निर्गुण गीत एवं आम जनमानस

15-10-2019

निर्गुण गीत एवं आम जनमानस

डॉ. छोटे लाल गुप्ता

निर्गुण गीत मूलतः वे गीत हैं जिनमें जीवात्मा-परमात्मा सम्बन्धी बातें प्रतीकात्मक रूप से कही गई हैं। निर्गुण गीत ‘निर्गुन’ नाम से आम जनमानस में आज भी प्रसिद्ध हैं। ये निर्गुण गीत निर्गुण संत सम्प्रदाय की भावना पर ही आधारित हैं किन्तु संतों की अटपटी बानियों की तरह ये गूढ़ एवं अस्पष्ट नहीं हैं, वरन् भाव-प्रवण एवं सहज संप्रेष्य हैं। कई गीतों की आख़िरी पंक्तियों में कबीरदास का नाम आता है किन्तु ये गीत कबीरदास द्वारा रचित हैं, ऐसा निश्यचात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता। बहरहाल, ये कबीर के हैं अथवा नहीं हैं, इससे इनके महत्त्व, इनकी लोकप्रियता पर कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि इन गीतों की व्याप्ति आम जनता में काफ़ी लम्बे समय से है। ये गीत ज़्यादातर भोजपुरी क्षेत्रों में गाए जाते हैं, इसका कारण शायद यही होगा कि कबीर आदि निर्गुण संत काशी और उसके आस-पास ज़्यादा रहे। उनकी बानियों का प्रभाव उस क्षेत्र के जनमानस पर अपेक्षाकृत अधिक रहा होगा। लिहाज़ा निर्गुण गीतों की एक सुदीर्घ परम्परा भोजपुरी में मौजूद है। वहाँ आज भी ये गीत ख़ासे लोकप्रिय हैं, मसलन हम भोजपुरी का ही एक गीत देखें जिसमें किसी व्यक्ति के मरने का ज़िक्र हो रहा है:

कौनों ठगवा नगरिया लुटलेसि हो।

इस गीत में किसी की ज़िन्दगी उजड़ने की बात कही गई है। इस तरह के बहुत सारे गीत भोजपुरी में पाए जाते हैं। इन गीतों में न केवल मृत्यु का भय मौजूद है, वरन् जीवन रहते सदाचार पालन पर ज़ोर दिया गया है, तप और शुद्धता की महिमा पाई गई है। इन गीतों में मृत्यु के दृश्य को प्रायः लड़की के विवाह, उसकी विदाई आदि प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। जैसे-

सिखलू न एकर सउरवा
भला कइसे जइबू गवनवाँ हो।
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भेजि देइहैं पिया के भवनवाँ
भला कइसे जइबू गवनवाँ हो॥

किसी के मरने के बाद लोग रोते हैं, मृतक शरीर के लिए कफ़न लाया जाता है, शव को बाँधा जाता है और चार आदमी कंधे पर उठाकर ले जाते हैं, इस समूचे दृश्य को लड़की की विदाई के दृश्य के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यह गीत  कबीर दास का ही है:

आई गवनवाँ की सारी, उमिरि अबहीं मोरि बारी।
साज समाज पिया लै आये, और कहरिया चारी।
बम्हना बेदरदी अचरा पकरि कै, जोरत गंठिया हमारी।
सखी सब गावत गारी। आई गवनवाँ की सारी।
बिधि गति बाम कछु समझ परत ना, बैरी भई महतारी।
रोय रोय अंखिया मोर पोंछत, घरवा से देत निकारी।
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कहै कबीर सुनो भाई साधो, यह पद लेहु विचारी।
अब के गवनां बहुरि नहि अवनां, करिले भेंट अकबारी॥

यहाँ समूचा दृश्य मृत्यु और उसके बाद की समूची घटना को व्याख्यायित कर रहा है और बता रहा है कि सब कुछ कैसे छूट जाता है, जो ख़ास अपने थे पराए हो जाते हैं, कोई साथ नहीं जाता, बल्कि जल्दी से निकाल बाहर कर देते हैं और ले जाकर नदी के किनारे जला दिया जाता है। पूरे वातावरण में शोक का समुद्र उमड़ पड़ता है, जैसे किसी ने आग लगा दी हो और सब कुछ नष्ट हो गया हो, कुछ वैसा ही दृश्य मृत्यु के बाद उपस्थित होता है। इसी दृश्य को अवधी में लिखा एक निर्गुण गीत अपने तरीक़े से दिखा रहा है:-

उजारि दिहीं हो टोला चलीं गवने का,
टोला उजारि दिहीं
चारि कहार मोर जन्मेन कै साथी
पूछै न पाछै उठाई लेहिं हो डोला चलीं गवने का।
उजारि दिहीं हो टोला चलीं गवने का॥

ये सारे गीत संसार की असारता एवं अनाशक्ति के भाव को न केवल उत्पन्न करते हैं, वरन् हमें निर्वेद की स्थिति में पहुँचा देते हैं। कुछ क्षण के लिए ही सही, हम यह सोचने विचारने के लिए विवश हो उठते हैं कि जीवन वास्तव में क्षणभंगुर, नाशवान है और हमारा चरम और परम लक्ष्य क्या होना चाहिए और हम भटक गए हैं इस सांसारिक माया मोह के बंधन में। आदि-अनादि भाव इन गीतों को सुनने से उत्पन्न होते हैं। ये गीत हमें संसार की वास्तविकता से रूबरू कराते हैं, बहुत संभव है कि पहले ये गीत किसी के मरने के बाद उत्पन्न शोक को शांत करने के लिए मृतक के परिवार वालों को गाकर सुनाए जाते रहे हों। आज भी किसी-किसी के घर मृत्यु के पश्चात् गरूड़-पुराण की कथी सुनी जाती है। उसमें भी स्वर्ग और नरक के तमाम क़िस्से मौजूद हैं, जो निर्वेद उत्पन्न करने वाले ही हैं और मृतात्मा के अभाव से उत्पन्न क्षोभ से हमें विश्रान्ति प्रदान करते हैं। ये गीत यही कार्य ठेठ और सामान्य भाषा में करते हैं और इनकी व्याप्ति भी कम नहीं है। संतकाव्य में भी जीव को स्त्री और ब्रह्म को पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है। कबीर आदि संतों ने जीवात्मा को स्त्री रूप में तथा परमात्मा को पुरुष रूप में ही व्याख्यायित किया है। इन गीतों में भी यही प्रतीक दिखाई पड़ता है। एक गीत इसी तरह का है जिसमें भँवरा प्राण का प्रतीक अर्थ  है। जैसे-

भँवरवा, के तोहरा संग जाई,

पेट पकरि के माता रोवै, बाँह पकरि के भाई,
सेज पकरि के तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई,
भँवरवा, के तोहरा संग जाई॥

कबीर के पदों में भँवरा काले केश का प्रतीक है, वे एक पद में कहते हैं-

रैन गई मत दिनु भी जाई।
भवर उड़े बरा बैठे आई॥

यानी कि काले बाल अब सफ़ेद हो चले हैं, हे जीवात्मा तू अब भी समय रहते भगवान का भजन कर ले क्योंकि काल का कुछ पता नहीं है। कुछ निर्गुण गीत ऐसा भी हैं जिसमें यह भाव भी मिला है कि जो करम में लिखा है, उसे कोई टाल नहीं सकता। कर्म का फल भोगना निश्चित है, कर्म का प्रभाव देवी-देवता तक को नहीं छोड़ता, उन्हें भी भोगना पड़ता है- कबीर का एक गीत इसी प्रारब्ध की जटिलता को बताता है:

करम गति टारे नाहिं टरी।
मुनि बसिष्ट से पंडित ज्ञानी सोधि के लगन धरी
सीता हरण मरन दशरथ को, बन में विपत्ति परी॥
.......................................................................
कहै कबीर सुनो भाई साधो, होनी होके रही॥

इन गीतों की विशेषता इसी रूप में है कि ये गीत जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई को बड़े ही बेलाग रूप से स्पष्ट करते हैं, मसलन मृत्यु को ही लें तो; मृत्यु ऐसा आतंकित करने वाला बोध है कि जिस पर कोई आदमी बात करने से भी कतराता है। ये गीत इस डरावने विषय को भी इतनी सहजता से हमारे सामने रखते हैं कि हम देखते हैं कि हमारा डर धीरे-धीरे तिरोहित होने लगता है। ये गीत भावना से इतने ओत-प्रोत हैं कि इन्हें कोई भी व्यक्ति मनोयोग से सुनता है, समझता है। ये गीत आज भी गाँवों की चौपालों से गाए जाते सुने जा सकते हैं। ये निर्गुण गीत अपनी अर्थवत्ता आज भी रखते हैं और भविष्य में भी रखते रहेंगे।

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