फैलाओ अपनी बाँहें 

01-12-2019

फैलाओ अपनी बाँहें 

डॉ. कविता भट्ट

हे प्रिय! 
कभी उस आकाश-सी 
फैलाओ अपनी बाँहें, 
जो धरती की उन्मुक्त गति को 
निरंतर देता है प्रिय आधार 
जिससे धरती पर 
बरसते हैं बादल 
आती-जाती हैं ऋतुएँ 
ग्रीष्म, वर्षा, शरद 
शिशिर, हेमंत और बसंत . . .

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