प्रिये तुम पूरी कशिश हो

15-03-2021

प्रिये तुम पूरी कशिश हो

संजय कवि ’श्री श्री’

कानों में कुंडल
हैं गरिमा समेटे;
ग़ज़ब लग रही हो
तुम लाली लपेटे।
 
लबों पर हँसी, और
निश्छल निगाहें;
तुम्हें ज़्यादा देखें,
या ज़्यादा सराहें?
 
माला गले में
रवायत की मूरत;
माथे की बिंदी
बड़ी ख़ूबसूरत।
 
लटकी लटें हैं
नदी बीच धारा;
खिलता कलाई में
कंगन तुम्हारा।
 
सच है, प्रिये
तुम पूरी 'कशिश' हो;
रब की बनाई
अंतिम कोशिश हो।

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