कुरुक्षेत्र महासमर के सोलहवें दिन सूरज लाल-पीला होकर डूबा तब सर्वत्र सेनापति कर्ण के शौर्य के चर्चे थे। आज कोई भी महारथी उसके आगे टिक नहीं पाया। अपने तीखे बाणों के प्राणांतक प्रहारों से कर्ण ने पाण्डव सेना को वैसे ही तितर-बितर कर दिया जैसे तेज़ वायु मेघों को विच्छिन्न कर देती है। परशुराम शिष्य कर्ण का पराक्रम एवं शस्त्रलाघव देखते ही बनता था। वह कब बाण लेता, कब धनुष पर रखता एवं कब छोड़ता यह तक पाण्डव सूरमा देख नहीं पाए। उनकी दशा ऐसी थी मानो वे अजगर के मुख में पड़ गए हों।

अर्जुन आज पूरे दिन अश्वत्थामा से युद्ध में व्यस्त थे। इसी अवसर का लाभ उठाकर चतुर दुर्योधन ने महाराज युधिष्ठिर को चारों ओर से घेर लिया। प्रारंभ में महाराज के अद्भुत पराक्रम एवं नकुल-सहदेव के सहयोग के चलते दुर्योधन को युद्ध भारी पड़ गया। एक समय तो ऐसा आया जब दुर्योधन सब ओर से घिर गया एवं ऐसा लग रहा था कि युद्ध की दिशा आज ही तय हो जाएगी। तभी एक चमत्कार हुआ। महाबली कर्ण काले बादलों से निकलने वाले सूर्य की तरह प्रकट हुए एवं उन्होंने ऐसा शौर्य प्रदर्शन किया कि पाण्डव देखते रह गए। वैकर्तन कर्ण ने वहाँ उपस्थित सभी योद्धाओं को अपनी बाण-वर्षा से बींध दिया।

अब युधिष्ठिर एवं कर्ण आमने-सामने थे। उन्हें जब पता चला कि नकुल एवं सहदेव का सहयोग लेकर युधिष्ठिर ने मित्र दुर्योधन को घायल कर दिया है तो वे मध्याह्न के सूर्य की तरह कुपित हो उठे। रोष से उनका मुख फड़कने लगा। अप्रमेय आत्मबल से संपन्न कर्ण ने तब नाराचों, अर्धचन्द्रों, भल्लों एवं वत्सदंतों जैसे बाणों का प्रहार कर युधिष्ठिर को असहाय कर दिया। उनके पराक्रम एवं युद्ध कौशल को देख पाण्डव दंग रह गए। कर्ण की बाण-वर्षा से युधिष्ठिर सहम उठे। जिस तरह सूर्य के आगे तारागणों का तेज श्रीहीन हो जाता है, वही दशा आज युधिष्ठिर की बन गई। पलक झपकते कर्ण ने उनका शिरस्त्राण नीचे गिरा दिया एवं ऐसे शस्त्रलाघव का प्रदर्शन किया कि युधिष्ठिर कराह उठे। कर्ण ने उनके तीर-तरकश, शस्त्र-कवच सभी काट दिए। उसके प्रहारों से पीड़ित युधिष्ठिर रथ के पिछले भाग में जाकर बैठ गए एवं सारथी को आदेश देते हुए बोले, "रथ यहाँ से अन्यत्र ले चलो।" उन्हें यूँ रणविमुख होता देख दुर्योधन चिल्लाया, "कर्ण इन्हें पकड़ लो।" तभी महाबली भीम कर्ण के सम्मुख हो आए एवं नकुल तथा सहदेव अवसर पाकर घायल युधिष्ठिर को बचाते हुए छावनी तक भगा ले गए।

रात अर्जुन एवं कृष्ण उनका हाल जानने शिविर में पहुँचे तब महाराज युधिष्ठिर कराह रहे थे। यद्यपि वे सुंदर शैया पर लेटे थे तथापि उनका अंग-अंग संतप्त था। परिचारकों ने उनकी सेवा-शुश्रूषा कर दी थी। उनकी छाती, बाँहों एवं पाँवों तक में पट्टियाँ बँधी थी एवं मुख लज्जा से नत था। वैद्यों ने कर्ण के बाण तो निकाल दिए थे, लेकिन अपमान के बाण अब भी उनके हृदय में धँसे थे। वे रह-रहकर उस दृश्य को याद कर मन ही मन चिंतित हो उठते कि वे युद्ध विमुख क्यों हुए? क्या यही क्षत्रिय का धर्म था? उससे तो अच्छा यही होता कि वे युद्ध में प्राण त्याग देते। वे भाग क्यों आए? भीष्म एवं द्रोणाचार्य जैसे महारथियों के सामने डटे रहने वाले युधिष्ठिर को आज क्या हो गया? उनके मन के कोने में यह दुःख काँटे की तरह कसकने लगा था। इस तीव्र एवं घोर दुःख की वेदना अब असह्य हो चली थी। वे पुनः पुनः स्वयं से प्रश्न करने लगते, तुम रणक्षेत्र से चले क्यों आए? अन्य योद्धाओं ने तुम्हें यूँ आते देख क्या सोचा होगा? ओह ! इतना अपमान एवं उपहास सहकर भी मैं ज़िन्दा हूँ? यह अपमान उनके मर्म स्थानों को विदीर्ण करने लगा। आज उन्हें पहली बार लगा कि मानसिक युद्ध शारीरिक युद्ध से कहीं अधिक दुधुर्ष होता है। इसे लड़ना भी अकेले होता है। 

इस जगत में सम्मानीय पुरुष तभी तक जीते हैं जब तक उनका सम्मान है। जब वे महान अपमान पाते हैं तो उनका जीवन मृत्यु-तुल्य बन जाता है। इसी चिंतन के चलते युधिष्ठिर मर्माहत पक्षी की भाँति चीत्कार उठे। उनका मुख सूख गया, आँखें नीची हो गईं। सोचते-सोचते उनके चेहरे की दशा ऐसी हो गई मानो वे अपमान के अथाह समुद्र में डूब गए हों। वे अनमने एवं उदास हो गए तथा उनकी तीव्र व्यथा मन के अंधकार का दर्पण बनकर उनकी आँखों से झाँकने लगी।

अर्जुन तब उनके समीप आकर बोले, "आज मैं अश्वत्थामा से युद्ध में व्यस्त था, अन्यथा उस सूतपुत्र को बताता कि महाराज युधिष्ठिर पर बाण वर्षा का अंजाम क्या होता है? तात! आप आश्वस्त रहें। कल जब वह मेरे सम्मुख होगा तो उसे उसके किये का फल मिल जाएगा।" कहते-कहते अर्जुन अमर्ष एवं क्रोध से भर गए। उनका चेहरा लाल हो गया।

अर्जुन की बातें सुनकर युधिष्ठिर के घाव हरिया गए। रणच्युत सूरमा के सामने अगर कोई स्वयं के शौर्य का बखान करे तो उसका दर्द दूना हो जाता है। अर्जुन फिर उनका छोटा भाई था। उसे सुनकर युधिष्ठिर बोले, "अर्जुन! आज तुम अन्यत्र क्यों चले गए? तुम्हारे बिना कर्ण ने मेरी वह दशा की है कि मैं जीवित मरे बराबर हो गया हूँं। शैया पर लेटे-लेटे यही चिंतन कर रहा हूँ कि उस आततायी का वध कैसे करूँ? जब तक उसका वध नहीं होता, अपमान के यह काँटे मेरे हृदय में धँसे ही रहेंगे।" कहते-कहते घायल युधिष्ठिर पुनः कराह उठे।

"मैं पुनः आपको विश्वास दिलाता हूँ तात! कल मैं उस आततायी की वही दशा करूँगा जो उसने आपकी की है। अभी उसने सूरमा देखे कहाँ हैं? बराबरी वालों से टक्कर तो उसकी अब होगी।" कहते-कहते अर्जुन ने कंधे पर रखे गाण्डीव धनुष को कसकर पकड़ लिया।

अर्जुन के वाक्य सुनकर युधिष्ठिर का अपमान और गहरा गया। उनकी दशा ऐसी थी मानो किसी ने जले पर नमक डाल दिया हो। कुपित होकर युधिष्ठिर बोले, "अपने शौर्य का यूँ बखान न करो अर्जुन! तुम बातें तो बड़ी-बड़ी करते हो, लेकिन वैसा प्रदर्शन नहीं कर रहे। आज कदाचित् मुझे कुछ हो जाता तो हमारी संभावित विजय पराजय में बदल जाती। क्या तुम नहीं जानते कि युद्ध के पूर्व तुम्हीं ने हमें वचन दिया था कि तुम युद्ध में कर्ण को जीत लोगे? आज कर्ण ने हमारे योद्धाओं, रथी-महारथियों एवं स्वयं मेरी जो दुर्दशा की है उससे तो यही लगता है कि तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। दुर्योधन ने युद्धपूर्व अपने बाजू ठोकते हुए उचित ही कहा था कि अर्जुन रणभूमि में कर्ण के आगे खड़ा नहीं रह सकता। कर्ण युद्ध में साक्षात् यमराज है। तुम अकारण ही अपने शौर्य एवं धनुर्धर होने का अभिमान करते हो? इससे तो अच्छा यही होगा कि तुम गाण्डीव उतारकर किसी अन्य को दे दो, ताकि हम ऐसी दुर्दशा से तो बच सकें। धिक्कार है तुम्हारी भुजाओं के पराक्रम को, धिक्कार है तुम्हारे असंख्य बाणों को एवं धिक्कार है तुम्हारे इस गाण्डीव धनुष को, जिस को कंधे पर रखकर तुम सूरमा होने का अभिमान करते हो। आज तुम्हारे ही कारण मुझे लज्जित, अपमानित एवं कलंकित होना पड़ा। मैं तुम्हें पुनः कहता हूँ कि तुम इस गाण्डीव के योग्य नहीं हो। तुम इसे कंधे से उतारकर किसी अन्य राजा अथवा श्रेष्ठ धनुर्धर को दे दो," कहते-कहते कर्ण से पराजय की कुंठा उनके सर चढ़ बैठी।

महाराज युधिष्ठिर के ऐसा कहते ही कुंतीपुत्र अर्जुन की आँखों से अंगारे बरसने लगे। घी की आहुति से प्रज्वलित हुई अग्नि के समान वे क्रोध से जल उठे। कृष्ण के देखते-देखते उन्होंने म्यान से तलवार निकाल ली। वे महाराज युधिष्ठिर का वध करने ही वाले थे कि कृष्ण ने उन्हें हाथ पकड़कर रोक लिया। उसका हाथ पकड़े कृष्ण बोले, "अर्जुन! यह तुम क्या कर रहे हो? क्या तुम भूल गए कि महाराज तुम्हारे बड़े भाई है? क्या तुम नहीं जानते कि वे अभी अस्वस्थ हैं? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि सच्चा योद्धा कभी अस्वस्थ व्यक्ति पर प्रहार नहीं करता? आख़िर तुम्हें हो क्या हो गया है? तुम किस कारण से उनका वध करने को उद्यत हुए हो?"

"माधव! गाण्डीव मेरा प्रथम प्रेम एवं प्रतिकृति है। मैंने मन ही मन यह प्रतिज्ञा ले रखी थी कि जो कोई मुझसे यह कहेगा कि तुम गाण्डीव उतारकर किसी अन्य धनुर्धर को दे दो उसका मैं सिर काट लूँगा। मैं यह प्रतिज्ञा अवश्य पूरी करूँगा। क्षत्रिय प्रतिकूल परिस्थितियों में रणच्युत हो सकता है परंतु विषमतम परिस्थितियों में भी प्रतिज्ञाच्युत नहीं हो सकता। प्रतिज्ञा तोड़ने वाला क्षत्रिय जीते-जी मरे समान है," कहते-कहते अर्जुन विषधर सर्प के समान फुफकारने लगा। कृष्ण तब आगे आकर बोले। 

"पार्थ! तुम धर्म का सूक्ष्म स्वरूप नहीं समझते, इसीलिए अकारण क्रोधकर महाराज का वध करना चाहते हो? धर्म के सूक्ष्म स्वरूप को समझने वाला व्यक्ति लकीर का फ़क़ीर नहीं होता। धर्म महाज्ञानियों तक के लिए दुर्बोध एवं दुर्विज्ञेय है। इसके रहस्य एवं तत्वस्वरूप को अच्छे-अच्छे नहीं समझ पाते। आवश्यक नहीं है कि तुम अपनी प्रतिज्ञा का अक्षरशः पालन करो, इसके अन्य विकल्प भी हैं।" कहते-कहते कृष्ण की आंखों में धर्म का सार सिमट आया।

"वह विकल्प क्या है माधव? आप मुझे शीघ्र बताएँ, ताकि मैं इस महापाप से बच सकूँ," अर्जुन अब कृष्ण की ओर देख रहे थे।

अर्जुन के ऐसा कहने पर कृष्ण उसे शिविर के एक कोने में ले गए एवं उसके कान के समीप आकर इस गूढ़ रहस्य को समझाया। कृष्ण से इस रहस्य को सुनकर अर्जुन कृष्ण के साथ युधिष्ठिर के समीप आए एवं उनकी ओर देखकर तेज़ आवा्ज़ में कहने लगे, "राजन्! तू किस दंभ से वह सब कुछ कह गया जो तूने अभी मुझे कहा। तू ख़ुद तो युद्ध से भागकर एक कोस दूर इस छावनी में विश्राम कर रहा है एवं दूसरों को शौर्य एवं साहस का पाठ सिखा रहा है। वीर योद्धा जिह्वा से वीर नहीं होते, वे अपने रणकौशल का प्रदर्शन युद्धभूमि में करते हैं। वहाँ से तो तू भाग आया है एवं अब बड़बोला बनकर मुझ पर क्रोध कर रहा है। तूने क्या उसी कुंती माँ का दूध नहीं पिया जिसका मैंने पिया? तू फिर मेरे आसरे क्योंकर हुआ?"

"अर्जुन! तुम यह क्या कह रहे हो? क्या तुममें सामान्य शिष्टाचार एवं मर्यादा भी नहीं रही?" कहते-कहते युधिष्ठिर लगभग चीख़ पड़े।

"तू मर्यादा की बात न कर। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय तुम्हारी मर्यादा कहाँ चली गई थी? भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण देखकर भी तू मर्यादा की बात करता है? सच्चाई तो यह है कि तू भाग्यहीन जुआरी है। तेरे ही कारण हमारे राज्य का नाश हुआ, तेरे ही परवश हुए हम दर-बदर भटकते रहे, तेरे ही कारण इस विकराल युद्ध में अनेक निष्पाप सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुतियाँ दी हैं। इतना सब कुछ करके भी तू अपने वाग्बाणों से मुझे यह कहकर दग्ध कर रहा है कि गाण्डीव उतार कर अन्य को दे दो। ऐसा कहते हुए तुझे क्या किंचित् लज्जा नहीं आई?" युधिष्ठिर के प्रति ऐसा कहते-कहते अर्जुन ने आँखें ऊँची कर अपने अग्रज की ओर देखा।

युधिष्ठिर पर घड़ों पानी पड़ गया। वे पहले ही अपमान से आहत थे, घायल भी थे और अब अर्जुन की बातों से उनकी मनोदशा ऐसी हो गई जैसे किसी निःशस्त्र सैनिक का सर कटकर रणभूमि में गिर पड़ा हो।

अपने ही बड़े भाई को अपने ही वाग्बाणों से आहत कर अर्जुन ने उनकी दशा देखी तो वे विह्वल हो उठे। उन्हें लगा वे गजभर जमीन में धँस गए हैं। उन्होंने स्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि जिस युधिष्ठिर को वे पितातुल्य मानते थे, जिनके हर आदेश को उन्होंने शिरोधार्य किया उन्हें अपनी ही रूखी एवं कठोर बातों से यूँ आहत करेंगे? पश्चात्ताप उनके सर चढ़ बैठा। अर्जुन! यह तुमने क्या कर डाला? क्या तुम्हें उनके प्रति ऐसे वचन कहने चाहिए थे? यही सोचते-सोचते उनकी दशा ऐसी हो गई जैसे पातकी सिर धुन-धुनकर पछता रहा हो। यकायक उनके मस्तिष्क में बिजली कौंधी, उन्होंने पुनः म्यान से तलवार निकाली ओर बोले, "यह जो दुष्कृत्य कर मैंने अपने बडे़ भाई का अपमान किया है, उसका एक ही दण्ड है कि अब मैं स्वयं अपना वध करूँ। मैं इस तलवार से स्वयं मेरा सर काटकर आप सभी के सामने आत्महत्या करूँगा।" आत्महत्या के लिए उद्यत हुए अर्जुन को कृष्ण पुनः शिविर के एक ओर ले गए एवं उनके कान के समीप आकर एक अन्य रहस्य उद्घाटित किया।

अर्जुन पुनः कृष्ण के संग युधिष्ठिर के समीप आए एवं इस बार सबको आश्चर्यचकित करते हुए स्वयं अपनी प्रशंसा करने लगे। वहाँ उपस्थित सभी को देखकर वे कहने लगे, "राजन्! मेरे गुणों का मैं क्या बखान करूँ, मेरे शौर्य एवं पराक्रम की कथाएँ आप सभी जानते हैं। मैं ही वह योद्धा हूँ जिसके बल पर आप सभी ने इस युद्ध का निर्णय लिया है। कल कदाचित् अगर मैं यह युद्ध न करूँ तो आप सभी का मरण निश्चित है। सारा संसार जानता है पिनाकधारी महादेव को छोड़कर मेरे समान दूसरा धनुर्धर ब्रह्माण्ड भर में नहीं है। स्वयं महादेव ने मेरी वीरता का अनुमोदन किया है। राजन्! मैंने ही संपूर्ण दिशाओं एवं दिक्पालों को जीतकर आपके अधीन किया है। मेरे बल पर ही आपके राजसूय यज्ञ की रक्षा हुई। मैं ही.....मैं ही.....मैं ही.....मैं ही वह योद्धा हूँ जिस पर निश्चिंत होकर आप विश्वास कर सकते हैं।"

स्वयं की प्रशंसा करते-करते अर्जुन आत्मग्लानि से भर गए। उन्हें लगा जैसे दंभ और अहंकार से भरा उनका सर कटकर धरती पर आ गिरा है।

अर्जुन द्वारा पूर्व में अपमानित होने एवं अब अर्जुन द्वारा स्वयं की प्रशंसा करते देख युधिष्ठिर क्षुब्ध हो उठे। कृष्ण की ओर देखकर बोले, "माधव! आपने अर्जुन को दो बार शिविर के कोने में ले जाकर ऐसा क्या कहा कि उसने पहले मेरा अपमान एवं फिर स्वयं की प्रशंसा की। मैं इस रहस्य को जानना चाहता हूँ।"

"तात! आज अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा भी पूरी की है एवं पश्चाताप भी किया है। उसने आपका वध भी किया है एवं पश्चाताप स्वरूप स्वयं का वध भी किया है," कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।

"वह कैसे माधव?" युधिष्ठिर इस रहस्य को जानने के लिए उत्कंठित हो उठे।

"तात! किसी का वध मात्र उसका सर काटने से नहीं होता। तूकारा देकर बोलने एवं उसका सभी के समक्ष अपमान करने से भी होता है। अर्जुन ने पूर्व में आपका अपमान करके यही किया है," कृष्ण ने उत्तर दिया।

"माधव, फिर उसने स्वयं का वध कैसे किया?" युधिष्ठिर की जिज्ञासा परवान चढ़ गई।

"स्वयं का वध स्वयं का गला काटने से ही नहीं होता। आत्मप्रशंसा अर्थात् स्वयं द्वारा स्वयं की प्रशंसा आत्मवध ही है। आत्मपूजा आत्महत्या नहीं तो और क्या है? ऐसा करके क्या मनुष्य श्रेयपथ से नहीं गिर जाता? मनुष्य के आत्मकल्याण में सबसे बाधक तत्व आत्मप्रशंसा ही है। यह स्वयं द्वारा स्वयं के वधतुल्य है। दूसरी बार अर्जुन ने यही तो किया था। इसी रहस्य को तो मैंने शिविर के कोने में ले जाकर उसे उद्घाटित किया था।" इस बार उत्तर देते हुए कृष्ण गंभीर हो उठे।

"ओह माधव! आप सचमुच ज्ञानियों में अग्रगण्य एवं धर्म के सच्चे ज्ञाता हैं," कहते-कहते युधिष्ठिर ने आँखें मूँदकर मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।

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