नक्सली राजा का बाजा - 1

01-05-2019

नक्सली राजा का बाजा - 1

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग -1

"भोजूवीर इतना चीख-चिल्ला क्यों रहे हो? अपनी बात आराम से बैठ कर भी कह सकते हो। मैंने तुम्हारी बात कभी सुनी ना हो, तुम्हें कभी कोई इम्पॉर्टेंस ना दी हो तब तो तुम्हारा यह चीखना-चिल्लाना समझ में आता।" 

"नहीं, नेताजी मैं चीख-चिल्ला नहीं रहा हूँ, आप मेरी बात समझने की कोशिश कीजिए।"

"बैठो, पहले बैठो कुछ देर शांति से फिर बताओ। आज मैं तुम्हारी हर बात सुनने के बाद ही कोई दूसरा काम करूँगा।" 

नेताजी के कहने पर भोजू उनके सामने पड़ी बड़ी सी मेज़ के दूसरी तरफ़ रखी कई कुर्सिओं में से ठीक उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। इसी बीच नेताजी ने फोन करके चाय-पानी के लिए कह दिया। फिर भोजूवीर की तरफ़ मुख़ातिब हो कर बोले-

"देखो भोजू, अभी हमें सारा ध्यान इस बात पर देना है कि चुनाव क़रीब आ गए हैं। पार्टी अपना दमखम दिखाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए है। इस बार हर हाल में सत्ता में आने के लिए कमर कसे हुए है। यही समय है जब हमें भी अपना पूरा दमखम हर हाल में दिखाना है। हमें पार्टी नेतृत्व को यह दिखाना है, अहसास कराना है, कि हम अपने क्षेत्र के ना सिर्फ़ एकमात्र सबसे बड़े मज़बूत नेता हैं, बल्कि संसदीय चुनाव में टिकट के एकमात्र दावेदार भी हम ही हैं। हमें टिकट देंगे तो यह सीट पक्की है। 

यहाँ हमारे सामने न पार्टी का कोई दूसरा नेता है, ना ही किसी और पार्टी की कोई हैसियत है। हमारी सीट इतनी पक्की है कि चुनाव तो औपचारिकता मात्र है। भोजू यह समय जब और मज़बूती से अपना दावा पेश करने का है, पिछले कई साल से पार्टी के लिए हमने जो मेहनत की है, जो समय, पैसा खर्च किया है, उसे ब्याज सहित पाई-पाई वसूलने का है, ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर तुम वह काम करने के लिए कह रहे हो हफ़्ते भर से जिससे अब तक के सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा। पार्टी इसे हमारी बग़ावत मानेगी। 

एक मिनट का भी समय नहीं लेगी हमें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में। जिला महासचिव तो कब का इसी फ़िराक़ में बैठा है कि मैं, तुम, किसी तरह हाशिए पर पहुँचें, और उसका रास्ता साफ़ हो। तुम ही बताते रहते हो कि किस तरह बराबर हम सब की चुगलखोरी करने, हमें डैमेज करने में लगा रहता है। जब देखो तब दिल्ली में आलाकमान से संपर्क साधने में लगा रहता है। सब कुछ जानते हुए भी तुम यह सब क्यों कह रहे हो? सच क्या है वह बताओ।"

"नेताजी देखिए एक तो पता नहीं क्यों आप मुझ पर शक कर रहे हैं कि मैं कुछ छुपा रहा हूँ। बार-बार कहता हूँ कि आपको छोड़कर कहीं जाने वाला नहीं हूँ। मैं साफ़-साफ़ यह कहना चाहता हूँ कि हम लोग बीते आठ-नौ सालों से पार्टी के लिए और जो ऊपर बड़े नेता, आलाकमान को घेरे रहते हैं, उन सबकी चमचई कर-कर के आज तक कुछ कर नहीं पाए। थोड़ा बहुत इधर-उधर का काम और इन सब से मिलने-जुलने का कोई मतलब है क्या? क्या है हमारा भविष्य? कहने को हमारा लीडर कहता है कि हम युवाओं को आगे ले आएँगे, युवा देश की, हमारी ताक़त हैं। हमें उन्हें आज अवसर देना ही होगा। लेकिन असल में हो क्या रहा है आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं। 

चाहे किसी प्रदेश की यूनिट हो या केंद्र की, सारे महत्वपूर्ण पदों पर वही पुराने खूसट डेरा जमाए हुए हैं। साले हिलने-डुलने को मुहताज हैं। मुँह से बोल निकल नहीं पाते हैं। लेकिन फिर भी खूँटा गाड़े जमें हैं। पार्टी को भी जमाए हुए हैं। ना खिसक रहे हैं, ना पार्टी को खिसकने दे रहे हैं। मुझे पार्टी का कोई भी भविष्य नज़र नहीं आ रहा है। हमारा लीडर पचास साल का हो रहा है, लेकिन आज तक बोलना नहीं सीख पाया। कब अंड-बंड बोल कर कुल्हाड़ी अपने ही ऊपर मार ले, पार्टी की ऐसी की तैसी करा दे इसका कोई ठिकाना नहीं। जब कभी लगता है कि पार्टी दो क़दम आगे बढ़ी है तभी वह कुछ ऐसा कर बैठता है कि पार्टी चार क़दम पीछे चली जाती है। 

नेताजी, नेताजी इस जहाज़ के पेंदे में इतने छेद हो चुके हैं कि उन्हें ठीक करना असंभव है। कम से कम इस लीडर के रहते तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। तो आख़िर हम इस गल चुके पेंदे वाले जहाज़ में क्यों सफ़र करें, जिसका डूबना निश्चित है। चलो ग़लती हुई, ग़लत जहाज़ में सवार हो गए, जानकारी नहीं थी। लेकिन अब तो सब कुछ जान चुके हैं। देख रहे हैं, तो अब समझदारी इसी में है कि समय रहते निकल लिया जाए। इस जहाज़ का डूबना निश्चित है। थोड़ा ज़्यादा बड़ा है तो समय कुछ ज़्यादा लेगा। बकिया डूबना तो तय है।"

नेताजी भोजू की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे। और साथ ही उसकी बातों में बग़ावत की बू आ रही है या नहीं इसे भी सूँघने की पूरी कोशिश कर रहे थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि भोजू पिछले एक हफ़्ते से इतना आक्रामक क्यों हो रहा है? दिन पर दिन इसकी आक्रामकता क्यों बढ़ती ही जा रही है। वह सोचने लगे कि "इसके पीछे कोई लग तो नहीं गया है, कि यह मेरा दाहिना हाथ है? मेरी ताक़त है। इसे काट दो तो मैं बेकार हो जाऊँगा। 

पैसा रुपया सब मेरा ना सही लेकिन अस्सी परसेंट तो मेरा ही लगता है। बाक़ी में यह और अन्य हैं। लेकिन राजनीति की असली पॉवर भीड़ तो इसी के पास है। यह हाथ से निकल गया तो मैं कहीं का नहीं रह जाऊँगा। इसको जैसे भी हो साधना होगा। और यदि नहीं सधा तो?" नेताजी ने मन में ही ख़ुद ही प्रश्न किया और फिर उसी कठोरता से उत्तर भी दिया "तो यह किसी और की ताक़त बनने लायक़ भी नहीं रहेगा।" वह अंदर ही अंदर खौलते रहे, तेज़ी से कैलकुलेशन करते रहे। लेकिन चेहरे पर नम्रता की, प्यार की मोटी चादर ओढ़े रहे। और बड़े प्यार-स्नेह से बोले-

"भोजू तुम्हें मैं अपने छोटे भाई की तरह मानता हूँ, ध्यान रखता हूँ, तुम्हें आगे बढ़ा रहा हूँ। हो सकता है मुझसे अनजाने में कोई ग़लती हो गई हो। मुझे जो करना चाहिए तुम्हारे लिए वह नहीं कर पाया। तुम निसंकोच निश्चिंत होकर सब बताओ, अपने बड़े भाई को आज सब कुछ बताओ कि आख़िर क्या छूट रहा है मुझसे।"

नेताजी भोजू को समझाते रहे। उसे जितना समझाते वह उतना ही अपनी बात पर अडिग होता गया। नेताजी की चार तार की चासनी में पूरी गहराई तक रची-पगी भावनात्मक बातों को भोजू ने अपने क़रीब फटकने ही नहीं दिया। चाय नमकीन एक नहीं दो बार आई और ख़त्म हो गई। लेकिन ना नेताजी भोजू को समझा पाए और ना ही भोजू नेताजी को। अंततः नेताजी की ओढ़ी हुई सज्जनता, भोजू के लिए उमड़ता जा रहा प्यार-स्नेह अचानक ही एक झटके में ग़ायब हो गया।

वह अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। भोजू भी जैसे पहले ही से तैयार था। वह भी खड़ा हो गया। लेकिन नेताजी उसकी उम्मीदों से भी कहीं ज़्यादा मुखर हो चुके थे। तमतमाए हुए जो बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले गए। सीधे-सीधे कहा-

"तुम क्या समझते हो यह जो शगूफ़ा लेकर निकले हो इससे तुम राजनीति कर पाओगे। इतने दिनों में यही समझ पाए हो राजनीति को। तुम्हारे जैसे ना जाने कितने नेता राजनीति का ताज पहनने के लिए रोज़ निकलते हैं। और राजनीति की अँधेरी, बीहड़ गली में भटक-भटक कर, ठोकरें खा-खा कर कीड़े-मकोड़े की तरह मर जाते हैं। इस भीड़ में से निकल वही पाया है जो अपने सीनियर के पदचिन्हों पर बिना आवाज़ किए उसके पीछेे-पीछे चला है। तुम अभी राजनीति में पहली भोर की दुपहरी भी नहीं देख पाए हो और हमें बता रहे हो कि राजनीति कैसे करें? किसके इशारे पर हमें राजनीति सिखा रहे हो? कितनी कमाई कर ली है वहाँ से?"

नेता जी की बातें भोजू को तीर सी भेदती चली गईं। नेताजी के सारे आरोप झूठे थे। वह पूरी तरह उनके प्रति निष्ठावान था। लेकिन नेताजी की कच्छप चाल वाली राजनीति से बुरी तरह तंग आ चुका था। वह नेता जी और अपनी ताक़त भी अच्छी तरह जानता-समझता था, और पार्टी में अपनी हैसियत से भी वाकिफ़ था। वह अच्छी तरह जानता था कि पार्टी में उसकी हैसियत नेता जी के दुमछल्ले की है। यह छल्ला खनकता भी तभी है जब नेताजी की दुम हिलती है। वह अपनी इस इमेज़ से  आजिज़ आ गया था। बड़ी शर्मिंदगी महसूस करता था। बदलना चाहता था अपनी इस इमेज को। निकलना चाहता था इस इमेज के शिकंजे से। उसे अच्छी तरह मालूम था कि नेताजी की राजनीति का इंजन वही है। यदि वह निकल गया तो नेताजी बिना इंजन के ढांचा (चेचिस), बॉडी भर रह जाएँगे। जो बिना इंजन के हिल भी ना पाएगा। खड़े-खड़े जंग खा जाएगा। ख़त्म हो जाएगा। 

मन में वह नेता जी से ज़्यादा तेज़ी से कैलकुलेशन करते हुए सोच रहा था कि "यह सबकुछ जानते हुए भी जिस तरह का व्यवहार मुझसे कर रहे हैं वह अब बर्दाश्त के बाहर है। अब इनको दिखाकर रहूँगा कि यह कायस्थ कुलोद्भव हैं तो मैं भी कायस्थ कुलोद्भव हूँ। नमक से नमक नहीं खाया जा सकता। एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। इतने दिनों से रहती आईं यही बहुत बड़ी, बहुत अनोखी बात है। अब समय आ गया है कि इनसे मुक्ति पा लूँ। दिखा दूँ लालाजी को कि तुम हमसे हो, हम तुमसे नहीं। अनादिका कितना सही कहती है कि "तुम कितना भी कोशिश कर लो, तुम्हारी यह दोस्ती अब बस पूरी ही होने वाली है।" वह कितने दिनों से कह रही है कि "तुम्हारा नेता इस क़ाबिल नहीं कि लीडर बन सके। तुम्हारे जैसे लोगों को नेतृत्व दे सके।" 

वह मेरी बातें सुन-सुन कर कितनी बार बोल चुकी है कि "तुम्हारे इस लोकल लीडर और नेशनल लीडर में भी लीडरशिप, पॉलिटिक्स के कोई जर्म्स हैं ही नहीं। पॉलिटिक्स के जर्म्स तुममें है, इसलिए सबसे पहले तुम्हें इस पार्टी को ही छोड़ देना चाहिए। तभी सच में नेता बन पाओगे।" मगर मैं मूर्ख उसे यह कहकर चुप करा देता हूँ कि वह अपनी नौकरी सँभाले, किचेन सँभाले, होम मिनिस्ट्री भी दे रखी है वह भी सँभाले। बच्चा मिनिस्ट्री हमारा ज्वाइंट वेंचर है, उसे दोनों मिलकर सँभालेंगे। मगर सच तो यह है कि वह पॉलिटिक्स को मुझसे ज़्यादा बेहतर समझती है। मैं ही जाहिल पतियों की तरह उसे डपट देता हूँ कि अच्छा-अच्छा बहुत हुआ, अपनी मिनिस्ट्री सँभालो, मेरी पॉलिटिक्स तुम्हारे वश की नहीं है।

सच में मैं कितनी ग़लती करता आ रहा हूँ। उसे वाक़ई बहुत अंडरएस्टीमेट करता हूँ। जबकि पाँच साल से वह अपने ऑफ़िस यूनियन की प्रेसिडेंट बनती आ रही है। दो बार तो निर्विरोध हो चुकी है। मगर अब उससे मैं...मैं उसे।" भोजूवीर के मन में बड़ी द्रुत गति से यह सब अनवरत चलता रहा और फिर वह अंततः चीख-चिल्ला रहे नेताजी पर घनघोर बादल की तरह फट पड़ा। बरस गया एकदम से। लंबे समय से इकट्ठा घनघोर बादल दिल दहला देने वाली भीषण गर्जना के साथ बरस गया। बरसने केे बाद भोजूवीर ने झटके से कुर्सी पीछे खिसकाई। झटका इतना तेज़ था कि कुर्सी दो-तीन क़दम पीछे खिसक गई। 

वह गरजते हुए आख़िरी सेंटेंस बोल कर बाहर निकल गया। दरवाज़ा भी पूरी ताक़त, पूरी आक्रामकता के साथ खोला और बंद किया। नेता जी को ऐसा लगा जैसे भड़ाक से बंद हुआ दरवाज़ा सीधे उनके चेहरे पर आ लगा है। उनके चेहरे को बुरी तरह ज़ख़्मी कर दिया है। नाक मुँह सब खून से लथपथ हो गए हैं। वह बुत बने खड़े रह गए अपनी जगह पर। भोजू का आख़िरी वाक्य उनके कानों में गूँज रहा था। 

उन्होंने पहली बार भोजू का यह रौद्र एवं बग़ावती रूप देखा था। वह इस वक़्त ग़ुस्से से ज़्यादा भयभीत थे। तभी उनकी पत्नी बग़ल वाले कमरे से अंदर आईं। उन्हें पसीने-पसीने देखकर पूछा- 

"क्या हुआ? यह भोजू आज इतनी बदतमीज़ी क्यों कर रहा था। आदमियों को बुलवाकर उसके हाथ पर यहीं का यहीं क्यों नहीं तुड़वा दिया। सब के सब तो बाहर बैठे हमारे ही पैसों का खा-पी रहे हैं।" 

नेताजी को तेज़ आवाज़ में बोल रही पत्नी पर भी ग़ुस्सा आ गया। वह उसकी मूर्खता पर क्रोधित हो उठे कि मूर्ख औरत ऐसे फ़ुल वॉल्यूम में चिल्ला रही है। साले बाहर बैठे सुन रहे होंगे। वह तिलमिला कर बोले-

"चुप रहो, जहाँ नहीं बोलना होता वहाँ भी बछेड़ी जैसी कूद-फाँद करने लगती हो।"

उन्होंने लगे हाथ कई अन्य सख़्त बातें कहकर पत्नी को अंदर भेज दिया। पत्नी भी कमज़ोर नहीं पड़ी। उसने संक्षिप्त सा ही सही तीखा उत्तर दिया और पैर पटकती हुई चली गई उसी दरवाज़े से दूसरे कमरे में, जिधर से आई थी। नेताजी ने उसे जाते हुए नहीं देखा। दूसरी ओर मुँह किए मन ही मन में बस गरियाए जा रहे थे कि "साले बाहर बैठे खा तो मेरे ही पैसों का रहे हैं, लेकिन हैं तो उसी साले भोजुवा के आदमी, यह सब क्यों उस पर हाथ उठाएँगे।" वह मन में ही भोजू पर हमला किए जा रहे थे। 

"भोजू मैंने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं। आदमी तेरे पास हैं, अच्छी बात है। मगर आख़िर पॉलिटिक्स में तुझसे सीनियर हूँ। इसकी अँधेरी गलियों में आए पत्थरों, रुकावटों को कैसे हटाया जाता है वह तुझसे बेहतर जानता हूँ। और यह तो और भी अच्छी तरह जानता हूँ कि तेरे जैसे आदमी पर पत्थर कैसे गिराए जाएँ। कैसे उन्हीं के नीचे दबा कर उन्हीं पत्थरों से समाधि बना दी जाए। तेरे जितने आदमी, तेरे जैसे आदमी मेरे पास भले ही ना हों, लेकिन इतना तुझसे हज़ार गुना ज़्यादा जानता हूँ कि एक ट्रक ड्राइवर को कैसे साधना है। बड़ी मौज आती है ना तुझे गाड़ियों में दर्जनभर लोगों को साथ लेकर चलने में। घबरा नहीं, तुझे ऐसी मौज दूँगा उसी गाड़ी में कि तू मौज से ही ऊब जाएगा। इतना ऊब जाएगा कि दुनिया से ही चला जाएगा।"

तभी मोबाइल में दूसरी बार किसी की कॉल आई। रिंग पूरी होकर बंद हो गई। उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की। भोजू की बातें उनके दिमाग़ में हथौड़े की तरह प्रहार किए जा रही थीं। उनकी चोटें उन्हें इतना विचलित कर रही थीं कि अब भी उनका पसीना सूख नहीं रहा था। बेचैनी में वह कमरे में चहलक़दमी करने लगे थे। एसी का रिमोट उठाकर कूलिंग और बढ़ा दी। गला सूख रहा था। पानी पीने की इच्छा हो रही थी लेकिन पत्नी को डाँट कर भगा चुके थे। किसी नौकर को बुलाना नहीं चाह रहे थे। हैरान परेशान आख़िर वह कुर्सी पर बैठ गए। उन पर हर तरफ़ से हमलावर भोजू का आख़िरी वाक्य "नेताजी मैं जा रहा हूँ, अब मेरी पॉलिटिक्स देखिएगा, कुछ हफ़्तों में आप छोड़िए आलाकमान भी मेरे आगे-पीछे नाचेगा। आप जैसे तो मेरे आस-पास भी नहीं फटक पाएँगे।" दिमाग़ में धाँय- धाँय  दगे जा रहा था। वह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि भोजू ऐसा क्या करेगा?

"कहीं यह सारे राज़ तो नहीं खोल देगा। जिससे बवाल खड़ा हो जाए। बड़े नेताओं की आवभगत, उनके ऐशो-आराम की क़रीब-क़रीब सारी ज़िम्मेदारियाँ यही उठाता रहा है, औरतों से लेकर शराब तक सब इसी के सहारे हुआ है, कहीं साले ने वीडियो-सीडियो तो नहीं बना रखा है कि मीडिया, सोशल मीडिया में वायरल कर दे। मुझे और उन बड़े नेताओं को एक साथ मिट्टी में मिला दे। चुनाव को अब वैसे भी ज़्यादा दिन कहाँ रह गए हैं? बरसों की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। इसके चक्कर में मेरा ही नहीं पार्टी का भी सत्यानाश हो जाएगा। बड़ी मुश्किल से तो किसी तरह लड़ाई में लौटी है, कुछ उम्मीद जगी है। यह भोजुवा तो साला वाक़ई भस्मासुर बन गया है। लेकिन भस्मासुरों को जीने का हक़ कहाँ है? भोजुवा तूने जीने का हक़ खो दिया है। अब तेरी समाधि भी घर वाले तेरी प्रिय मातृभूमि भोजूवीर में ही बनावाएँगे। भोजूवा तू नाहक़ ही भोजूवीर से मरने के लिए यहाँ मेरे पास चला आया। चमकाता अपनी राजनीति वहीं भोलेबाबा के पास वाराणसी में, भोजूवीर में।"

नेताजी बड़ी सावधानी से लग गए किसी ट्रक ड्राइवर को साधने में। सावधानी इतनी कि पत्नी को भी पहली बार अपने किसी काम में राज़दार नहीं बना रहे थे। मोबाइल से कोई बात नहीं कर रहे थे। ज़रूरत पड़ने पर अकेले ही निकल रहे थे। किसी ड्राइवर या गाड़ी को लेकर नहीं, रात के अँधेरे में टहलने के बहाने बाहर निकलते। फिर कुछ दूर जाकर ओला या उबर टैक्सी बुक करते। जहाँ जाना होता उससे थोड़ा पहले ही उतर जाते। ठीक इसी तरह वापस भी आ जाते। पत्नी हर बार पूछती, "कहाँ चले गए थे इतनी देर तक, फोन भी रिसीव नहीं करते। मन घबराने लगता है।" 

सच यह था कि भोजू से छत्तीस का आँकड़ा बनने के बाद से नेता जी भी बाहर निकलते घबराते थे। बिना सिक्योरिटी के बाहर निकलते तो घर के अंदर आ जाने तक पसीने से तर रहते। लेकिन अपनी नेतागिरी के कॅरियर को लेकर इतना सजग कि उसके लिए जान हथेली पर रखकर निकलना भी उन्हें मंजूर था। उन्हें पूरा शक ही नहीं विश्वास था कि अगर भोजू को ज़रा भी पता चल गया तो वह एक्शन लेने में सेकेंड के दसवें हिस्से जितनी भी देरी नहीं करेगा। ऐसी जगह मार कर डालेगा कि एक बाल का भी पता नहीं चलेगा। उनके ही कहने पर तो कुछ ही साल पहले उसने एक अच्छे ख़ासे दबंग को ठिकाने लगा दिया था। आज तक थाने में लापता ही दर्ज है। 

भोजू के जाने के बाद वह लगातार उसके एक-एक पल की खोज-ख़बर लेने में लग गए। लेकिन उन्हें कुछ ख़ास सटीक जानकारी मिल नहीं पा रही थी। उन्हें जितनी असफलता मिल रही थी उनकी बेचैनी उतनी ही ज़्यादा बढ़ती जा रही थी। वह यहाँ तक पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि भोजू आलाकमान तक पहुँचने की कोशिश में तो नहीं है। वह इसलिए भी ज़्यादा डर रहे थे कि उन्होंने कई बार बातचीत, खाने-पीने के दौरान आलाकमान की कटु आलोचना तो की ही थी, साथ ही गालियाँ भी ख़ूब बकी थीं।     

सोच-सोच कर बेचैन होते रहे कि कहीं भोजू वह सब रिकॉर्ड तो नहीं कर ले गया है। आलाकमान के सामने रख दिया तो एक झटके में पार्टी से निकाल बाहर कर दिया जाऊँगा। बेचैनी, चिंता, खोजबीन, ट्रक ड्राइवर ना साध पाने से वह दस दिनों में ही एकदम अकुला उठे। कई-कई पैग पीने के बाद भी उनको नींद नहीं आ रही थी। सच में उन्हें पहली बार पता चला कि वह कितने पानी में हैं। उनके मन में कई बार यह बात आयी कि ग़ुस्सा शांत होने पर भोजू वापस आ जाएगा। मगर दिन पर दिन बीतते गए लेकिन उसकी छाया भी नहीं पलटी। वह उनसे कोसों दूर चली गई।

- क्रमशः

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