राजनीति
विरासत बन कर 
रह गयी है
एक
परिवार की। 

चले
आइये
सीना तान कर
मुस्कुराते हुए,
अंधी
जनता सदियों से 
करबद्ध खड़ी है
प्रतिक्षारत।

पिछलग्गू
बनना स्वभाव में है
जो न बदला है
और न
शायद बदलेगा।
हाय!
क्या करूँ
बुद्धि... धर्म... सम्प्रदाय पर सवार है
राजनीति
और
देश की आँखें बंद।

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