ओ नानका, तूने ठीकरी नूं सुवर्ण कर दियासी

15-05-2020

ओ नानका, तूने ठीकरी नूं सुवर्ण कर दियासी

डॉ. संदीप अवस्थी

(एक मिस्ट्री लेखक की आत्मकथा के साथ सत्तर वर्षों की देश यात्रा)

पुस्तक : हम नहीं चंगे बुरा न कोय (आत्मकथा) 
मूल्य : 299 रुपए पेपरबैक
लेखक : सुरेन्द्र मोहन पाठक। 
संस्करण : 2019
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

आज की तारीख़ में कहा जाए कि लेखन से पैसे कमाएँ (फ़िल्मों के अलावा) तो यह कुछ मुश्किल लगता है। जब हिंदी साहित्य के दिग्गजों की रॉयल्टी और प्रकाशकों से दुख भरे अनुभव आप सुनते हैं तो बात और पुख़्ता होती है। जवाब आता है पढ़ने वाले ही नहीं है। लाइब्रेरी में ही किताबें जा रहीं हैं।

ऐसे में यदि कोई लोकप्रिय लेखक प्रति किताब (उपन्यास) न्यूनतम दस लाख ले रहा हो तो? और वह किताबें हाथों-हाथ बिक रही हों, टॉप सेलर बन रही हों? उसके रीप्रिंट की माँग चारों ओर से आ रही हो और लेखक की मुहमाँगी राशि पर प्रकाशक छापने को तैयार बैठे हों। ऐसे करिश्माई लेखन और लेखक के बारे में हालाँकि लोक और आधा देश तो जानता है परन्तु हर रुचि रखने वाले लेखक और पाठक को भी जानना चाहिए। देश के अनेक जाने-माने लेखक श्रीलाल शुक्ल (जिन्होंने आदमी का ज़हर, जासूसी उपन्यास लिखा), मनोहर श्याम जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी, संजीव आदि हो या प्रभात रंजन, सारा राय, आशुतोष, प्रियदर्शन, (नाचीज़ भी) ने उनके उपन्यासों को पढ़ा, सराहा और ...अपना लेखन माँझा और बस चुप लगाकर अधिकांश बैठ गए।

दरअसल सब-आल्टर्न जगत, (ग्राम्य, चिंतक, शक्ति से वंचित वर्ग, लोक) वह जो देश का अस्सी फ़ीसदी हिस्सा है, को लेकर, उनकी चिंताओं को लेकर तो “दूब”, “काला पहाड़”, “इदन्नम”, “नाच्यो बहुत गोपाल” आदि लिखे गए, सराहे भी गए। लेकिन उसके लिए मनोरंजन, जो सहज सुलभ हो सके, वह आनंद उसे मिले रोमांच के साथ, उसे मुश्किलों से कुछ देर के लिए ही सही, घर बैठे उस दुनिया में ले जाए, जो वह रोज़ देखता, अख़बारों में पढ़ता तो है परन्तु उसमें आवाजाही नहीं कर सकता। किताबों की ऐसी सहज, सुलभ उपलब्धता से यात्रा लोक के साथ हुई। और क्या ख़ूब हुई कि लोग नए उपन्यास का इंतज़ार करते और हाथों-हाथ ले जाते।

न ज़्यादा जेब पर बोझ पड़ता और न दूर जाना। गली, मोहल्ले के क़रीब ही आपने भी किताबों, पत्रिकाओं की दुकानें देखी होंगी। जहाँ एक रुपए से लेकर बस कुछ ही वर्ष पूर्व तक दस रुपए में प्रतिदिन किताब किराए पर भी मिलती। उसे पढ़कर आराम से वापस जमा करें अगले दिन। (काश यह दौर फिर आए और अच्छी किताबें और पत्रिकाएँ ख़ूब पढ़ी जाएँ, बार-बार)। तो ऐसे गुणी, कठिन साधक और गुरु भक्त लेखक की आत्मकथा त्रयी का दूसरा भाग है "हम नहीं चंगे बुरा न कोय"। पहला भाग 2018 में आया "न बैरी न बेगाना" हार्पर कॉलिंस से और वह भी बहुत सराहा गया। तीसरा भाग इस वर्ष जून तक आ जाएगा।

सरल नहीं लेखन में जगह बनाना और टिकना

यह सच्चाई है कि लोकप्रिय साहित्य (लुगदी साहित्य के ज़माने गए) में जब तक आपकी पकड़ रीडर्स की नब्ज़ पर, भाषा पर नियंत्रण और रोचकता के साथ यथार्थ का पुट नहीं होगा आप लंबी पारी नहीं खेल सकते। सुरेंद्र मोहन पाठक, सत्तर से अधिक वर्षों से लिख रहे, भारत के ही नहीं विश्व के भी गिने-चुने लेखको में हैं जिन्होंने इतनी लंबी सफल पारी खेली और अभी भी खेल रहे हैं… अभी भी उन्हें कई और दशकों तक खेलना अच्छा लगेगा।

"आत्मकथा मैं नहीं लिख सकता; क्योंकि इतना झूठ एक साथ!! नहीं नहीं, कभी नहीं" (चर्चिल)। हालाँकि बाद में आई इनकी आत्मकथा। यह ऐसा ही है कोई अपनी ज़िंदगी को धो-पोंछ, कलफ़ लगाकर सामने पेश कर दे– यह मेरा सर्वश्रेष्ठ है। मुझे लगता है, (और यक़ीनन) आत्मकथा के दोनों सिरों पर बैठे लोग एक दूसरे को जमकर बेवकूफ़ बना रहे होते हैं। "हम नहीं चंगे बुरा न कोय" को राजकमल प्रकाशन ने, इस 422 पृष्ठों की गाथा को बेहतरीन ढंग से प्रकाशित किया है। इसमें अनेक श्वेत श्याम चित्र हैं।

इस आत्मकथा की सबसे बड़ी विशेषता है काल और समय के साथ पाठकों को बाँधकर रखना। आज़ादी के बाद से अब तक (2018) के हिंदुस्तान की बड़ी डिटेलिंग के साथ यात्रा करवाना। ऐसी यात्रा जहाँ आप साक्षी ही नहीं होते बल्कि उस समय में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे होते हैं। फिर चाहे दोस्तों के साथ दिन भर नौकरी करने के बाद फ़्लैट की बालकनी में घूँट लगाने के दृश्य हों या दिल्ली से मेरठ जाना और रात वहीं अपने उस्ताद ओमप्रकाश शर्मा (बड़े लेखक) के घर घूँट लगाना, रुकना और सुबह वहीं से सीधे ऑफ़िस आना।

सब कुछ इस आत्मकथा में सुरेंद्र मोहन पाठक ने जीवंत कर दिया है। आईटीआई (इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री) की नौकरी, दोस्तों के घात प्रतिघात, कॉलेज, जगजीत सिंह, एक्सीडेंट, परिवार की ज़िम्मेदारी, रिश्तेदारों की चालाकियाँ, ठेठ पुराने आदमी-सी ससुराल और झाई जी (सास) से शिकायतें, सालों, साढ़ूओं की हेराफेरी आदि। हिंदी पॉकेट बुक प्रकाशकों की गहन पड़ताल, पाठकों के अलग-अलग रंग।

इन सबके बीच से ही उभरता है एकदम नए, अनूठे रंग का ’बाबे की मेहर’ का आकांक्षी, हर क़दम परअसफलता देखता है पर हार नहीं मानता, और अपने सभी मानवीय अवगुणों (क्या कोई है जिसमे अवगुण न हों?) के साथ हमारे सामने आते हैं पाठक जी। साठ साल से (दस साल संघर्ष के) हिंदुस्तान ही नहीं विश्व भर के लाखों-लाख हिंदी पाठकों के लोकप्रिय मिस्ट्री लेखक।

यही लगता है, यह तो हमारे-आपके घर में रह रहे, नौकरी करते सामान्य बड़ों जैसे ही हैं।

लेकिन जब किताबें- असफल अभियान, खाली वार, बखिया चौकड़ी, पैंसठ लाख की डकैती, कोलाबा कॉन्सेप्रेंसी, हीरा फेरी आदि 300 से अधिक उपन्यासों और उनकी सफलता रिप्रिंट्स के आँकड़ों को देखते हैं तो ताज्जुब होता है। इतना बड़ा, जन-जन में लोकप्रिय और सफल लेखक इतनी सहजता से चुपचाप, बिना प्रोपेगैंडा के अपना लेखन, फ़ुल टाइम नौकरी (जी, वह 1998 में चौंतीस वर्ष की सेवा कर ग्रेड 2 अफ़सर पद से सेवानिवृत हुए पेंशन भोगी हैं) और परिवार को सँभालते हुए कैसे कर गए? पर किया, और ख़ूब किया, हर जगह सफलतापूर्वक ज़िम्मेदारी निभाई।

ख़ुदी को विखंडित करता बेलिहाज़ आत्मकथ्य

अक्सर लोग अपना गुणगान करते हैं आत्मकथा में। लगता है जैसे देवताओं की पंक्ति में ही आ गए हैं वह। परन्तु अपने आप को दूध से उजला सिद्ध करने में हास्यास्पद लगते हैं। लगता है कोई झूठ का पुलिंदा धर दिया हो। क्या चुनना है और क्या छोड़ना है यह कई -ई बार तय होता है, मिटाया जाता है। और फिर जो सामने आता है वह आत्मकथा तो दूर-दूर तक नहीं होती। वह लगती है ऐसी बेढब कोशिश कि जितने अपने गुनाह छुपाते हैं उतने ही वह सामने आते हैं। इसलिए समझदार लोग जब किसी चर्चित हस्ती की छुपाने वाली क़िस्म की आत्मकथा पढ़ते हैं, तो उसका उल्टा तर्जुमा करते चलते हैं। जैसे "मैंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। कभी झूठ नहीं बोला। पराई नार की तरफ़ तो निगाह डाली ही नहीं" आदि आदि। किसी चर्चित दिल्ली के लेखक की आत्मकथा में लोग पढ़ें तो इस झूठ को समझ ज़ोर से हँसेंगे।

लेकिन इसी जगह "हम नहीं चंगे बुरा न कोय" सबसे अलग और विशिष्ट बन जाती है। सब-आल्टर्न संसार की कथा कहती, निम्न मध्यम वर्ग से लेखक की यात्रा प्रारम्भ (1957) होती है और वह आज 2020 तक जारी है। 

मैंने यह रोचक आख्यान पढ़ना प्रारम्भ किया तो एक चतुर, धीर, परफ़ैक्ट, सर्वगुणसम्पन्न और बिना ग़लती किए सही दिशा और मंज़िल को पाने वाले इंसान की छवि थी। पर पढ़ते हुए कई भ्रम टूटे। देरिदा का विखंडनवाद कई बार आँखों के आगे से गुज़रा। जिस भाग में जो छवि बनती दिखी अगले चंद पृष्टों में वह खंडित। एक बारगी यह भी लगा कि यह ख़ुद से कोई दुश्मनी निकालने की नई तकनीक तो नहीं। पर जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते जाएँगे तो साफ़-साफ़ दिखेगा, आपके हमारे जैसा ही एक आम इंसान जो सच में कुछ नहीं जानता था। न उपन्यास लेखन, न ज़िंदगी, न रिश्तों का और न सामाजिक आचार व्यवहार और न ही व्यवसायिक जगत के बारे में। बस ट्रायल एंड एरर के माध्यम से ज़िंदगी जैसी सामने आई जीता चला गया। अपनी लगन, अथक मेहनत और समझदारी से ग़लतियों से सीखने की आदत ने उसे रहस्य और रोमांच का बादशाह बना दिया। ऐसा बादशाह जो जनता जनार्दन का सेवक है, उनकी ही ख़ुशी और पराक्रम को आज भी नमन करता है।

पहले कमियों के कुछ उद्धरण। हालाँकि ज़्यादा हैं परन्तु हम एक मिस्ट्री राइटर (रहस्य रोमांच लेखक परिचय काफ़ी पुराना खत्री जी और गहमरी जी के काल का लगता है), के जीवन को देख रहे हैं, न कि किसी हिप्पोक्रेट लेखक को जो करता सब है परन्तु बताता नहीं।

सबसे पहला ज़िक्र इस बात का कि बादा-नोशी (शराब पीना) की इतनी क़िस्में, इतने प्रकार हैं कि मानो इसके बिना तो लेखन करना गाली के समान है। हर जगह, हर आयु, वय और हर समय पूरी आत्मकथा में इसका ज़िक्र है। कभी ख़ुशी हुई, पहली किताब छपी तो पी, उस्ताद (ओमप्रकाश शर्मा, जनप्रिय लेखक) की शागिर्दी में तो हर बार, हफ़्ते में चार बार उनसे मिले, और बाद में हफ़्ते में तीन बार गए तो बराबर मय पी। जालंधर में विद्यार्थी जीवन में पीने के लिए शहर तक गए, साईकल पर (1953-54), शादी, सगाई, प्रकाशकों से मुलाक़ातें हो, सीनियर्स के साथ उठना-बैठना (वेदप्रकाश कम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा, साधना प्रतापी आदि), कुलीग या दिल्ली प्रेस क्लब, हरियाणा बॉर्डर, अंसारी रोड स्थित लेखक का दफ़्तर (वहीं राजकमल प्रकाशन भी है कई दशकों से), उप-दफ़्तर कनॉट प्लेस सहित दिल्ली के अनेक नामालूम ठिये, जूस की दुकानें, कोई ऐसी जगह नहीं बची जहाँ रब न हो!! पर अच्छी बात रही कि दोस्तों का साथ हमेशा रहा, कभी अकेली नहीं पी। कोई मर्यादा न तोड़ी, कोई ग़लती भी छोटी-मोटी हुई तो दोस्तों ने सँभाल ली।

इसके बाद अगली बारी आती है मेरा मिज़ाज लड़कपन से आशिक़ाना टाईप का है। वस्तुतः इसे 'सबकुछ' में ही शुमार किया जाना चाहिए। यहाँ ईमानदारी है बताने की पर वह असफल अभियानों तक ही महदूद है। चाहे वह किशोरावस्था में देर रात घरों में चलने वाली महिला संगीत के दौरान मिला अवसर हो, नौकरी टूर पर शहर से दूर फ़ैक्ट्री की टेलीफोन ऑपरेटर हो, दरियागंज में मिली अकेली सहमत लड़की हो जिसे सधन्यवाद वापस हॉस्टल भेज दिया।

तो जब लोकप्रियता के पहले इतने असफल क़िस्से रहे तो समझ सकते हैं कि सफल, झंडे गाड़ने वाले तो अनगिनत होंगे। इसीलिए उनके ज़िक्र से पाठक जी बचे। हालाँकि यह बेबाकी और ख़ूबसूरती क्लासिक अंदाज़ में तुलसीराम जी की आत्मकथा (मुर्दहिया, मनिकर्णिका दो भाग) में पढ़ी और सराही गई। जिसमें दिवंगत तुलसीराम जी ने अपनी ज़िंदगी में अलग-अलग समय आई तीन लड़कियों का उल्लेख किया और तीनों सम्पन्न, दबंग परिवारों से। वंचित वर्ग के युवा तुलसीराम को प्रेम उपहार देना चाहती हैं। बच्चन की आत्मकथा के चारों भाग में भी प्रेम को शिद्दत से जीने और याद करने की बेबाकी है। मिथिलेश्वर (थोड़े आत्ममुग्ध हैं क्योंकि बहुत परिश्रम से हर कर्तव्य निभाते चाल-फ़रेबों से जूझते यह प्रोफ़ेसरी और बड़े सम्मान इफको वाला हाल ही मिला) भी अंशतः ज़िक्र करते हैं पर सतही अंदाज़ में।

कह सकते हैं उस कालखंड में महिला पुरुष का प्रेम करना या पाना तो सुलभ था परन्तु उसे आत्मकथा का भाग बनाना थोड़ा मुश्किल। न जाने किसे और क्यों जवाबदेह होता है आत्मकथा में? राजेन्द्र यादव जैसी बुद्धिमता, बेबाकी और अध्ययन से मिली मेधा ही ऐसा कर पाई है। मैत्रयी पुष्पा (पिंजरे की मैना, कस्तूरी कुंडल बसे), प्रभा खेतान (अन्या से अनन्या तक) ऐसा सफलतापूर्वक कर पाएँ हैं। शरणकुमार लिम्बाले भी अक्करमाशी के लोमहर्षक यथार्थ, जिसमें पशुओं के मल को सुखाकर कुछ दिन बाद उसमें से अन्न के दाने बीनकर धोकर पकाकर खाना प्रमुख है, में अपने दो प्रेम प्रसंगों का उल्लेख बीस वर्ष पूर्व कर देते हैं। कमलादास भी साहस के साथ अपने से दशकों छोटे युवा कवि से प्रेम कुबूलती हैं। बंगला से कम उद्धरण हैं पर फिर भी टैगोर, सुनील गंगोपाध्याय, महाश्वेता देवी हैं।

पता नहीं हर युग में प्यार को ढका-छुपा क्यों रखा जाता है? और नफ़रत, घृणा, बदसलूकी आदि को ख़ूब बताया जाता है। होना इसका विपरीत चाहिए जो अब 21वीं सदी के दूसरे दशक में कुछ लेखक साहस से, नाम बदलकर लिख रहे हैं। लखनऊ के तो एक सबसे आगे, वह साठ वर्ष के ऊपर, सफल असफल प्रेम (?) करते और अपनी सच्ची दोस्तों की व्यथा (प्रेमिकाओं, शब्द उचित नहीं) पर ही बेशर्मी से कहानी और उपन्यास लिख डालते हैं। मुंडे मुंडे मति भिन्ना। पर यहाँ लेखक ने समझदारी दिखाई और सफल प्रसंगों का चित्रण नहीं किया। इसके अलावा कुछ का ज़िक्र आगे।

अथातो भारतीय कार्यालय कथा

इस खंड में एक बड़ा हिस्सा इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री, भारत सरकार के अनुभवों का है। जहाँ लेखक ने 38 साल नियम से नौ से छह बजे तक कि नौकरी बजाई। और तकनीकी कर्मचारी से भर्ती हुआ क्लास टू अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुआ। लगभग आधे से अधिक पृष्ठ इसी के चारों और चलते हैं। जो सीमित किए जा सकते थे। सरकारी कार्यालयों जैसा हाल। वही 1 दिन का टूर आठ दिन का दिखाना, दफ़्तर की राजनीति आदि के मध्य यह बात बार-बार उभरकर सामने आती है कि लेखक (यहाँ कोई विभेद मैं नहीं मानता, सफल और असफल पर आलोचकों की निगाह में चढ़े हुए में) यदि कोई नौकरी करता है तो उसके विभाग और सहयोगियों द्वारा कोई उसे ख़ास दर्जा नहीं दिया जाता बल्कि उसे बेवकूफ़ बनाया और उसका शोषण ज़रूर किया जाता है। साथ ही कोई उच्चाधिकारी यदि यह कह दे कि "पूरे विभाग से अधिक हिंदी की सेवा तो पाठक जी कर रहे हैं। इन्हें कौन नहीं जानता।" (आत्मकथा, पृष्ठ 256) तो मुख्य अतिथि के जाने के बाद उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है कि “तुम नॉवल लिखते हो, नौकरी कब करते हो?" इसका जवाब जो आख़िर में लेखक ने दिया वह यादगारी है। पढ़ें उन्हीं के शब्दों में, "9:00 से 6:00 मैं दफ़्तर का काम करने वाला, आप मुझसे पूछें मैं लिखता कब हूँ? जब आप घर में फ़ैमिली के साथ बढ़िया टाइम पास कर रहे होते हैं मैं तब लिख रहा होता हूँ। जब आप घर में बच्चों के भविष्य डिसकस कर रहे होते हैं तब मैं लिख रहा होता हूँ। जब आप परिवार के साथ वेकेशन पर जा रहे होते हैं तब मैं लिख रहा होता हूँ। और जब आप रिलैक्स कर रहे होते हैं मैं तब भी अपने घर पर लिख रहा होता हूँ। मुझे मालूम ही नहीं रिलैक्स कैसे किया जाता है। इसलिए मैं काम करता हूँ और लगातार काम करता हूँ मेरे दफ़्तर में मेरी सीट पर कोई भी काम पेंडिंग नहीं होता। और आप किसी भी अन्य सीट पर पूछिए, ढेरों काम पेंडिंग पड़ा है इसमें एनी प्रॉब्लम इन दैट सर?"

ऐसे ही कुछ और यादगार प्रसंग हैं जब मोहन राकेश और कमलेश्वर दिल्ली के अस्पताल में ओमप्रकाश शर्मा का हालचाल पूछने आए। लोकप्रिय लोक के लेखकों ने ख़ुद ओमप्रकाश शर्मा को नहीं पहचाना। ऐसे ही दिलचस्प क़िस्सा बोलने की आज़ादी और समानता के पक्षधर वाम नेता श्रीपद अमृत डांगे (153 पृष्ठ) का है। जो पार्टी दफ़्तर में पीबीएक्स लगवाना चाहते हैं आठ लाइनों वाला, पर कंट्रोल अपने ऑफ़िस में अपने हाथ में। जिससे सबकी बातें सुन सकें।

आत्मकथा के माध्यम से दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, यूपी, मध्यप्रदेश लगभग सारे हिंदी भाषी प्रदेशों की यात्रा हुई। वहाँ के गली कूचों का इतना बारीक़ विवरण और लोक भाषा, लोगों का चित्रण मानो हम आज भी बैठे उन लोगों और उस समय को देख रहे हों।

घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध

ईमानदारी और लेखक की पाठकों के प्रति निष्ठा का यह उच्चतम स्तर है कि घर के दूर-दराज़ के ताई, ताए, मामे से लेकर बहनों बहनोई तक को नहीं छोड़ा गया। सबके किए "सद्व्यवहार" को बाक़ायदा याद करके सप्रेम लिखा गया है। पढ़कर आनंद भी आता है। क्योंकि यह हर हिंदुस्तानी के घर में होने वाली कहानी है। चाहे ऐसा साढ़ू भाई हो जो बड़ी कम्पनी में काम करता हो पर हो महा कंजूस की ख़ुद के शहर में भी लेखक को अकेला छोड़ निकल गया। चाहे ससुराल की गहमा-गहमी से हर बार उकताए बाराटूटी जाने से हुज्जत हो। पहली कार, नई नकोर मारुति वैन प्रकाशक गुप्ता बंधुओं से गिफ़्ट मिलने का प्रसंग हो। (जी हाँ, हिंदी जगत के लेखक को नई-नकोर गाड़ी गिफ़्ट वह भी आज से तीस साल पहले मिलने का यह इकलौता उदाहरण है) बाद में स्वाभिमानी लेखक ने पहले माह ही अपने खाते और कुछ उधार लेकर क़ीमत चुका दी।

पिता की सख़्ती और भय को लेखक ने इस ख़ूबी से लिखा है कि हम सभी को अपने पिता की सख़्ती और हमारे भले के लिए लगाई डाँट फटकार याद आ जाती है। बेटी का भी दिलचस्प ढंग से ज़िक्र है।

क्योकि घर और नातेदारों ने ज़रा भी लेखक का रुत्बा या रौब माना न चढ़ने दिया। उससे वह सारे कार्य करवाए जो हम सब करते हैं। सदर बाज़ार से सामान, रिश्तेदारों की शादी में पंजाब में हाज़री। बहन बहनोई के रुत्बे, मान-सम्मान सब कुछ करते हुए भी लेखक निस्संदेह बहुत बड़े और नफ़ीस निकले। ऐसे जिससे आप असहमत नहीं हो सकते।

ऐसे ही नहीं बनता कोई हर दिल अज़ीज़

आज दस लाख से ऊपर लेने वाले और बड़े-बड़े प्रकाशन हाउसेस के चहेते लेखक पाठक जी की पहली कमाई मात्र तीस रुपए थी। वर्ष था 1959। पहला उपन्यास 1963 में एक पत्रिका नीलम जासूस में। मिले सौ रुपए ।पत्रिकाओ में आते रहे फिर सत्तर के दशक में एक उपन्यास छपा ओमप्रकाश शर्मा के सौजन्य से। फिर सूखा कुछ सालों का। और उस वक़्त की फ़ीस मात्र 200 रुपए।और कवर भी बनाए ख़ुद लेखक तो तीस रुपए उसके। यह सारे पापड़ बेलते टेलीफोन महकमे में बकौल ख़ुद चपरासी से ज़रा ऊँची क्लर्क जैसी नौकरी। नौकरी करने से पहले से निरन्तर उभरते जासूसी कथाकार वेदप्रकाश कम्बोज के साथ ओमप्रकाश शर्मा जैसे स्टार लेखक से मुलाक़ात और बराबर हुक्का भर शागिर्द जैसा समर्पण। उनकी मौत तक बराबर चला। उस वक़्त गुलशन नंदा जहाँ एक नॉवेल के बीस हज़ार लेते थे, शर्मा जी दो हज़ार और पाठक को दो सौ दिलवा देते थे। बराबर बिना नागा दोनों गुरुओं का हुक्म बजाने यहाँ तक कि शर्मा जी के बच्चे को मैथ्स पढ़ाने तक का कार्य किया निष्ठा के साथ। (और सौदा सुल्फ़ आदि भी) यह सब पढ़ते हुए लेखक के धैर्य की तारीफ़ करूँगा की यह सिलसिला लगभग पच्चीस बरस चला निरन्तर। फिर कम हुआ व्यस्तता के चलते और गुरुओं के अपने कारणों से। अभी प्रभात का मनोहर श्याम जोशी पर लिखा गद्य याद आ रहा है। थोड़ा धैर्य, थोड़ी चतुराई और वह भी जोशी जी जैसे दिग्गज की शागिर्दी में। ठीक वहीं तक पहुँचे जहाँ उस्ताद जोशी जी पहुँचाना चाहते थे। शिष्य ने याद भी ख़ूब किया गुरु जोशी जी को। परन्तु यह ख़ूबी पाठक जी में है कि जिसे दोस्त माना, गुरु माना उसकी बात हमेशा रखी और निभाई।

हालाँकि यह अर्जुन द्रोणाचार्य वाली जोड़ी न थी बल्कि एकलव्य वाली थी। कोई ग़लतफ़हमी न रखे कि गुरुओं ने यह पढ़ो, वह पढ़ो, ऐसा लिखकर दिखाओ यह सब नहीं किया। परन्तु शर्मा जी, अतिव्यस्त जनप्रिय लेखक (हर माह एक के हिसाब से वर्ष के 12 उपन्यास) ने ज़रूर युवा पाठक की प्रारंभिक स्क्रिप्ट्स पढ़ीं और सुधारीं।

यह वही वक़्त था जब परिमल वालों का इलाहाबाद में विवाद हुआ। नई कहानी की तिकड़ी राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश जलाल पर आए ही आए थे। धर्मयुग भारती के साथ नई उड़ान पर था।

उस वक़्त सत्तर के दशक से लगभग चालीस वर्षों तक पढ़ने और किताबों, लेखकों का ऐसा जलवा था कि साप्ताहिक पत्रिकाएँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान लाखों की प्रसार संख्या में छपतीं और सब बिक जातीं। हर सदस्य के लिए उसमें कुछ पठनीय होता। आज ज़रा सोचिए सात दिन में प्रकाशन, डिस्पैच, अगले अंक की तैयारी तो सिर चकरा जाए। और याद रखें उस वक़्त आज जैसी कम्प्यूटर युक्त अत्याधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं। उपन्यास हर महीने सेट में आते थे। हिंदुस्तान पढ़ने वाला, विचारशील और मनन करने वाला बन रहा था। उस दौर के यह लेखक आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में भी सफलतापूर्वक सक्रिय हैं।

वह भी अपनी शर्तों पर, बिना गॉडफ़ादर के सिर्फ़ और सिर्फ़ बाबे की महर, माता रानी का असीस है। उतना ही स्वयं का अनुशासन, आत्मसंयम, मेहनत और त्याग है। तब जाकर मिलता है हिंदुस्तान को एक बेजोड़ लेखक। पंक्तियाँ याद आती हैं मुझे, "तेज धार का कर्मठ पानी/ चट्टानों के ऊपर चढ़कर/ मार रहा है घूँसे कसकर /तोड़ रहा है तट चट्टानी" (केदारनाथ अग्रवाल)

यह अब दस्तक नहीं सच्चाई है कि जिसे मुख्य धारा से अलग माना गया वह मनोरंजक साहित्य लोक को बहुत पसन्द आया। उसने सर आँखों पर लिया और लेखक ने भी समझदारी और संतुलित लिखा।

कुछ गिले शिकवे, कुछ आलोचना

इनके पात्र चाहे वह सुनील, खोजी पत्रकार हो या विमल सीरीज़ जिसने टाइम पत्रिका तक लोक के लेखक को पहुँचाया। लोकप्रियता का यह हाल रहा है कि सन 1985 में पाठक जी के 6 नए उपन्यास और 31 जी हाँ पूरे 31 रिप्रिंट्स यानी कुल 37 किताबें आईं। लगभग 20 प्रकाशकों से। यह सिलसिला 1982 से 2005 तक ख़ूब चला और औसतन पाँच नए उपन्यास और 20 रिप्रिंट्स बराबर आते रहे (हम नहीं चंगे बुरा न कोय, पृष्ठ104)। लगभग चालीस से पचास हज़ार प्रतियों के साथ। यह याद रखें कि यह बिक्री और लोकप्रिय होने पर ही सम्भव होता है। वरना आज तक यह है कि बड़े नाम वाले लेखकों की किताब का पहला संस्करण 500 प्रतियों का ही तीन साल में ख़त्म नहीं होता। यह लोकप्रियता 60 वर्षो की कमाई पूँजी है।

उधर किरदार कोई भी हो। बहुत ही प्रैक्टिकल और नो नॉनसेंस सुधीर कोहली हो कोई भी गन या चाकू लेकर नहीं घूमता। सब हमारे आपके जैसे हैं। वह गलतियाँ भी करते हैं, उनके भी चोट लगती है। नया किरदार जीतसिंह हो, जो दुबला पतला और लोक का हिस्सा है। जो जितना मुसीबतों, अपराध से दूर भागता है उतना ही हालात उसे अपराध में धकेलते हैं। (अंडरडॉग) किरदारों से रोचक भाषा और चुटीले संवाद से 250 से 350 पेज में ऐसी रोमांचक दुनिया रचने वाले पाठक जी को दो शिकायते हैं। एक मुख्य धारा में पहले लोकप्रिय लेखकों को साहित्यकारों की परिधि से बाहर रखा। चाहे प्रेमचंद से भी 30 साल पहले 55 उपन्यास लिख चुके गोपालराम गहमरी हो (1889 -1920 लेखकीय समय) या खत्री जी, लाखों लेने वाले गुलशन नंदा आदि इन्हें नहीं माना तो नहीं माना। हालाँकि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जैसे बड़े आलोचक गहमरी, खत्री बाबू को हिंदी साहित्य में जगह दिए। गहमरी जी पर साहित्य अकादमी मोनोग्राफ 2017 भी आया है। हालाँकि इन्होंने परवाह भी नहीं की। लेकिन जन-जन में हिंदी भाषा और किताबों के प्रति ऐसी उत्सुकता और लगाव जगाना दुर्लभ है। प्रेमचंद यह जादू जगाए बीसवीं सदी में और अब 21वीं सदी में हिंदी में यह जादू पाठक जी ने जगाया है। और साथ विभिन्न किरदारों आचार्य शास्त्री जी - विमल संवाद, कई पात्रों की मानवीय और जीवन के प्रति फिलॉसॉफी इन्हें निस्संदेह एक क्लासिक लेखक का दर्जा दिलाती है। साहित्य अकादमी सुरेंद्र मोहन पाठक पर भी मोनोग्राफ निकाले (उसे मुझे लिखकर ख़ुशी होगी)। हार्पर कॉलिन्स, हिन्द, वेस्टलैंड बुक, राजकमल सभी टॉप के प्रकाशक सगर्व इनके जासूसी उपन्यासों को सगर्व छाप रहे हैं। कई बार विमल सीरीज़ के लोकप्रिय पाँच-पाँच उपन्यासों का बॉक्स सेट भी वेस्टलैंड से आया है। तो यह शिकायतें दूर हुईं। क्लासिक दर्जा, लाखों रुपए एक किताब के और पाठकों का बेशुमार प्यार बहुत कम हिंदी लेखको को प्राप्त हुआ है।

लेकिन यहाँ दो बातें मैं कहना चाहूँगा कि वस्तुतः लोक और क्लास में जो विभाजन किया गया उसे आज आप देख ही रहे हैं की समय ने भर दिया। अब लोक ही है जो निर्णय करता है और अपना मनपसंद चुनता है। दूसरे लेखक भी व्यवसायिकता में कई वर्षों से उपन्यास को अनावयशक विस्तार दे रहे हैं। नए से ही कहूँ हीरा फेरी, हार्पर कॉलिन्स से आया बेस्ट सेलर है 2017, सिंगला केस2019 आदि हैं जिनमें कई प्रसंग अनावश्यक विस्तार किए। करें पर फ़्लो भी देखें। हालाँकि हर कोई परफ़ैक्ट नहीं होता।

आत्मकथ्य यह शिकायत दूर करता है। रोचकता और प्रसंगों की ऐसी बरसात होती है कि आप सभी बचपन, घर बाहर पूरे भारत के लोक, उसके रंगों और गली कूचों की देशकाल से परे जाकर यात्रा करके तृप्ति का अहसास पाते हैं।

यह सवाल भी आता है क्या योग्य गुरु ने योग्य शागिर्द तैयार किए? पाठक जी अस्सी वर्ष में हैं, ख़ुदा उन्हें सदैव स्वस्थ रखे, पर इनके बाद कौन ? बेहतर है कि लाखों पाठकों (आत्मकथा में फौजी जनरल, जज, वकील, डॉक्टर से लेकर आम पाठक तक के दिलचस्प वर्णन है) के हितार्थ अभी भी वह अपनी पुत्री रीमा को अपनी निगरानी में, रुचि भी है उनकी, लेखन के क्षेत्र में उतारें। वह इनके सभी कार्य उपन्यास सम्बन्धी कई वर्षों से देख रही हैं।

आज के समय में पठन-पाठन पर थोड़ा ध्यान कम हो रहा है परन्तु अभी भी ऐसे ज़बरदस्त क़िस्सागो हमारे बीच हैं यह गर्व की बात है। जिनकी किताबें अब भी लाखों में बिकती हैं, पढ़ी और सराही जाती हैं। राजकमल प्रकाशन ने बेहतरीन ढंग से यह आत्मकथा प्रकाशित की है। हिन्दी और हिंदीतर हर नए, पुराने लेखक, आलोचक को यह आत्मकथा पढ़नी चाहिए।इसलिए कि यह बताती है कठिनाईं, अभावों, सतत मेहनत और बेशुमार कॉम्पिटिशन और फ़ुल टाइम कड़ी नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी कैसे पाठकों के मन और दिल मैं आधी सदी से भी अधिक जगह बनाई जाती है। भाषा की गहराई, कई स्थानों पर गुरूवाणी, गीता, उर्दू के शेर और अंग्रेज़ी के रोचक वन लाइनर लेखक के गहन अध्ययन को बताते हैं।

आत्मकथा के तीसरे और अंतिम खण्ड का बेसब्री से सभी को इंतज़ार है।

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