प्रकृति से दूर

डॉ. आस्था नवल

मैंने बोला, चिठ्ठी लिखना
वो बोली, ई मेल करूँगी
मैं बोला घर आना
वो बोला, मैं फोन करूँगा

खिड़की पे बैठ के सुनना चाहा मैंने
चिड़िया और हवा का राग
उसने झट परदे करके खोला टीवी
जानने को मौसम का हाल

क्या सिर्फ मैं ही ऐसी हूँ?
जो चाहे मानव से मानव सा प्यार
हाथों से लिखी चिठ्ठी, घर में यारों का शोर
खुली खिड़की से मौसम का हाल

पैकेट वाला खाना खा खाकर
भूले हम हाथों का स्वाद
कानों में हेड फोन लगा कर
भूला हमें प्रकृति का राग
दुनिया भर में चैटिंग करके
बनाए हमने दोस्त हज़ार
पर क्यों भूल जाते हैं लेना
घर बैठी बूढ़ी दादी का हाल!

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