नियम भाव सब भंग हुए

21-02-2019

नियम भाव सब भंग हुए

राघवेन्द्र पाण्डेय 'राघव'

मन इतना क्यों अ-स्थिर है,

हम क्यों इतने तंग हुए !

पटक-पटक सर, खीझ खुदी पर
रोते रहे नवा के माथ
फूलों की सब गंध किन्तु, अविचल
उड़ गयी हवा के साथ


मुस्काती, उड़ती तितली के

पंख आज बेरंग हुए!

तार-तार हो छिटकी आशा
रहन-सहन की गति बदली
अलग हुये संबंध, बड़प्पन
छूटा, सबकी मति बदली


न्यायमूर्ति अब हँसते-हँसते,

अन्यायी के संग हुए!

शिशु के मस्तक पर फिरते थे
जननी के दुलराते हाथ
आँचल की वह ओट नहीं अब
बच्चों के घर हैं फुटपाथ


जप-तप, दान-ध्यान के शाही

नियम-भाव सब भंग हुए!

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