नये वर्ष कुछ ऐसे आना

01-01-2021

नये वर्ष कुछ ऐसे आना

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

नये वर्ष 
कुछ ऐसे आना,
रह रह ख़ुशियाँ बरसें।
 
रहे  न कोई भूखा-नंगा,
रहे न दुःख का मारा,
सब में जगें नई आशाएँ,
दूर  हटे अंधियारा,  
रात-दिवस
उत्सव  जैसे हों,
सबके जीवन हरसें। 
 
भय, आतंक, निराशा, छल से 
मुक्त रहे जग सारा,
करें प्रेम का बीजारोपण,
पनपे भाईचारा,
कभी अभाव 
न हो जीवन में,
कभी न जन-मन तरसें।
 
चलता रहे प्रगति का पहिया,
सब ही मंज़िल पायें,
सबके ही सपने पूरे हों,
सब मिल मंगल गायें,
सारा विश्व 
एक घर सा हो,
सुख की फसलें सरसें।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
किशोर साहित्य कविता
बाल साहित्य कविता
किशोर साहित्य कहानी
कविता - हाइकु
दोहे
कविता-मुक्तक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में