निरुत्तर

01-08-2019

निरुत्तर

रमेश ‘आचार्य’

स्कूल में इंस्पेक्शन की तैयारियाँ चल रही थीं। आज वह पूरे एक सप्ताह बाद स्कूल आया था। वह मेरे पास गुमसुम बैठा न जाने क्या सोच रहा था। हमारे कक्षा अध्यापक, जो हमें अँग्रेज़ी पढ़ाते थे, हाथ में छड़ी लिए सबकी कॉपियाँ जाँच रहे थे और जिस बच्चे का काम अधूरा होता, उस पर छड़ी की बरसात करते जाते। जैसे ही उसका नंबर आया, वह घबराकर उठा और बोला, "सर जी, कल आपको ज़रूर दिखा देंगे।" 

इंस्पेक्शन के दबाव के कारण कक्षा अध्यापक का पारा गर्म था। उन्होंने ग़ुस्से में उसके छड़ी मारते  हुए कहा, "हरामखोर! एक तो काम नहीं किया, ऊपर से जवाब देता है।" ऐसा कहकर उन्होंने फिर से उस पर छड़ियों की बरसात शुरू कर दी।

वह रोते हुए बोला, "सर जी, मेरे पिता नहीं है और माँ की दिनों से बीमार हैं। मुझे उनकी जगह सब्जी बेचने जाना पड़ता है, अगर न जाऊँ तो दोनों छोटे भाई-बहन क्या खाएँगे?" 

यह सुनते ही कक्षा अध्यापक निरुत्तर हो गए।

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