15-04-2019

मज़हबी इमारतें
रात के सन्नाटे में मशग़ूल!
अजीब बहस...
इंसानियत बग़ैर इंसान 
हैरान रह गया सुनकर 
इंसानियत की टोकरी 
जो मेरे सिर पर थी - देखा तो
इंसानों के जगह हैवान दिखे 
पहली दफ़ा…
इंसानियत से दूर अलग दहलीज़॥

 

इमारतों के फटकार से 
रूह की दुत्कार से 
शर्मिंदा लेकिन ज़िंदा 
दबे पाँव भागना चाहा पर 
ख़ुदा को कहाँ पसंद 
इमारत की ईंट से टकराया
हँसी के ठहाके का अहसास
देखा तो रूह 
पहली दफ़ा…
मेरी तौहीन रूह के हँसने का सबब॥

 

बेशर्मी का आलम देखिये 
झूठी तस्सली देकर
मय्यत निकाली ज़मीर की
फ़ख़्र के साथ...
रूह से ऐसे अलग हुआ
मानो तलाक़ की अर्ज़ी क़बूल हुई
ऐसा ख़ुशमिज़ाज था मानो
परवरदिगार ने सारी 
ख़ता बख़्श दी हो 
पहली दफ़ा…
अपनी मय्यत का जनाज़ा पढ़ रहा था॥ 

15 Comments

  • 19 Apr, 2019 08:10 AM

    Niceee

  • 18 Apr, 2019 07:14 PM

    Superb

  • 18 Apr, 2019 05:05 PM

    Waah bhai waah!!

  • 18 Apr, 2019 04:56 AM

    Very nice

  • 18 Apr, 2019 03:17 AM

    Adbhut, sarahneey kary

  • 18 Apr, 2019 02:10 AM

    Nice kavi ji

  • 17 Apr, 2019 06:56 PM

    Hairaan reh gaya sunkar

  • 17 Apr, 2019 04:27 PM

    Marmik rachna

  • 17 Apr, 2019 04:20 PM

    Good!!!

  • 17 Apr, 2019 02:51 PM

    Ohh woww wt a growth man..

  • 17 Apr, 2019 08:54 AM

    Very nice

  • 17 Apr, 2019 06:57 AM

    Very elegantly written. Loved it.. !!!!

  • 17 Apr, 2019 05:07 AM

    Kabile tareef

  • 17 Apr, 2019 03:03 AM

    Nice one sir

  • 16 Apr, 2019 07:14 PM

    Wonderful bhai..... Continue writing we need more poems like this.

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