प्रवासी कथा साहित्य में स्त्री जीवन की अंतर कथा

15-04-2019

प्रवासी कथा साहित्य में स्त्री जीवन की अंतर कथा

डॉ. एम. वेंकटेश्वर

समकालीन हिंदी कथा साहित्य की दशा और दिशा विभिन्न सैद्धान्तिक विमर्शों के द्वारा तय की जा रही है। कथा साहित्य को स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि नाना प्रकार के विमर्शों के खाँचों में भरकर देखने की परिपाटी चल पड़ी है। हिंदी में विमर्श, आलोचना की एक विशेष पद्धति के रूप में विकसित हुई है। यह साहित्य को देखने और अनुभव करने के लिए एक नया औज़ार बन गई है। इसी क्रम में प्रवासी साहित्य पर विचार करने के लिए प्रवासी विमर्श का भी उदय हो चुका है। प्रवासी साहित्यकारों के द्वारा रचित साहित्य ‘प्रवासी विमर्श‘ के अंतर्गत अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। 

कथा साहित्य में परिवेश अथवा पृष्ठभूमि, कथानक एवं पात्रों की मनोवैज्ञानिकता को चित्रित करने में अत्यंत कारगर भूमिका का निर्वाह करते हैं। प्रथम दृष्ट्या कथा लेखन में कथाकार का परिवेश, निश्चित रूप से कथानक की बुनावट में असर पैदा करता है, इसके उपरांत कथाकार अपने कथानक के लिए भी एक विशेष परिवेश का चयन करता है जिसमें कथानक अपना विस्तार पाती है। जिस परिवेश में कथाकार जीवन व्यतीत करता है, वह परिवेश उसके लेखन में अनायास रूपित होता है। परिवेश कल्पित भी हो सकता है। कल्पित परिवेश को यथार्थ स्वरूप प्रदान करने की विशिष्टता, केवल अद्भुत कल्पना कौशल युक्त दृष्टि से ही संभव है। 

भारतीय परिवेश में रचित कथा साहित्य में भारतीय प्रकृति, समाज और समाज से जुड़ी इतर स्थितियाँ चित्रित होती हैं। भारत से बाहर के देशों में रहने वाले लेखक अपने इर्द-गिर्द के परिवेशजनित सामाजिक स्थितियों का चित्रण स्वाभाविक रूप से करते हैं। विदेशों में बसे हुए भारतीय मूल के रचनाकार ही प्रवासी साहित्यकार कहलाते हैं जो भारतीय भाषाओं में, मुख्य रूप से भारत में बसे साहित्य प्रेमियों के लिए अपने प्रवासी परिवेश एवं पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में साहित्य की रचना करते हैं। प्रवासी साहित्य स्वभाव से परिवेश प्रधान होता है। प्रवासी भारतीय आज विश्व के हर कोने में बसे हुए हैं। दशकों पहले कृषि-मज़दूरी, रोज़गार और बेहतर आजीविका के संसाधनों की तलाश में अशिक्षित, अल्पशिक्षित और सुशिक्षित, सभी श्रेणियों के भारतीय समय समय पर विदेश गमन करते ही रहे और अधिकांश लोग जहाँ आजीविका मिली वहीं स्थायी रूप से बस गए। प्रवासी भारतीयों की विशिष्ट संस्कृति का विकास हुआ। प्रवासी साहित्य में स्थानीयता के परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति और समाज के अंतर संबंधों को व्याख्यात किया गया। ब्रिटेन, अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, वेस्ट इंडीज़, दक्षिण आफ्रिका, सूरीनाम, खाड़ी देश, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलेंड आदि देशों में भारतीय मूल के असंख्य लोग बसे हुए हैं। इन प्रवासी भारतीयों में हिंदी के साथ साथ इतर भारतीय भाषी लोग भी बहुतायत से मौजूद हैं जो अपनी अपनी मातृभाषाओं में साहित्य रचना का रहे हैं। हिंदी में रचित प्रवासी साहित्य हिंदी साहित्य का अविभाज्य अंग बना गया है जिसका मूल्यांकन अभी शेष है।  

प्रवासी हिंदी कथा साहित्य निश्चित रूप से कथानक, शैली और शिल्प की दृष्टि से भिन्न और विशिष्ट पहचान रखता है। उपर्युक्त देशों में रचित हिंदी साहित्य स्थानीय परिवेशजनित साहित्य है जिसमें उस देश और काल की स्थितियों का चित्रण होता है। हर देश में सामाजिक नियम, आचार संहिता, जीवन पद्धति उस देश की संस्कृति और परंपराओं से बँधे होते हैं। लेखक अपने परिवेश में जनित समस्याओं, स्त्री-पुरुष संबंधों, वैयक्तिक मनोदशाओं का चित्रण निजी शैली में करता है। विदेशों में रचित हिंदी कथा साहित्य कई अर्थों में भिन्न है। इसमें स्थानीयता के तत्व प्रधान होते हैं, किन्तु मानवीय संवेदनाएँ देश काल की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं इसीलिए प्रेम, राग, विराग जसई संवेदनाओं की अभिव्यक्ति प्रवासी साहित्य में उसी प्रकार दिखाई देती है जैसी कि सामान्य भारतीय साहित्य में। विदेशी समाज में विदेशी सभ्यता और संस्कृति के मानदंडों के बीच जीवन बिताते हुए भारतीय आचार-विचार, राति-रिवाज में पलकर बड़े होकर, रोज़गार के लिए विदेशों में बसने के उपरांत विदेशी जगत के नीति-नियमों के साथ टकराहट की स्थिति उत्पन्न होती है, जो कि स्वाभाविक है। इन स्थितियों से निबटाकर जीवन में सामंजस्य और संतुलन बनाकर जीवन को सुखी बनाना, एक गंभीर चुनौती है। पश्चिमी सामाजिक परिवेश में स्त्री-पुरुष संबंधों तथा दाम्पत्य संबंधों की अनिश्चितता बहुचर्चित एवं बहुचित्रित विषय है। प्रवासी हिंदी कथा साहित्य भी मूल रूप से स्त्री केन्द्रित ही है जो कि स्त्री की सार्वभौमकिता को रेखांकित करता है। प्रवासी कथा साहित्य की एक और विशेषता, स्त्री कथाकारों की बहुलता और प्रधानता है। अमरीका, ब्रिटेन, केनेडा आदि देशों में हिंदी कथा साहित्य के सृजन में भारत की भाँति महिला लेखन महत्वपूर्ण है। इन स्थितियों के साथ प्रवासी रचनाकार भारतीय परिस्थितियों से भी असंपृक्त नहीं रह सकते। स्वदेश से दूर रहते हुए भी वे समय समय पर अपने लेखन में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक गतिविधियों पर कारगर रूप से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। प्रवासी लेखकों की नई पीढ़ी में भारत के प्रति अद्भुत आकर्षण भरा है वे उस नोस्टाल्जिया (घर की याद की मनोदशा) से ग्रस्त दिखाई देता हैं जिसे वे अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं। प्रवासी कथा साहित्य भारत के पाठकों के लिए एक नयेपन का बोध कराता है। प्रवासी कथा साहित्य में अपने अपनाए हुए देश के परिवेश, संघर्ष, विशिष्टताओं और उपलब्धियों का तन्मयता के साथ किया गया चित्रण भारत के लोगों का ध्यान आकर्षित करता है।   

स्त्री के प्रति विश्व सभ्यता का हर समाज अनादि काल से अनुदार ही रहा है। स्त्री का जीवन सदैव विषमताओं, विसंगतियों एवं समझौतों की ही कथा कहता है। प्रवासी कथा साहित्य इसका अपवाद नहीं है। प्रवासी साहित्यकारों में कुछ तो ऐसे लेखक हैं जो विदेशी सभ्यता एवं संस्कृति का आकलन भारतीय मानदंडों के आधार पर करते हैं, जिससे उन्हें कभी निराशा तो कभी उत्साह का अनुभव होता है। 

प्रवासी कथाकारों ने विपुल मात्रा में हिंदी में कहानियों एवं उपन्यासों की रचना की है। प्रवासी कथाकारों में अमेरिका में स्थायी रूप से बसी हुई हिंदी की सुविख्यात लेखिका उषा प्रियंवदा हैं। जो एक सफल और तेजस्वी कथाकार हैं। इनकी अनेकों कहानियों में ‘वापसी‘ कहानी ने हिंदी कथा साहित्य में पारिवारिक मूल्यों एवं वर्तमान परिवेश में निरंतर क्षरित होती हुई मानवीय संवेदनाओं का अंकन अद्भुत मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है। यह कहानी एक ओर सेवा निवृत्त गजाधर बाबू की आत्मिक वेदना है जिसे उसकी संतान स्वीकार नहीं करना चाहती। उसके पुत्र और पुत्र वधू के साथ पत्नी भी उस व्यक्ति की आंतरिक व्यथा को समझने में असमर्थ है जिसने अपने परिवार के लिए सारा जीवन घर से दूर रहकर दराज इलाक़ों में नौकरी की, सिर्फ़ इस आशा को मन में सँजोये कि सेवा निवृत्ति के बाद वह सुख से अपने भरे पूरे परिवार में लौट आयेगा। उषा प्रियंवदा अमेरिका में रहते हुए भी भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संवेदनाओं के प्रति जिस आत्मीयता और प्रतिबद्धता का अहसास इस कहानी के द्वारा पाठकों को कराती हैं, वह अद्भुत है। यह कहानी हिंदी कथा साहित्य में कालजयी कहानी के रूप में स्थापित हो चुकी है। 

उषा प्रियंवदा के उपन्यास, उनकी स्त्री पक्षधरता को प्रबलता के साथ स्थापित करते हैं। पचपन खंभे लाल दीवारें, रुकोगी नहीं राधिका, शेषयात्रा, अंतरवंशी, नदी आदि उपन्यासों में उनके स्त्री पात्र एक भिन्न धरातल पर सामाजिक विद्रूपताओं को झेलते नज़र आते हैं। पचपन खंभे लाल दीवारें की नायिका भारतीय मध्यवर्गीय कुटुंब की आकांक्षाओं की पूर्ति करते करते रिसने लगती है। वह मध्यवर्गीय कुटुंब की धुरी बनकर, अपनी आकांक्षाओं और भविष्य को त्यागकर कृत्रिम उदात्तता का वरन करती है। सुशिक्षित स्त्री, का स्वार्थ त्याग, जिसे भारतीय स्त्री का कर्तव्य बनाकर उसे ‘देवी’ का दर्जा देकर उसे महिमामंडित करने की प्रथा पर लेखिका ने प्रहार किया है। हिंदी कथा साहित्य में ‘पचपन खंभे लाल दीवारें‘ उपन्यास का विशिष्ट स्थान है। अमेरिकी परिवेश में जीवन यापन करने वाली एक बुद्धिजीवी लेखिका भारतीय मध्यवर्ग की विडंबना को विस्मृत नहीं कर पाती। प्रवासी लेखकों में भारतीय जीवन में व्याप्त विडंबनाओं और विसंगतियों को अधिक प्रखरता के साथ कथा साहित्य में प्रस्तुत करने का साहस, शायद विदेशी भूमि पर रहकर प्राप्त होता है।  

‘नदी‘ उपन्यास में उषा प्रियंवदा ने भारतीय पुरुषों द्वारा ब्याहता पत्नी के साथ अमेरिकी परिवेश में किए जाने वाले छल और अन्याय का चित्रण सहजता के साथ किया है। पत्नी को मानसिक विकलांग बच्चे को जन्म देने के अपराध में पति उसे अमेरिका में बेसहारा छोड़कर अपनी सारी संपत्ति समेटकर भारत लौट जाता है। पत्नी अमेरिका में दर-बदर भटकती है। अन्य पुरुष की शरण में जाकर, अपने को समर्पित कर, वह भारत आने के लिए साधन जुटाती है। भारत में उसे ससुराल से पता चलता है कि पति ने दूसरा घर बसा लिया है किन्तु ससुराल के सदस्य उसे बहू का ही मान सम्मान देते हैं। वह अमेरिका लौट आती है, उसे पुरुष सहारा देते हैं किन्तु बिना मूल्य चुकाए, स्त्री को कहीं सहारा नहीं मिलता। संघर्ष करती हुई वह मानव समुदाय से दूर एकांत में अपना शेष जीवन बिताने के लिए सभ्य समाज का बहिष्कार कर देती है। 

स्त्री वह नदी है, जो कभी, कहीं ठहरती नहीं है। वह निरंतर प्रवाहमान है। उसके मार्ग में पत्थर, चट्टान, पहाड़, बीहड़, जंगल, दलदल सब आते हैं, वह अपनी धार को मोड़ लेती है किन्तु बहाना नहीं छोड़ती। 

‘शेष यात्रा‘ उपन्यास अमेरिकी परिवेश में पति द्वारा अकस्मात परित्यक्त संघर्षशील के जिजीविषा की कथा का चित्रण हुआ है। प्रकारांतर से उषा प्रियंवदा के स्त्री पात्र अपने अस्तित्व की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाते हैं और अपनी आत्मनिर्भरता को सिद्ध करने में सक्षम होते हैं। 

उषा प्रियंवदा की अधिकांश कहानियों के केंद्र में अमेरिकी परिवेश में पुरुषों द्वारा छली गई विवाहित स्त्रियों के जीवन संघर्ष के वृत्त चित्र समाहित हैं। जो कि विदेशों में छली जाने वाली स्त्रियों को न्याय दिलाने की दिशा में कारगर क़दम उठाने के लिए समाज को प्रेरित करता है। "आधा शहर" उषा प्रियंवदा की ऐसी ही कहानी है जिसमें नायिका बुद्धिजीवी वर्ग कि महिला है, अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका है किन्तु निजी जीवन में प्रेमी द्वारा अमेरिका में छली जाकर कलंकित होकर, जीवन की नई शुरुआत करने के लिए भारत लौट आती है। 

उषा प्रियंवदा, प्रवासी हिंदी कथाकारों में लोकप्रिय और सार्थक कथाकार के रूप में समादृत हैं। 
अमेरिका की प्रवासी हिंदी कथाकारों में सुषमा बेदी का स्थान महत्वपूर्ण है। यह एक प्रसिद्ध कहानीकार हैं। लंबे अरसे से अमेरिका में प्रवासी जीवन व्यतीत करने के बावजूद भारतीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से अलग नहीं हो पाई हैं। उनकी यह भारतीय मानसिकता विदेशी परिवेश में भी अपनी ज़मीन ढूँढ़ लेता है। 

विदेशी परिवेश में भारतीय मूल के स्त्री पुरुष विदेशी जीवन साथियों के साथ जीवन बिताते हुए, पारिवारिक, और सामाजिक अनुष्ठानों में भारतीय रूढ़िवादी परंपराओं के निर्वाह की हठधर्मिता कर बैठते हैं, जिस कारण उनके दांपत्य संबंधों में तनाव उत्पन्न होता है और उनका विवाह टूट जाता है। यह विषय प्रवासी हिंदी कथा साहित्य में अधिकाधिक चित्रित हुए हैं। सुषमा बेदी की कतिपय कहानियाँ इन्हीं प्रसंगों को उद्घाटित करती हैं। हिंदी की सुप्रसिद्ध कहानीकार उषाराजे सक्सेना लंदन में निवास करती हैं। लंदन (इंग्लैंड) की ज़मीन पर रहते हुए ही उन्होंने अपना संपूर्ण लेखन का कार्य सफलतापूर्वक किया है। उनकी कहानियों में कर्मठता और परिश्रम द्वारा अपनी पहचान बनाने में सक्षम नारी के चित्र मिलते हैं। प्रवासी कथाकरों ने अपने कथा लेखन के माध्यम से स्त्री के हर रूप को अपनी रचनाओं में बारीक़ी से दर्शाने का श्रमसाध्य प्रयास किया है। अमेरिका की ही एक अन्य कहानीकार पुष्पा सक्सेना की कहानी ‘विकल्प कोई नहीं‘ पुत्र के मरणोपरांत पुत्र शोक की व्यथा को भीतर ही भीतर छिपाकार सहते हुए ही माँ, बहू के भविष्य को सुस्थिर करने के लिए विचार करती है। बहू को बेटी का दर्जा प्रदान कर, उसका विवाह करती है ताकि वह एक नये सिरे से जीवन शुरू कर सके। सास के स्थान से वह माता की भूमिका में स्वयं को ढालकर बहू को पुत्री की दृष्टि से उसे स्वतंत्र होकर जीने की प्रेरणा देती है। यह जीवन के प्रति एक प्रगतिशील दृष्टिकोण है जिसे लेखिका ने कहानी के माध्यम से समाज को बताने का प्रयास किया है। ऐसी स्थिति को स्वीकार करने के लिए पीड़िता स्त्री को बाह्य और भावानात्मक संबल की भी आवश्यकता होती है। माँ के रूप में उसकी सास ही उसे मनोवैज्ञानिक बल प्रदान करती है, वह बहू को समझाती है की ‘दूसरा पति‘ पहले का विकल्प नहीं हो सकता, उसे जीवन को तुलनात्मक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, यह वैचारिक दृढ़ता और परिस्थितियों से समझौता करने की शक्ति स्त्री के लिए आवश्यक है, लेखिका ने सफलतापूर्वक सिद्ध किया है।   

लंदन में स्थित उषाराजे सक्सेना प्रवासी हिंदी कथाकारों में अग्रणी कथाकार हैं। इनकी बहुचर्चित कहानी है – 
‘बीमा बिस्माट‘। यह एक ऐसी अध्यापिका की कहानी है जो केवल अपनी जुझारू कर्मठता के बल पर एक अर्ध विक्षिप्त, अविकसित मानसिकता से ग्रस्त बालक का मनोवैज्ञानिक उपचार कर उसे ब्रिटेन का सक्षम नागरिक बनाती है। विपरीत परिस्थितियों में असाध्य और दुष्कर चुनौतियों को स्वीकार कर, जटिल से जटिल समस्या का समाधान ढूँढ़कर लक्ष्य को प्राप्त करने की स्त्रियों की अपराजेय शक्ति को इस तरह लेखिका अपनी कहानी के द्वारा पाठकों के सम्मुख लाती हैं। 

अमेरिका और यूरोपीय दांपत्य जीवन शैलियाँ भारतीय दांपत्य जीवन विधान से काफ़ी भिन्न हैं। उन्मुक्तता और खुलापन पति-पत्नी, दोनों के व्यवहार में स्वाभाविक रूप से वहाँ के परिवेश में विकसित हो जाता है। भारतीय मूल के लोग उन देशों में बसकर भारतीय पारंपरिक गृहस्थ जीवन बिताते हुए धीरे धीरे स्थानीय सामाजिकता के रंग में ढलने लगते हैं। किन्तु जब पति या पत्नी कोई एक उस जीवन में व्याप्त उन्मुक्तता एवं विशृंखलता को अपना नहीं सकता तब वहाँ टकराहट की स्थिति पैदा होती है और दांपत्य जीवन बिखरने लगता है। अमेरिका के प्रवासी लेखक उमहस अग्निहोत्री की बहुचर्चित कहानी, ‘क्या हम दोस्त नहीं रह सकते‘ इसी स्थिति से उत्पन्न बिखराव को चित्रित करता है। यह कहानी प्रेरक और समस्यामूलक कहानी है जो पति को दोस्त के रूप में ही देखना चाहती है जैसा उसने विवाहपूर्व था और जिस दोस्ती की भावना से उत्प्रेरित होकर उसने विवाह किया था। किन्तु पति विवाह के पश्चात पत्नी पर अपना अधिकार चाहता है, जिसके लिए उसने विवाह किया था। विदेशी परिवेश में स्त्री (पत्नी) अपनी स्वेच्छा का अधिकार माँगती है। वह मित्र को पति का रूप धारण करता हुआ नहीं स्वीकार कर पाती है जिससे तनाव पैदा होता है और उनका दांपत्य ख़तरे में पड़ जाता है। कहानीकार ने स्त्री के मनोविज्ञान को दर्शाने में सफलता हासिल की है। सुमन घई कनाडा के बहुचर्चित हिंदी कहानीकार हैं जिनकी कतिपय कहानियाँ स्त्री के संघर्षमय साहस का परिचय देती हैं। लेखक की कहानियों में विपरीत स्थितियों में कठिनाइयों से जूझते हुए बच्चों का पालन-पोषण करते हुए जीवन बिताने वाली स्त्रियों की संघर्ष कथा है। 

अमेरिका की प्रवासी हिंदी कथाकार सुदर्शन प्रियदर्शिनी द्वारा रचित कहानी ‘धूप‘ विदेशी परिवेश में पनप रहे असंतुष्ट विफल होते हुए दांपत्य जीवन को चित्रित करने वाली एक बहुप्रशंसित कहानी है। भारतीय स्त्री विवाह के बाद पति को जब स्वार्थ और आत्मकेंद्रित अमेरिकी साँचे में ढलते हुए देखती है तो उसे निराशा होती है। सुखी और आनंदमय वैवाहिक जीवन के उसके सपने बिखर जाते हैं। वह अपनी और पति की आकांक्षाओं के मध्य पसीने लगती है। उसके मन का अंतर्द्वंद्व से जूझती हुई, अपनी सूझबूझ से दांपत्य जीवन को सँवारने का प्रयास करती है। लेखिका ने कहानी में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से कथा-नायिका के अंतर्द्वंद्व को प्रस्तुत किया है। 

प्रवासी कथाकारों ने अपनी रचनाओं में विदेशी भूमि पर स्त्री की परिवेशजनित समस्याओं को प्रस्तुत किया है। यह कथा साहित्य विदेशों में निवास करने वाले भारतीय स्त्री पुरुषों की वैयक्तिक, आजीविका से जुड़ी तथा अन्य सामाजिक समस्याओं का चित्रण करने में सफल हुई हैं। विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों का जीवन, प्रवासी कथा साहित्य के माध्यम से ही मुख्यत: उपलब्ध होता है। यह कथा साहित्य इस तथ्य को भी प्रमाणित करता है कि प्रतिकूल परिवेश में भी प्रवासी भारतीयों में अपनी मूल पारंपरिक सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति लगाव है। कुछ अपवादों को छोड़, बहुसंख्यक प्रवासी भारतीयों में अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति के प्रति आस्था और विश्वास कायम है। 

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