पंडितजी का लड्डू

धर्मेन्द्र कुमार

पंडित भोगमल तड़के उठ के नित्यकर्म से निवृत हो, गंगा स्नान कर आये और भगवान के भोग लगाने को लड्डू बनाने लगे। यह उनकी दिनचर्या थी। उसी समय उनका छोटा लड़का उठ के आँखें मींचते आया और धीरे से एक लड्डू उठा के खाने लगा। जब तक पंडित जी हाँ-हाँ करते‚ तब तक लड्डू मुँह में चला गया और दूसरे के लिए थाल में हाथ डाल दिया। पंडित जी ने ग़ुस्से में उठकर लड़के को चार-पाँच थप्पड़ जड़ दिये; और आप ऐसे बेजान पड़ गये‚ मानों कोई बहुत बड़ा अपशगुन हो गया। बच्चा गला फाड़ के रोने लगा। पंडिताइन रसोई में थी, बदहवास आकर बच्चे को गोद में उठा लिया और जलकर बोली, “एक लड्डू खा लिया तो ऐसी कौन सी आफ़त आ गयी थी। सुबह-सुबह इतना मार दिये। गाल पर ऊँगुलियों के निशान बन गये। कुत्ते रोज़ ही शिवजी पर, ब्रह्मबाबा पर पेशाब कर देते हैं‚ उनको तो कुछ नहीं करते। वहाँ आपका कोई ज़ोर नहीं। जानते हैं वह आपकी पकड़ से बाहर है। जहाँ आदमी का ज़ोर ख़त्म हो जाता है, वहाँ समझौता, बहाना, छलावा, कोई नियम या परम्परा गढ़ दिया जाता है।” फिर बच्चे को चुप कराती हुई बोली, “चुप हो जा लाल, चल तुझे बिस्कुट देती हूँ। जब इस पत्थर की मूर्ति से ही इतना लगाव था तो शादी क्यों किये? और अगर वासना से वशीभूत शादी कर भी लिये तो बच्चा जनन न करते। फिर कोई तंग करने न आता।”

पंडित जी ज़रा तेज़ होकर बोले, “तुम क्या समझती हो, एक तुम्हीं को बच्चों से प्रेम है। जब वह बीमार होता है तो लेकर कहाँ-कहाँ नहीं जाता! समय-कुसमय की परवाह किये बग़ैर पैसा पानी की तरह बहाने से भी कभी पीछे नहीं हटता; किन्तु धर्म इन सबसे ऊँचा है, ईश्वर सबसे महान है। इसीलिए तो नीचों को इससे वंचित रखा गया है। केवल ब्राह्मणों को ही पूजा-पाठ, विधि-विधान, साइत-संयोग बाचने का अधिकार है। परमेश्वर ब्राह्मणों के हाथों के सिवा और किसी भी हाथों से प्रसाद या अन्य सामग्रियाँ ग्रहण नहीं करते। इतने महान और पवित्र ईश्वर को जूठन, अपवित्र और अशुद्ध प्रसाद कैसे भेंट करूँ? अब बताओ, पूरा लड्डू फिर से बनाना पड़ेगा कि नहीं? धर्म-कर्म के चीज़ों में शगुन बरतना पड़ता है, ऐसे ही नहीं‚ ईश्वर प्रसन्न होते हैं। यह सबके बस की बात नहीं। हाथ धोकर बेसन दे दो, फिर से लड्डू बना दूँ। तुम तो जानती हो‚ मैं इस मंदिर में नीचों और स्त्रियों को नहीं आने देता, इसका कारण पवित्रता और शुद्धता बनाये रखना है।”

पंडिताइन नर्म होकर बोली, “बच्चों का एक ख़ून भी माफ़ होता है। क्या तुम्हारा ईश्वर इन मानवों से भी ज़्यादा क्रूर हैं? सबरी के जूठे बैर तो खाये ही थे।”

पंडित ने डाँटा, “देखो पंडिताइन, ज़्यादा न बहको, चुपचाप बेसन दे जाओ।”

पंडिताइन ने कहा, "वह तो सहुआइन की दुकान से आता है।”

“तो क्या हुआ?”

“कई बार ख़्याल किया है, कुछ खाती रहती है और सौदा भी दे देती है। फिर बोरे लाकर जो उनके दुकान में रखते है‚ वे खटिक है। इन पलदारों में कई नीच डोम भी हैं।”

पंडित आश्चर्य से देखकर, "तो क्या हुआ, रोज़ तो उसी का भोग लगाता हूँ।”

“बात यह है कि देखती हूँ, ट्रकों से लादने या उतारने के क्रम में उसी पर चढ़कर, पैर रखकर लादते उतारते हैं। अब धर्म-कर्म की बात है, सब ध्यान रखना पड़ेगा कि नहीं!”

पंडितजी ज़रा चिंतित होकर बोले, "ठाकुर जी के भोग लगाने को कुछ तो चाहिए कि नहीं? देखो, अंदर अछूता गुड़ ही हो तो थोड़ा-सा दे दो।” एकाएक कुछ याद करके, "अरे हाँ! परसों ही तो बाज़ार से गुड़ लाया था। जाओ‚ उसी में से एक-दो भेली लेती आओ।”

पंडिताइन हाथ चमकाती हुई बोली, "निछुन्ना तो न होगा। मैंने अपने इन्हीं चमड़े के हाथों से रखा था और फिर जिसमें गुड़ रखा है वह मटका भूलन कहार दे गया था। इन सब बातों को भूल कर ला भी दूँ; किन्तु यह कैसे भूल जाऊँ कि उसमें कई मरे हुये चींटी और चूँटा लिपटे थे। गुड़ ऊँख से बनता है, कलुआड़ में कितनी अनियमितता बरती जाती है। बचपन में कई बार मैंने ही कराह जूठा कर दिया था। वहाँ मिट्ठा से कितनी मख्खियाँ, चीटियाँ, बिरनी या और भी कितने ही छोटे जीव घेरे रहते हैं। उनमें से कितने ही रस में या कराह में गिर जाते हैं और गुड़ में मिल जाते हैं।”

पंडित कुछ बोले नहीं। लड्डू वहीं छोड़, उठे और बगल के मंदिर में जाकर ललाट पर चन्दन लगाया, टीका दिया, भुजाओं पर त्रिशूल बनाये ठाकुर जी का अभिषेक किया, मधु और दही से नहलाया। अगरबत्ती जलाने के लिए डिबिया खींची, देखा तो अगरबत्ती है ही नहीं। वहीं से आवाज़ लगाकर पंडिताइन को बुलाया और तुरन्त दुकान को दौड़ाया। पंडिताइन दस मिनट में वापस आ गयी, हाथ खाली था।

पंडित ने पूछा, "क्या हुआ‚ दुकान बंद है?”

“नहीं खुला है।”

“अगरबत्ती नहीं है?”

“है।”

“तो फिर लायी क्यों नहीं?”

“अगरबत्ती के पैकेट को चूहा कुतर दिया था।”

“तो क्या हुआ? लेती आती, अगरबत्ती तो अंदर रहता है।”

“इन शूद्र जानवरों का जूठा! न जाने कहाँ-कहाँ से घूमते और किस-किस जगह से गुज़रते रहते हैं।”

“शूद्र नहीं महारानी, गणेश जी के प्रिय हैं। पूजा-पाठ में गजानन की बड़ी महिमा है, उनके बिना कोई शुभ कार्य पूर्ण नहीं होता, जाओ‚ लेती आओ।”

पंडिताइन खड़ी रही।

पंडित भड़के, "अब खड़ी क्या हो, जाओ जल्दी लाओ।”

“चली तो जाऊँ‚ मगर कई बार नालियों के रास्ते गुज़रते देखी हूँ। धर्म-कर्म की बात है, फिर भी कहिये तो ला दूँ।”

पंडित कुछ देर सोचने के बाद बोले, "तब रहने दो। मन में भ्रम पैदा कर देती हो। सुनो, धूप-दीप ही लेती आओ।”

दस मिनट बाद पंडिताइन पुनः खाली हाथ आकर खड़ी हो गयी।

पंडित जी बौखलाये, "अब क्या हुआ भाग्यवान?”

पंडिताइन बोली, "धूप-दीप ले ली थी, उसे रखकर पैसे दे रही थी। तभी बिलटन चमार का लड़का आकर छू दिया। दूसरा उनके पास था नहीं। सोची धर्म-करम की बात है, कहीं ईश्वर नाराज़ न हो जाए।”

पंडित ने सोचते हुए कहा, "यह तो तुमने बुद्धिमानी का काम किया। साले को दो-चार थप्पड़ लगाना चाहिए था। बिना धूप-दीप का कैसे पूजा होगा? अच्छा, तुम एक काम करो। बगल वाली बागवानी से दो-चार फूल ही ला दो।” 

पंडिताइन चली गयी और क़रीब बीस मिनट बाद हाँफती हुई खाली हाथ लौट आयी। पंडितजी खाली हाथ देखते ही कुपित होकर बोले, "अब कौन सी आफ़त आ गयी? अबकी खाली हाथ क्यों लौट आयी?”

पंडिताइन एक लम्बी साँस लेकर बोली, "वहाँ पर फूलों की सिंचाई-निराई एक नीच माली करता 

पंडित भड़कते हुए बोले, "तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यह मालियों का ही काम हैं, सनातन से वही करते आ रहे हैं। वह न करेंगे तो फिर कौन करेगा? कोई राजा-रजवाड़ा भला बगवानी में पसीना क्यों बहायेगा?”

“मेरे मन में भी यही विचार आया था। किन्तु जब मैं फूल तोड़ने गयी तो देखी इन फूलों में तितलियाँ, भौरें, मकड़ियाँ और भी न जाने कितने ही प्रकार के कीड़े थे। जो इनके वर्तिकाग्र और पंखुड़ियों से रस निकालकर दूषित, गंदा और जूठा कर रहे थे। कई तो उस पर वीट भी कर दिये थे।”

पंडित ने ग़ुस्से में बालों को नोचते हुए कहा, "मेरा भेजा ख़राब हो गया था, जो तुमसे फूल माँगने की ग़ुस्ताख़ी कर बैठा। फूल में कीड़े-मकौड़े न मिलेंगे तो क्या हाथी-घोड़ा मिलेंगे? आज पता चला तुम्हारी सोच दुनिया से निराली है। महाराज मनु कहते थे कि नारी मूरख होती है। मैं कहता हूँ, अवसर मिले तो पुरुषों को भरे बाज़ार में निलाम कर आये। अब खड़ी सिर झुकाये सुन क्या रही हो, सत्यनारायण भगवान का कथा वाचन नहीं कर रहा हूँ। जाओ और जाकर फूल लेकर आओ।”

पंडिताइन ने पल्लू को दाँतों से दबाते हुए क्षमा याचना के स्वर में कहा, "ऐसे कैसे चलेगा जी! जूठे और गंदा फूलों को आप उस महान पवित्र ईश्वर पर कैसे चढ़ाओगे? यह धरम-करम की बात है, मज़ाक थोड़े है। हम ब्राह्मण हैं, सबका ध्यान रखना पड़ता है।”

पंडित जी का कोप अपनी पराकाष्टा का अतिक्रमण कर, कुछ न कर पाने की स्थिति में निराशा में बदल गया। पोथी पलटते हुए शांत भाव से बोले, "तुम फूल लेकर आओ मैं गंगा-जल और मंत्रोच्चारण द्वारा उसे शुद्ध कर दूँगा।”

पंडिताइन ख़ुशी-ख़ुशी लड्डू का थाल लाकर बोली, "स्वामी, पहले इसे शुद्ध कर दीजिए। आपकी बड़ी कृपा होगी।”

देखते ही पंडितजी का मुखमण्डल विकृत लाल हो गया। पूजा पर न बैठे होते तो पंडिताइन को इन करतूतों का सबक सीखा दिया होता। क्रोध पीकर रह गये। पंडिताइन उनका विकृत मुख देख थाल उठाकर धीरे से चलती बनी। पंडितजी रामचरित मानस का पाठ करने लगे। नहा-धो कर चंदन न लपेट लिया होता तो स्वयं भी जाकर ला सकते थे। पूजा में पवित्रता का बड़ा महत्व है, इस वज़ह से बाहर न निकले। कहीं कोई छु-छुआ गया तो फिर से नहाना पड़ेगा।

पंडितजी दस बजे पूजा समाप्त कर ठाकुरद्वारे से बाहर निकले। निकलते ही खाने पर टूट पड़ते यह उनकी दैनिक वृत्ति थी। दिन भर में एक ही बार इसी समय खाते, मगर जम कर खाते। घर में आये तो पंडिताइन कहीं नहीं दिखी। रसोई में गये तो देखा, चूल्हा ठंडा था। उन्हें ग़ुस्सा ख़ूब आया। उनकी अंतड़ियों में आग लगी थी। सहसा सामने की गलियों से पंडिताइन मुन्ने को लिए आती नज़र आयी। पंडितजी ने आगे बढ़ कर पूछा, "कहाँ चली गयी थी? चूल्हा ठंडा पड़ा है, खाना क्यों नहीं बनायी? तुम जानती हो यह समय मेरे खाने का है। पूजा के बाद मुझसे एक पल भी भूख बर्दास्त नहीं होता।”

पंडिताइन हाँफती हुई पास आकर, थोड़ा दम लेकर बोली, "ज़रा बाजार चली गयी थी। एक सूप लेना था। चावल बिना फटके कैसे बनाती? पिछली वाली सूप भीमा डोम की पत्नी बसमतिया दे गयी थी। सोची जब आप इतने धर्म-कर्म से रहते हैं, तो मैं आपका धर्म क्यों बिगाड़ूँ। इन नीच, अधम डोमों द्वारा बनाये सूपों से चावल फटककर कैसे बनाती? दूधवाले को मना कर दिया। सुना, बछड़ा पिलाकर तब दूध निकालता है। कभी-कभी बछड़ा भी पीता है, दूध भी निकालते हैं। यह तो जूठा हुआ न? और उसी दूध का दही बनाकर हम भगवान को भोग लगाते रहे और ख़ुद भी खाते रहे।" फिर हाथ जोड़कर बोली, "हे ईश्वर! हमें क्षमा करना, जो भी हुआ अनजाने में हुआ। आप जाकर ज़रा एक प्लास्टिक वाली सूप लेते आइये, गोला चले जाइएगा। इधर मैं देख के हार गयी, कहीं नहीं मिला। लेते वक़्त ठीक से पता कर लेना किसने बनाया, कैसे बनाया, कोई नीचों के हाथ का तो नहीं बना है न? बता देना मैं ब्राह्मण हूँ, पूजा-पाठ करता हूँ, धर्म-कर्म से रहता हूँ।” 

यह बात हो ही रही थी कि दरवाज़ा खुला पाकर एक कुत्ता आँगन में आ पहुँचा और थाली में रखा लड्डू खाने लगा। जब तक पंडितजी दौड़ते दो-चार लड्डू चट कर गया। पंडितजी आँगन में पड़ा डंडा उठा के चला दिया। कुत्ता डंडे से आत्मरक्षा के लिए ठाकुरद्वारे में घुस गया। पंडितजी हड़बड़ा के दौड़े और डंडे पर पैर फिसल गया, सँभलते-सँभलते घुटनों के बल गिर पड़े। कुत्ते को मौक़ा मिल गया, जल्दी से निकलकर भागा। पंडिताइन ने दौड़कर पंडित को उठाया, घुटने में चोट लग गयी थी। पंडित कराहते हुए दुःखी मन से बोले, "इस सत्यानाशी ने ठाकुरद्वारे को अपवित्र कर दिया। यह बात मुहल्ले में किसी से मत बताना। ऐसा लगता है घुटने की हड्डी उचट गयी। मुझे उस खाट तक ले चलो।” 

पंडिताइन ने चिंतित स्वर से कहा, "ये क्या कह रहे हैं? आपको याद है यह खाट मरनी में मिला था। महंगू धोबी के पिता मरे थे, उसी के श्राद्ध का यह खाट है। मैं इसे और नीचों के हाथों के जितने भी दान-दक्षिणा में मिली सामग्री है, सबको अग्निदेव के हवाले कर दूँगी। धर्म-कर्म के कामों में मैं कोई मुरौवत नहीं चाहती।”

पंडितजी कुछ बोल न सके। घुटने का दर्द तो था ही‚ किन्तु पंडिताइन की ये बातें सुनकर सर भी दुखने लगा। उन्हें चक्कर सा आने लगा। इन सब चीज़ों के लिए कितने परिश्रम, मनोयोग, वाक्चातुर्य और धर्मान्ध विचारों का सहारा लेना पड़ा था। इन थोड़ी-सी सांसारिक सामग्रियों के बदले उनके घरवालों, परिजनों, बन्धु-बान्धवों को स्वर्ग तक पहुँचाना और उनके पितरों से मुलाक़ात कराना इतना आसान काम नहीं। हम ख़ुद इसमें असफल रह जाते हैं, स्वर्ग तक नहीं पहुँच पाते, पितरों की दर्शन की अभिलाषा अधूरी ही रह जाती है। गोया, दीपक तले अँधेरा। हम जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं, जजमानों का कल्याण करते हैं। ये सामग्रियाँ पंडितजी को जान से प्यारी थीं।

पंडिताइन ने उनके मुख की ओर न देखा‚ वह अपनी ही धुन में थी। धर्म की पवित्रता और निष्ठा पालन उसके अंदर एक गुप्त शक्ति का संचार कर रही थी। उसका गेहुँआ रंग और खिला मुख चमकने लगा। इतनी स्फूर्त्ति और उल्लास उसने अपने अंतःमन में कभी अनुभूत न की थी। वह कभी इस कोठरी में जाती, कभी उस कोठरी में जाती, एक-एक सामान को देखती, बैग और गठरी में रखे सामानों को निकालती‚ और देखती। बेचारे पंडितजी आँगन में पड़े कराह रहे थे। अंत में हारकर बोली, "एक भी सामान अपना नहीं है, सब किसी न किसी रूप में मिली दक्षिणा की वस्तुएँ हैं। मेरे पास एक नयी साड़ी है जो आप तीज के दिन ख़रीद के लाए थे‚ उसे ही बिछाती हूँ, उसी पर लेट कर आराम करिये।” 

यह कहकर एक डब्बे से नयी साड़ी निकालकर वहीं सायबान में भूमि पर बिछायी और पंडित को सहारे से उठाकर साड़ी पर लेटाती हुई दुःखी शब्दों में बोली, "लगता है सारा काम अब अपने ही हाथों करना पड़ेगा। ठाकुरजी की मूर्ति भी बदलनी पड़ेगी, शिवलिंग भी दूसरा लेना पड़ेगा। कुत्ता उन पर लगा शहद ज़रूर चाटा होगा। इनकी जात ही ऐसी है। आपको इतनी भी जल्दी क्या थी कि आज बिना किवाड़ और ताला बन्द किये बग़ैर ही आ गये। आप लेटिये, मैं अभी हल्दी पीस के लाती हूँ। सील भी अभागा नीचे की दुकान का ख़रीदा हुआ है। पड़ोस में भी सबका यही हाल है। कोई धर्म-कर्म से नहीं रहती। आप रुकिये मैं पत्थर पर रगड़ कर लाती हूँ।” यह कह तेज़ क़दमों से वह पत्थर लेने कैमूर पहाड़ी की तरफ़ चली। पंडितजी दर्द, और उससे भी ज़्यादा पंडिताइन की बदले विचार से बेहाल आँगन में साड़ी पर लेट गये।

जब थोड़ी देर में पंडितजी का दर्द कम हुआ तो जठराग्नि सताने लगी। कोई अनुमानित समय हो तो सबर किया जा सकता है। पंडिताइन के मन से चलने पर हज़ारों रुपये का ख़र्चा आयेगा, फिर भी शाम तक भोजन मिल जाए‚ यह कहना बिल्कुल असम्भव है। मेरी मति मारी गयी थी, जो बच्चे को मार दिया और ऊँच-नीच, भेद-भाव, शुद्धि-अशुद्धि, पवित्रता, पाप-पुण्य, धर्म-कर्म का अलाप कर बैठा। उसे क्या पता‚ जिसमें हमारे मन को सुख-शांति, मान-सम्मान, इज़्ज़त-प्रतिष्ठा और धन-वैभव मिले‚ वही धर्म है। हम उसी को धर्म कहते हैं जिससे हमें निजी या जातिगत लाभ और हमारी दावेदारी समाज पर क़ायम रहे। पर पंडिताइन को यह बात कौन बताये? नारियों को इसीलिए इससे वंचित रखा गया है। यह हाशिये पर रहना जानती ही नहीं, बहुत जल्द पराकाष्ठा तक पहुँच जाया करती है। भूख बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है, लगता है पेट में भट्ठी जल रही है। पंडिताइन अभी तक आयी नहीं, आने पर ही कौन-सा अभी खाना मिल जाएगा। क्यों न थाल में रखा लड्डू खा लूँ? कुत्ते ने जिधर से खाया है‚ उधर का छोड़कर, दूसरी तरफ़ से खाने में कोई बुराई नहीं। या क्यों न उधर के लड्डुयों को हटाकर बाक़ी खा जाऊँ। कुत्ता भी तो जानवर ही है। ईश्वर का वास उसमें भी है। सभी जीवों में एक ही ईश्वर वास करता है, फिर यह भेद और घृणा क्यों? परिस्थितियों के अनुसार ठाकुरजी ने भी कई बार अपने नियमों को अनदेखा किया है। मैं तो एक छोटा-सा उनका भक्त हूँ। लड्डू खाने में ऐसी कोई बुराई नहीं है। हाँ, अब तो और भूख सहन नहीं होती। पेट में चूहे कूद रहे हैं। अनुकूल विचार हमारे मन में एक शक्ति का संचार करता है। पंडितजी यह सोचकर उठे कि लड्डू खाकर फिर आकर सो लूँगा। पंडिताइन पूछेगी तो कह दूँगा फिर वही कुत्ता आकर लड्डू चट्ट कर गया। मुझसे उठा न गया। डाँटता रहा‚ पर एक न सुना चट कर उड़ गया। उन्हें शंका ने घेरा‚ कहीं कोई पड़ोसिनें आ गयीं तो ग़ज़ब हो जाएगा। कल से गाँव का बच्चा-बच्चा चिढ़ाने को ढूँढता फिरेगा। घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा। मगर इस दोपहरी में कौन आएगा, सभी अपने घरों में सो रहे होंगे। वह चारों तरफ़ देख-ताक कर उठे और लड्डू पर जाकर टूट पड़े। 

कोई घण्टे भर बाद पंडिताइन पिसी हुई हल्दी लेकर आयी, तो देखा पंडितजी लड्डू पर टूटे पड़े हैं। यह दृश्य देख एक बार तो उन्हें अपने आँखों पर विश्वास न हुआ। किन्तु थोड़ी देर में सच मानते हुए आश्चर्य हुआ और घृणा भी, हल्दी भूमि पर रख दी और दौड़ती हुई जाकर लड्डू का थाल पंडित के हाथों से छीनती हुई बोली, "ये क्या कर रहे हैं? आप होश में तो हैं, ब्राह्मण होकर कुत्ते की जूठन खा रहे हैं। धर्म-कर्म का कुछ ख़्याल है कि नहीं?”

पंडित ने थाल को मज़बूत हाथों से पकड़कर दलील दी, "है क्यों नहीं, जिस ईश्वर ने सृष्टि‚ और सृष्टि के सारे प्राणियों की रचना की‚ वह अशुभ और नीच नहीं हो सकता। रही धर्म-कर्म की बात‚ वह मानवों का बनाया हुआ पाखंड है, कोरा ढोंग। जब वह किसी से भेद नहीं करता तो हम क्यों करें? फिर कुत्ता भैरव जी की सवारी है। जिनको संसार पूजता है।”

पंडिताइन बोली, "पवित्रता भी तो कोई वस्तु है।”

“बिल्कुल है, सच्चा मन और तन से बढ़कर कोई पवित्र नहीं, मन चंगा तो कठौती में गंगा। विदुर की पत्नी के हाथों प्रभु श्री कृष्ण ने केले के छिलके खाये थे। एक मल्लाह ने प्रभु राम की नैया पार लगायी, जो भवसागर से सबको पार लगाते हैं। यह भेद हमारे पूर्वजों का दिया हुआ चिर मानसिक, सामाजिक बीमारी है, जो अब वंशानुगत बनकर हमारे  समाज को विषमय कर रही है; धीरे-धीरे मानव समाज को निगल रही है। तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं। आज से मुहल्ले के सभी लोग यहाँ पूजा कर सकते हैं। स्त्रियाँ भी, महिने के तीसों दिन। हाँ, सही सुना महिने के तीसों दिन। जिस क्रिया, प्रकृति और रचना को स्वयं परमेश्वर ने बनाया उसके लिए दोषी ठहराने वाले हम कौन होते हैं? अब से मंदिर का दरवाज़ा कभी बंद न होगा, जो सबका रक्षक है, उसकी रक्षा हम करें; यह हास्यास्पद है। चढ़ावे और दक्षिणा पर मेरा कोई हक़ नहीं, बल्कि उन हज़ारों-लाखों ग़रीबों का है जिनके पास खाने और पहनने को कुछ नहीं है। पूजा व्यवसाय नहीं‚ अंतःमन की श्रद्धा, पवित्रता और समर्पण है, यहाँ कुछ लिया नहीं‚ दिया जाता है। सच्ची भक्ति देता है, इच्छा नहीं रखता, चाह और लालसा से परे रहता है। हम अपनी जीविका के लिए परिश्रम करेंगे, साफ़-सुथरा सुद्योग, दान और चढ़ावा देश विकास के काम आएगा। इन लड्डुओं के कारण ही मेरी आँखें खुलीं, सच्चे मन से इसे ईश्वर को अर्पित करता हूँ।”

पंडिताइन ने चिंतित मन से प्रश्न किया , "मंदिर में सबका आना कहीं कुछ अशुभ न हो जाए?”

पंडित समझाते हुए, "तुम क्या समझती हो, ईश्वर इन मंदिरों में बैठा है। वेद कहता है, वह कण-कण में है। कहीं से भी आप सच्चे मन से याद करो, वह दौड़ा आएगा। उनके दर्शन के लिए आपको कहीं दूर, किसी विशेष पूजा स्थल, धाम या आश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं। यही पाखंड हमें उनके दूर करता है, उन्हें हमारे प्रति विरक्त करता है। आपकी भक्ति, महिमा, श्रद्धा सच्ची है और मन शुद्ध है, आत्मा पवित्र है तो वो ख़ुद चलकर आयेंगे और दर्शन देंगे। ये बाहरी गंदगी, फटे, मैले कपड़े उनसे उन्हें कुछ मतलब नहीं। उन्हें केवल सच्चा मन, पूर्ण समर्पण और आत्मा के अंतःकरण से पुकार कर देखो, बेसुध खींचे चले आएँगे। बिना किसी भेद, अवस्था, स्थिति और समय की परवाह किये।”

“ये क्या कह रहे हैं आप? ऐसा है तो लोग चढ़ावा क्यों चढ़ाते? बड़े-बड़े विशाल लाखों-करोड़ों के लागत से मंदिर क्यों बनते? लोग कष्ट झेलकर सुदूर उनके धाम क्यों जाते? बड़े-बड़े साधु-महन्तों, बाबाओं के आश्रम में लोग क्यों जाते? मिश्राजी के पतोहू को लड़का नहीं हो रहा था, पाँच-छः बार गिरधारी बाबा के आश्रम में गयी। उनके दर्शन किये, आज दो लड़के की माँ है। तिवारी जी का रोग असाध्य था। चारों धाम दर्शन कर आये अपने आप ठीक हो गया, इसपर डॅाक्टरों को भी आश्चर्य है। द्विवेदी जी के लड़के की नौकरी नहीं लग रही थी। सिरडी में जाकर चढ़ावा चढ़ा आये, दूसरे महीने नौकरी लग गयी। दूसरी तरफ़ पाठक जी को देखिये, मन्नत पूरा होने के बाद भी पाँच सालों से टाल-मटोल करते आ रहे थे। वैष्णों धाम में चाँदी का मुकुट चढ़ाना था। लड़का नौकरी से लाखों कमा लिया, किन्तु लाख-दो लाख का मुकुट नहीं चढ़ा पायें। पिछले महीने घूस लेते पकड़ा गया। नौकरी गयी अलग, ज़ुर्माना बीस लाख भरना है। खेत बेचने की तैयारी हो रही है। चतुर्वेदी जी ने अपने घर के आगे मंदिर बना दिया। आज देखो कितना फल-फूल रहे हैं। ज़मीन ख़रीद लिये, गाड़ी भी इसी महीने लिये हैं।”

पंडित जी चिढ़कर बोले, "मंदिर सरकारी ज़मीन में बना है। ज़मीन नापी हो रही थी। सड़क बनने वाला था। अपने घर के आगे वाली ज़मीन बचाने के लिए यह उपाय है। मंदिर हटाना किसी के बस की बात रही नहीं, उसके आसपास वाली ज़मीन का भोग वह करेगा।"

“आपकी सूझ दुनिया से निराली है। शुक्ला जी अक्सर ईश्वर की भर्त्सना करते रहते थे। दो महीना हुआ, उनका जवान लड़का उठ गया।”

पंडित जी ने मन में सोचा, इसलिए भगवान बुद्ध साधारण जन को अव्याकृत प्रश्नों का उत्तर नहीं दिये। वे जानते थे, लोग इसे समझ न पायेंगे, कोई-न-कोई नुक़्स निकालकर उलझे रहेंगे और मुक्ति तक पहुँचने के प्रयास से वंचित रह जाएँगे।

छोटा बच्चा माँ के पीछे से छुपकर लड्डुओं को ललचाई आँखों से देख रहा था। पंडितजी पुत्र-प्रेम से स्नेहिल होकर बोले, "आओ बेटा लड्डू खा लो और ले जाकर ग़रीबों में बाँट दो।”

पंडिताइन अचरज और हैरतज़दा नज़रों से पंडित को देख रही थी। उसे अपने आँखों और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। आज सूर्य पश्चिम से कैसे उदित हो गया!

पंडितजी अब भी रोज़ भोग लगाते हैं; किन्तु भगवान को नहीं चढ़ाते ग़रीब, अनाथ, अपाहिज, असमर्थों, दीन-दुखियों में बाँट देते हैं। ईश्वर के लिए दयामयी, निष्कपट आत्मा मन और स्वस्थ परिश्रमयुक्त तन समर्पित करते हैं। जिसका दिया सारा जहान है और सृष्टि की सारी वस्तुएँ हैं। उसे हम भोग, चढ़ावा और मन्नतें भला क्या चढ़ायेंगे? हृदय के थाल में श्रद्धा के पुष्प और सच्चे मन के भोग तथा पूर्वतः आत्म समर्पण के चढ़ावे से मूल्यवान कोई नैवेद्य नहीं। उन सबको एक कर दें तो दीन सेवा ही ईश्वर भक्ति है

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