01-07-2019

निशांत की कविता में राजनीतिक व्यंग्य

डॉ. दयाराम

साहित्य में मानव जीवन के विविध दृश्यों का गतिशील चित्र मिलता है। साहित्य का प्रयोजन भी मानव जीवन के सरल-जटिल संदर्भों को संवेदनात्मक अनुभूति प्रदान कर साहित्यिक विधाओं के माध्यम से प्रतिकात्मक रूप में अभिव्यक्त करना है। मानव जीवन से राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक दृष्टिकोण सीधे जुड़े रहते हैं। इन्हीं का आदर्श व यथार्थ अंकन साहित्य में मिलता है। समकालीन प्रवेश में राजनीतिक बदलाव विविध आयामों से दृष्टिगत होता है। यह बदलाव समकालीन कविता में उग्र स्वरों व सपाटता के साथ मिलता है। समकालीन कवि बिना किसी दूराव-छिपाव के सीधा राजनीति के लिबास को उतारने का काम करते हैं। आज की कविता का कथ्य किसी न किसी रूप में राजनीतिक उल्लेख करता जान पड़ता है।

समकालीन कवियों में निशांत का रचनात्मक दृष्टि से साहित्य जगत् में बराबर योगदान रहा है। निशांत का वैचारिक दृष्टिकोण यथार्थवादी व प्रगतिवादी रहा है। इनका साहित्य समकालीन परिवेश व परिस्थितियों का दस्तावेज़ है। इक्कसवीं सदी में तीव्र गति से आ रहे बदलाव को कवि निशांत की कविता में सहजता से देखा जा सकता है। निशांत की सशक्त लेखनी साहित्यिक मंच से उपेक्षित एवं गुमनाम सी जान पड़ती है। किन्तु उनकी क़लम की आवाज़ उपेक्षिता मे भी अपनी पहचान क़ायम रखने वाली है।

स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति के स्वरूप में काफ़ी बदलाव आया है। जनता के आजादी पूर्व सँजोये स्वप्न टूटने लगे हैं। नेतागणों के स्वहितों के आगे जनता की सुविधाएँ, आषाएँ व इच्छाएँ धूमिल होने लगी हैं। उपेक्षित जनता का उपेक्षित स्वर धीरे-धीरे मंद पड़ता जा रहा है। ऐसे समय में कवि निशांत ने अपने रचनात्मक कौशल के साथ समय की नब्ज़ पकड़ने का सार्थक प्रयास किया है। आज के परिवेश की भयावहता, आंतक, अन्याय, शोषण तथा राजनीति की त्रासदी कविता में मुखरता के साथ अभिव्यक्त हुई है। बदलते नेता का यथार्थ कवि निशांत की क़लम ऐसे लिखती है-

“अब जो 
सीधे मुँह बात नहीं करता
और चीते की तरह गुर्राता है
शुरू-शुरू में बहुत सीधा था
रास्ते चलते हर एक को
नमस्ते करता था”1

निशांत अत्यंत सरल, सहज शब्दावली, नाटकीयता के साथ राजनीति का चित्रण करते हैं। राजनेता अपनी स्वार्थसाधना व  पद की लिप्सा के कारण पार्टियाँ कपड़ों की तरह बदल लेते हैं लेकिन उनका मूल चरित्र कभी नहीं बदलता है। यह आज की राजनीति का एक चेहरा है। आज के भूमंडलीकरण के दौर में सब कुछ व्यावसायिक हो गया है। राजनीति भी वस्तुतः एक प्रकार की व्यापारिक गतिविधि है-

“नयी पार्टियाँ बना कर
चुनाव लड़ने के लिए
कइयों ने
पुरानी पार्टियाँ तोड़ी
और नयी जोड़ीं
लेकिन चरित्र सुधार के नाम पर
वही रहा
ठन! ठन! गोपाल!”2

आम आदमी ‘वोट’ की राजनीति से त्रस्त है। उसके लिए वोट फ़ालतू वस्तु नज़र आती है और कल्पना करता है कि काश! ये कोई उपयोगी वस्तु होती तो किसी को दान अवश्य कर देते-

“वोट!
वोट!
वोट!
आखिर देना ही पड़ेगा इसे
किसे न किसे
रख कर भी क्या करेंगे ?
लेकिन दिल दुखता है
काश!
यह दही होता
जिसे बिलोकर
मक्खन हम निकाल लेते
और छाछ माँगने वाले के
दोने में डाल देते!”3

राजनीति से विचारधारा का अंत हो चुका है। व्यक्तिगत हित प्रधान हो गये हैं। राजनीति अब जनता को भ्रमित करने का माध्यम है। व्यक्तिगत छींटाकशी राजनीति में प्रधान होती जा रही है। विचारहीन राजनीति विकास को पंगु बना रही है। विकास के नाम पर केवल खोखली घोषणाओं का शोर ही सुनाई देता है। इस शोर में जनता की आवाज़ दब गयी है और नेताओं की गद्दी, प्रतिष्ठा, सुविधाएँ बढ़ती ही जा रही हैं-

“दस-पंद्रह साल पहले मैंने
उन्हें अपने बराबर आँका था
और उनके विरुद्ध चुनाव
लड़ने का
सपना पाला था
लेकिन मेरा सपना
सपना ही रहा
वे लगातार एम.एल.ए.
एम.पी.
और मिनिस्टर, बनते चले गए
और मैं हाथ मलते हुए
चुपचाप देखता रहा”4

क्रमशः एम.एल.ए., एम.पी. और मिनिस्टर बनाना राजनीति में एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किन्तु ये केवल चेहते नेताओं के लिए ही है। आमजन इस चुनावी दंगल में असफलता के अलावा कुछ नहीं पाता है। वोट और राजनीति शब्द  देखने में भले ही छोटे हो लेकिन इनका खेल निराला है। निशांत ने ईंट भट्टे के मज़दूरों में ईंट और भट्टे दोनों का एक साथ बिम्बात्मक चित्रण किया है-

“भट्टे के मज़दूर आ गये 
सोचता हूँ-
ये शख़्स
मालिक के लिए वहाँ
ईंट थे
यहाँ वोट हो
गये हैं”5

ये कैसी विडम्बना है, वोट के आगे व्यक्ति एक मोहरा है। हर कोई उसे अपनी मर्ज़ी से प्रयोग कर लेता है। राजनीति में धरातल के ठोस कार्य नहीं हो रहे हैं। जनता की आँखें दिल्ली की ओर किसी आशा से हरदम ताकती रहती है लेकिन उधर से धूल फाँकती आँधी के सिवा कुछ नहीं मिलता है। राजपथ का ऐसा वैभव भय ही उपजाता है-

“व्यर्थ है
दिल्ली के राजपथ पर
यह वैभव और
शक्ति प्रदर्शन घरों में भी
सहमें हैं
देश के
आम नागरिक”6

यथार्थ है कि झण्डे और डण्डे की राजनीति से आमजन का वजूद कल्पना मात्र है। भूखा पेट, नग्न बदन, बारिश में टपकती छतें दिल्ली से स्वप्न में भी झण्डे-डण्डे की माँग नहीं करती है, केवल उनकी माँग  रोटी, कपड़ा और मकान होती है। इन माँगों को राजनीति में केवल पाँच सालों में एक बार ही उठाया जाता है, शेष समय तो उछाली ही जाती है। कभी इस पार्टी के पाले में होती है तो कभी उस पार्टी के पाले में होती है। पाले बदलते-बदलते लगता है कई दशकों बूढ़ी अवश्य हो गयी है। ऐसी दशा पर निशांत की कविता ‘विडम्बना और विडम्बना’ करारा व्यंग्य करती है-

“भूख
और चिन्ताओं के मारे
इस देश के लोगों को
मरने और जीने में
कोई भेद नज़र नहीं आता
लेकिन इस देश का
जो भी प्रधानमंत्री बनता है
लोगों के
जीवन की सुरक्षा चाहता है”7

आज सुरक्षा के नाम पर जनता कैसे लूटी जाती  है? इसका प्रमाण निशांत कि ‘छींका टूटा’ कविता बयाँ करती है-

“कुछ बहरूपियों ने
खूब माखन लूटा
लूटा रे! लूटा! माखन लूटा
बिल्ली के भागों......
रूठा रे! रूठा
इस देश की जनता का
 भाग रूठा”8

राजनीति में विचारधारा का अंत हो रहा है। मूल्यहीन राजनीति में केवल कुर्सी की लालसा सर्वोच्च है। पार्टियाँ कुर्सी पर आसीन होने के लिए उसके पाँव रात-दिन खींचती ही रहती है। इसी कारण एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करना यहाँ आम हो गया है-

“प्रदेश में
पानी की कमी थी
बिजली की भी
महँगाई
बेरोज़गारी
शोषण
और भ्रष्टाचार का तो
ताँडव मचा था
फिर भी विपक्ष ने
संकल्प लिया
सिर्फ़
सत्तारूढ़ दल को
उखाड़ने का।”9

निशांत की राजनीतिक मूल्य मीमांसा ने अपने समकालीनों को एक दिशा प्रदान की है। उनकी चेतना ने प्रकट कर दिया है कि राजनीति जीवन का एक अंग है। इसके यथार्थ से आम जन को परिचित होना आवश्यक है। तभी वे एक स्वस्थ विचार और दृष्टिकोण को विकसित कर, अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं। इसके साथ ही निशांत की कविता राजनेताओं को आदर्श राजनीति से जनता के दुख, दर्द, समस्याओं को समझ कर, समाधान करने की प्रेरणा देती है।

संदर्भ-

1. खुश हुए हम भी, निशांत, पृ. सं. 39
2. समय बहुत कम है, निशांत, पृ. सं. 25
3. वही, पृ. 51
4. वही, पृ. 31
5. वही, पृ. 55
6. खुश हुए हम भी, निशांत, पृ. 39
7. झुलसा हुआ मैं, निशांत, पृ. 53
8. वही, पृ. 43
9. बात तो है जब, निशांत, पृ. 64

डॉ. दयाराम
व्याख्याता (हिन्दी) 
राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय, लिखमीसर 
ज़िला-हनुमानगढ़ (राजस्थान) पिन-335802
स्थायी पता-वार्ड न. 8 ,चक 3 टी. के. डब्ल्यू.  पो.ऑ. केवलावाली, तहसील- पीलीबंगा
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