान पड़ती है पर इसको गम्भीरतापूर्वक सोचो तो बड़ी असाधारण कहानी है। मज़ाक-मज़ाक में लेखक पाठकों को एक गम्भीर मैसेज दे देता है कि कैसे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपनी पत्नी से दूर रह रहे पुरुष सेक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन का शिकार हो जाते हैं। और दूसरा मैसेज यह है कि चौथमल मास्साब हर मर्द के अंदर होते हैं। वरना क्यों पाठक अंत तक इस कहानी को पढ़ रहे होते हैं कि आगे क्या हुआ होगा। यही हाल नाटक पढ़ते या देखते समय होता है। दर्शक अंत तक यह जानने के लिये उत्सुक रहते हैं कि मास्साब चौथमल की पूस की रात कैसे बीती। क्लाइमैक्स में सूत्रधार दर्शकों से कहता है कि हम सब में कहीं न कहीं चौथमल मास्साब छुपे बैठे हैं जो वक़्त और मौक़ा मिलते ही बाहर आ ही जाते हैं।" इस नाटक को पढ़कर कहानीकार और नाटककार दोनों की रेंज पता चलती है की वो यदि गम्भीर कहानियाँ लिख सकते हैं तो हल्के-फुल्के अंदाज़ में लोगों को हँसा भी सकते हैं। नाटक के संवाद बहुत ही चुटीले हैं। पढ़ते वक़्त कई बार हँसी फूट पड़ती है। कुल मिलाकर जो रंगकर्मी नई स्क्रिप्ट की तलाश में रहते हैं उनके लिये यह किताब एक अच्छा उपहार है। 

पंकज सोनी, प्लाट नं 172, साकार सिटी, ललमटिया, मंगलिपेठ, सिवनी (म.प्र.), पिन 480661
मोबाइल - 9407850800, 8224901600
 

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