प्रौढ़ शिक्षा केंद्र और राजनीति के अखाड़े

20-02-2019

प्रौढ़ शिक्षा केंद्र और राजनीति के अखाड़े

अमित शर्मा

स्कूल और कॉलेजों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है। मंदिर इस देश की राजनीति को बहुत भाते हैं फिर चाहे वो इबादत के हों या शिक्षा के। शिक्षा के मंदिरों में राजनैतिक दल जितनी आसानी से घुस जाते हैं, उतनी आसानी से तो अवैध बांग्लादेशी भी भारत में नहीं घुस पाते हैं। नेताओं को हर जगह देरी से पहुँचने की आदत होती है और इसका अभ्यास वो शिक्षाकाल से ही करते हैं। डॉक्टर-इंजिनीयर बनने वाले छात्र 22-23 की उम्र में ही डिग्री पाकर कॉलेज से निकल जाते हैं। लेकिन नेता बनने का ख़्वाब पाले हुए छात्र कॉलेज में सरकारी सब्सिडी का उपयोग (सत्यानाश) करते हुए कई पंचवर्षीय योजनाओं के सफल क्रियान्वन तथा उम्र के कई बसंत का सफलतापूर्वक अंत करने के बाद ही कॉलेज छोड़कर राजनीतिक परिदृश्य में पहुँचते हैं।

देश में कई "शिक्षा मंदिर" सरकारी मदद रूपी प्रसाद से "प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र" का काम कर रहे हैं। क्योंकि जिस उम्र के विद्यार्थी इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं उस उम्र में एक "सामान्य" इंसान अपने बच्चों को पढ़ाता है। जिन लोगों को देश का करदाता होना चाहिए था, वो कॉलेजों के भोजनालय में अनाज के दुश्मन बने हुए हैं और "पताका-बीड़ी" पीते हुए क्रांति की ध्वजा पताका लहरा रहे हैं। भूमि अधिग्रहण कानून पर घिरी सरकारों को इन "प्रौढ़ विद्यार्थियों" को धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि इनके कॉलेज में रहने से सरकारों को इनके लिये प्रौढ़ शिक्षा केंद्र या वृद्धाश्रम बनाने के लिए अलग भूमि आवंटित नहीं करनी पड़ रही है।

इनमें से ज़्यादातर छात्र वर्षों तक पीएच.डी. करते हुए दिखते हैं। भले ही ये समाज के भले के लिए कोई खोज करें या न करें लेकिन टैक्सपेयर्स के पैसों पर बोझ ज़रूर बने रहते हैं। इनकी किताबों के पेज से लेकर फेसबुक पेज तक सब " स्पॉन्सर्ड" होते हैं। वैसे ये स्वभाव से स्वाभिमानी होते हैं; कभी किसी का उधार नहीं रखते सिवाय कॉलेज की कैंटीन वाले को छोड़कर। कॉलेज छोड़कर समाज पर ये जो "उपकार" करते हैं उसे राजनीति में आकर किये गए "अपकार" से "सेटऑफ" कर लेते हैं

ये विद्यार्थी अपने हाथों में मेंहदी लगाने की उम्र में कॉलेज में आते हैं और बालों में मेंहदी लगाने की उम्र तक बने रहते हैं। वैसे इन विद्यार्थियों की वजह से देश और समाज तो "सफर" करता ही है परन्तु जब ये ख़ुद कहीं "सफ़र" करते हैं तो ये तय नहीं कर पाते हैं कि इन्हें किराये में छूट छात्र के रूप में लेनी है या फिर सीनियर सीटीज़न के रूप में। कुछ छात्र तो इतने प्राचीन हो जाते हैं कि उनके घर वालों को किसी भी शुभ अवसर पर बड़ों का आशीर्वाद लेने के लिए कॉलेज आना पड़ता है। इन छात्रों को भले ही कभी डिग्री मिले या ना मिले लेकिन पुलिस की "थर्ड डिग्री" बहुत बार मिल चुकी होती है। ये नौकरी माँगने की उम्र में एक आज़ाद देश में आज़ादी माँगते रहते हैं।

जब ऐसे प्रौढ़ शिक्षा केंद्र राजनीति का अखाड़ा बन जाते हैं तो आंतकवादी की फाँसी भी शहादत बन जाती है और राष्ट्रविरोधी नारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। ऐसा नहीं है कि ये प्रौढ़ शिक्षा केंद्र केवल सरकार से मदद लेते ही हैं, ये सरकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा देने में मदद भी करते हैं। इनकी वजह से ही "मेक इन इण्डिया" प्रोजेक्ट अपने शुरूआती चरण में ही सफल होता दिख रहा है। पहले हम "सीमा पार" से राष्ट्रद्रोह आयात करते थे लेकिन अब तड़ी-पार लोग इसे देश के अंदर ही निर्मित करने लगे हैं। राष्ट्रद्रोह के लिए अब हमें अपने पड़ोसियों का मुँह नहीं ताकना पड़ता, इस मामले में देश आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम बढ़ा चुका है। "स्किल इण्डिया" के तहत इन केन्दों के छात्रों ने बाहर से आने वाले आतंकवादियों को कड़ा कम्पटीशन दिया है।

सीमा पर शहीद होने वाले देशभक्त जवानों के शरीर को तिरंगे से ढका जाता है, लेकिन देश में रहकर देश के ख़िलाफ़ ही नारे लगाने वालों के द्रोह को "फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन" से ढका जा रहा है। यह फ़्रीडम जो भले ही दिखती नहीं हो लेकिन आदमी की औक़ात से भी ज़्यादा फैला के उपयोग में लायी जा सकती है। मतलब हम चीज़ को ढक कर छुपा सकते हैं सिवाय ग़रीबी और भुखमरी के।

हम "वसुधैव- कुटुंबकम' की अवधारणा को मानने वाले हैं, इसीलिए देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे हमें विचलित नहीं करते। क्योंकि हमारे कितने भी टुकड़े क्यों ना हो जायें, हर टुकड़ा रहेगा तो उसी "अखंड भारत" का अंश। हम नारेबाज़ी  से प्रभावित होने वाले लोग नहीं हैं; इसीलिए "भारत की बर्बादी" के नारे लगाने वालो पर हँसकर हम सोचते हैं कि जब देश के नेता ये काम अच्छे से कर रहे हैं तो किसी यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को इसमें पड़ने की क्या ज़रूरत हैं? हमारा मानना है कि नारों से देश के "वारे-न्यारे" नहीं होते हैं और ना ही बँटवारे होते हैं। हम दुनिया को  सन्देश देना चाहते हैं कि  हम "आउट ऑफ़ द बॉक्स" सोच वाले हैं  क्योंकि "अपना देश ज़िंदाबाद" वाले नारे तो सभी लगाते हैं; "शत्रु पड़ोसी ज़िंदाबाद" के नारे लगाने का दम केवल हम ही दिखा सकते हैं। हमने विश्व  को शून्य दिया था और अंत में हम इसी में  विलीन हो जायेंगे।

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