राजा के नए कपड़े

20-02-2019

राजा के नए कपड़े

डॉ. रश्मिशील

बहुत साल पहले एक राजा था, वह बढ़िया नए कपड़ों का इतना शौकीन था कि अपने खज़ाने का ज़्यादातर धन उन्हीं पर ख़र्च कर देता था ताकि वह बहुत अच्छा दिखाई दे। न तो वह अपने सैनिकों की परवाह करता था, न ही प्रजा की, बस उसे तो बाहर घूमना पसंद था ताकि लोग उसके कपड़े देखें। दिन के हर घंटे पर वह नए कपड़े पहनता था इसलिए यह कहने के बजाय की ‘राजा दरबार में है’ दरबारी कहते राजा ‘वार्डरोव’ (वस्त्रों की अलमारी) में है।

राजा जिस बड़े शहर में रहता था वहाँआनंद ही आनंद था। कपड़े के शौकीन राजा की ख्याति सुनकर प्रतिदिन अजनबी लोग आते थे। एक दिन दो शरीफ़ बदमाश आ गए। उन्होंने स्वयं को बुनकर बताया और घोषणा की कि वे इतने उत्तम वस्त्र बना सकते हैं जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता! उन वस्त्रों के रंग और डिज़ाइन असाधारण रूप से सुंदर होंगे। वस्त्र ऐसे पदार्थ से बनाया जाएगा जो असमान्य रूप से हल्का होगा। जिससे यह कपड़े बनाए जाएँगे उसमें आष्चर्यजनक गुण यह होगा कि वह उन व्यक्तियों को दिखाई नहीं देंगे जो अपने पद, जिस पर वे हों, के अयोग्य हों या इतने मूर्ख होंगे कि उन्हें सुधारा न जा सके।

राजा ने जब यह सुना तो सोचा, ‘ये वस्त्र तो उत्कृष्ट कोटि के होंगे। अगर मैं इन कपड़ों को पहन लूँ तो मैं यह पता कर सकूँगा कि मेरे राज्य में ऐसे कौन से कर्मचारी हैं जो अपने पद के अयोग्य हैं, कौन जड़मति हैं जो स्वयं को चालाक समझते हैं। ऐसे कपड़े सिर्फ़ मेरे लिए बनाए जाने चाहिएँ। राजा ने उन धूर्तों को बुलाकर अपने लिए वस्त्र बनाने को कहा। साथ ही बहुत-सा धन दिया ताकि वस्त्र बनाने का काम वे तत्काल शुरू कर सकें।

उन्होंने दो करघे लगा लिए और उन पर काम करने का दिखावा करने लगे। पर वास्तव में करघों पर कुछ नहीं था। उन्होंने बढ़िया सिल्क और सोने की माँग की। मिल जाने पर वह माल अपने लिए रख लेते और देर रात तक खाली करघे चलाते रहते।

राजा ने सोचा कि उसे पता होना चाहिए कि काम कैसा चल रहा है! पर तत्काल यह सोचकर असहज हो उठा कि जो अपने पद के अयोग्य हैं उन्हें तो वस्त्र दिखलाई ही नहीं पड़ेगा। वह अपने को ढाढ़स देता कि उसे डरने की क्या ्ज़रूरत है! अतः उसने यही ठीक समझा कि अपने कुछ अधिकारियों को भेजकर पता लगाए कि काम की कितनी प्रगति हुई है! पूरा नगर जानता था कि तैयार माल की कितनी अनोखी शान होगी, और सभी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि उनका पड़ोसी कितना बड़ा मूर्ख है।

राजा ने सोचा कि वह अपने ईमानदार वृद्ध मंत्री को बुनकरों के पास भेजे। वह अच्छी तरह से देख सकता है कि कच्चा माल कैसा दिखता है! मंत्री में बुद्धि है और उसके काम को उससे अच्छा और कोई नहीं समझता!

अतः वह समझदार मंत्री उस हाल में गया जहाँ दोनों धूर्त बैठे खाली करघे पर काम करने का दिखावा कर रहे थे।

मंत्री ने सोचा, “ख़ुदा मेहर करे।” इसी के साथ अपनी आँखें फाड़कर देखने लगा। उसने सोचा ‘मुझे तो कुछ नहीं दिखाई पड़ता।’ पर कहा कुछ नहीं।

दोनों धूर्तों ने मंत्री से और पास आकर देखने और यह बताने की प्रार्थना की कि वह बताए कि कपड़े का रंग, डिज़ाइन कैसा है! उन्होंने खाली करघे की ओर इशारा किया। बेचारा बूढ़ा मंत्री अपनी आँखें फाड़ता चला गया पर उसे कुछ नहीं दिखाई दिया क्योंकि वहाँ कुछ हो तो दिखाई दे।

"दया करो भगवन,” उसने सोचा, "क्या मैं वास्तव में इतना मूर्ख हूँ? मैंने इसके बारे में सोचा भी नहीं। ख़ैर, अब यह किसी को पता भी नहीं चलना चाहिए। क्या मैं अपने पद के योग्य नहीं हूँ? नहीं, नहीं, मैं किसी से भी नहीं कहूँगा कि मुझे कपड़े दिखाई नहीं दिए।"

बुनाई का ढोंग करते हुए उनमें से एक ने पूछा, "क्या आप हमारे काम के बारे में कुछ नहीं कहना चाहेंगे!"

"अरे हाँ, यह बहुत अच्छा है, मन को लुभाने वाला," अपने चश्में के भीतर से झाँकते हुए बूढे मंत्री ने कहा। "कितना बढ़िया नमूना है और क्या रंग है! ठीक है, मैं राजा को बताऊँगा कि मैं आपके काम से ख़ुश हूँ।"

उन दोनों बुनकरों ने कहा, "यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है।" फिर उन्होंने प्रयुक्त रंगों के नाम बताए और उस अनोखे नमूने के बारे में बताया। वृद्ध मंत्री ध्यान से सुनता रहा ताकि वह वही बातें राजा को बता सके। और उसने ऐसा किया भी।

अब उन धूर्तों ने और धन, सिल्क व सोने की यह कहकर माँग की कि यह उन्हें बुनाई के लिए चाहिए है। वह सब उन्हें मिल गया और उसे वे ख़ुद हज़म कर गए। बुनाई का कोई प्रश्न ही नहीं था। हाँ, खाली करघे ज़रूर चलाते रहते।

राजा ने शीघ्र ही अपने दरबार का एक विश्वस्त अधिकारी यह देखने के लिए भेजा कि वस्त्र निर्माण का काम कहाँ तक पहुँचा है। उसका भी वही हाल हुआ जो मंत्री जी का हुआ था। उसने बार-बार देखने का प्रयास किया पर खाली करघों के अलावा कुछ न दिखाई दिया।

"क्या यह वस्त्र सुंदर नहीं हैं?" दोनों धूर्तों ने वस्त्र के सुन्दर नमूने का, जो वहाँ था ही नहीं, प्रदर्शन करते हुए और उनका विवरण देते हुए पूछा।

उस व्यक्ति ने विचार किया, मैं मूर्ख नहीं हूँ, यह मेरा उच्च पद ही है जिसके योग्य मैं नहीं हूँ। यह कितना हास्यास्पद है, पर यह किसी को बताना नहीं चाहिए। उसने प्रकट रूप में वस्त्र की प्रशंसा की और सुंदर रंगों और आकर्षक नमूनों के लिए अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। उसने राजा को जाकर बताया कि वस्त्र बड़े आकर्षक है।

सभी नगरवासी ‘वस्त्रों’ के लुभावने होने की चर्चा कर रहे थे। राजा ने भी उस वस्त्र को देखना चाहा जो अभी तक करघे पर चढ़ा था। वह अपने सभी विश्वस्त लोगों को और उन सभी व्यक्तियों को साथ लेकर चला जो वहाँ हो आए थे। राजा वहाँ पहुँचा जहाँ दोनों धूर्त बिना सूत के ज़ोर-शोर से बुनाई कर रहे थे।

दो राजनयिकों ने, जो वहाँ पहले भी आ चुके थे, कहा, "क्या यह शानदार नहीं है! महामहिम क्या आपने नमूने और रंगों पर ध्यान दिया है!" इतना कहकर उन्होंने यह सोचकर खाली करघे की ओर इशारा किया। उनका विचार था कि अन्य लोग वस्त्र को देख रहे होंगे।

"यह सब क्या है?" राजा ने सोचा। "मुझे तो कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। क्या मैं मूर्ख हूँ? क्या मैं राजा होने के योग्य नहीं हूँ? और अगर यह सिद्ध हो जाता है तो मेरे साथ होने वाली यह सबसे भयानक बात होगी।"... "हाँ यह बहुत सुंदर है," राजा ने ज़ोर से कहा, "मेरी इस बात से पूर्ण सहमति है।" संतुष्ट होकर उसने सिर हिलाया, दृष्टि करघे पर जमा दी क्योंकि वह यह नहीं कह सकता था कि वह कुछ नहीं देख पा रहा है। उसके साथ आया पूरा अनुचर वर्ग आँखें फाड़े देख रहा था और सभी की तरह उन्हें भी कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। लेकिन राजा की तरह उन्होंने भी कहा, "यह कितना सुंदर है!" उन्होंने राजा को सलाह दी कि शीघ्र ही निकलने वाले महान जुलूस में उन्हें इन वस्त्रों के धारण करना चाहिए। अब हर आदमी यही कहने लगा कि यह बहुत भव्य है, सुंदर है। चारो तरफ लोग प्रसन्न हो रहे थे। राजा ने दोनों धूर्तों को ‘डाही बुनकर’ की उपाधि दी।

जुलूस निकलने से पूर्व की रात में दोनों धूर्त जाग रहे थे और उन्होंने सोलह मोमबत्तियाँ जला रखी थीं। लोग देख रहे थे कि राजा की पोशाक बनाने के लिए वे बहुत मेहनत कर रहे थे। उन्होंने ऐसा दिखावा किया जैसे वे वस्त्र को करघे से उतार रहे हों। उन्होंने बड़ी कैंचियाँ लेकर हवा में काटने का अभिनय किया और किसी धागे के बग़ैर उन्होंने सुई से उसकी सिलाई की। और अंत में उन्होंने कहा, "वस्त्र तैयार हो गए हैं।"

अपने अश्वारोहियों के साथ राजा स्वयं आया। दोनों धूर्तों ने एक हाथ ऊपर उठाया जैसे वे कुछ उठाए हों। उन्होंने कहा, "देखिए यह रहा आपका पायजामा और यह कोट। मकड़ी के जाले से भी यह बहुत ही कम वज़न का है। कोई ऐसा सोच सकता है कि आप कुछ नहीं पहने हैं। यही इस वस्त्र की विशेषता है।"

सभी घुड़सवारों ने कहा, "हाँ"। पर वे कुछ भी नहीं देख सके। क्योंकि वहाँ कुछ था ही नहीं। उन धूर्तों ने कहा, "महामहिम, क्या आप अपने वस्त्र उतारने की अनुमति देंगे ताकि इस शीशे के सामने हम आपको नए वस्त्र पहना सकें।"

राजा ने अपने कपड़े उतार दिए और धूर्तों ने उन्हें नए कपड़े पहनाने का नाटक किया। बादशाह ने घूम फिर का शीशे में अपने को देखा।

सभी ने एक साथ कह, "अरे वाह! ये वस्त्र कितने अच्छे लग रहे हैं और राजा को कितने फिट आए हैं। क्या डिज़ाइन है, क्या रंग है। यह एक शानदार पोशाक है।"

अश्वारोहियों के नायक ने कहा, "आपके ऊपर लगाने के लिए लोग चंदोबा लिए बाहर खड़े हैं जो जुलूस में आपके ऊपर लगा रहेगा।"

राजा ने उत्तर दिया, "मैं तैयार हूँ। क्या हमारे ऊपर यह पोशाक फब नहीं रही है!" इतना कहकर वह शीशे के सामने घूम-घूमकर अपनी पोशाक देखने लगा क्योंकि वह चाहता था कि उसकी पोशाक ऐसी लगे जैसे बड़ी रुचि के साथ उसने उसकी परिकल्पना की हो।

राजा की गाड़ी खींचने वाले दोनों व्यक्तियों ने अपने हाथ पृथ्वी की ओर झुका दिए जैसे कि वह राजा का लबादा पीछे से पकड़कर हवा में उठाना चाहते हों। वे कुछ भी कहने या करने का इतना साहस नहीं कर सके कि लोग यह समझें कि उन्हे कुछ भी दिखाई नहीं दिया है।

अपने अनुचरों के साथ राजा जुलूस में निकला। सड़क पर खड़े सभी लोगों ने कहा, "राजा की पोशाक कितनी शानदार है और यह कितनी अच्छी सिली हुई है।" किसी का यह साहस नहीं हुआ कि कहे कि उसे पोशाक नहीं दखाई दे रही है क्योंकि वह अपने को पद के अयोग्य या मूर्ख नहीं कहलाना चाहता था। किसी भी बादशाह की पोशाक ने इतनी लोकप्रियता नहीं पाई थी जैसी कि इस राजा की पोशाक ने पाई।

तभी एक बच्चे ने चिल्लाकर कहा, "अरे! राजा तो नंगा है।"

उसके पिता ने कहा, "इस भोले-भाले बच्चे ने जो कहा है, उसे कृपया सुनें।" उसके बाद बच्चे की बात को लेकर कानाफूसी होने लगी।

अंततः सभी लोगों ने कहा, "राजा कोई वस्त्र नहीं पहने हैं।" राजा को यह बात छू गई कि ये लोग ठीक कह रहे हैं। फिर उसने सोचा, "मुझे जुलूस पूरा कर लेना चाहिए।" वह थोड़ा ऊँचाई पर खड़ा हो गया। गृह-प्रबंधकों ने गाड़ी को मज़बूती से पकड़कर और ऊँचा उठा दिया और उसे आगे ले चले और ऐसे वस्त्रों की नुमाइश करने लगे जिसका कोई अस्तित्व नहीं था।

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