नौ तेरह बाईस

01-08-2021

नौ तेरह बाईस

दीपक शर्मा

“मैं निझावन बोल रहा हूँ, सर” मेरे मोबाइल के दूसरी तरफ़ मेरे बॉस हैं, मेरे ज़िले के एस.पी.। अपनी आई.पी.एस. के अंतर्गत। जबकि मेरी प्रदेशीय पुलिस सेवा में मेरी तैनाती यहाँ के चौक क्षेत्र में सर्कल ऑफ़िसर के रूप में कर रखी है। अभी कोई तीन माह पूर्व।

“एनी इमरजेंसी?” राजधानी से बॉस आज सुबह लौटे हैं और इस समय ज़रूर अपनी शृंगार-मेज पर अपने प्रसाधन के मध्य में हैं।

“यस सर। मेरे सर्कल के नवाब टोला की वारदात है। कल शाम स्पोर्ट्स कॉलेज की कोई लेक्चरर आग में झुलस कर मर गई थी, सर।”

“नवाब टोला कहाँ पड़ेगा?” वे अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हैं। दूसरों को गोल-गोल घुमा कर उन्हें फिर नौ-तेरह बाईस बताने में उनका कोई सानी नहीं।

“मेरे थाने की दिशा से वह धक्कम-धक्के वाले एक चूड़ी बाज़ार का अंतिम छोर है सर, और आपके बँगले की दिशा से बड़े चौराहे की एक तिरछी काट।” 

हमारे ज़िले में बड़ा चौराहा एक ही है। जहाँ पहुँचकर सीधी और दो घुमावदार सड़कें अपने फलक उसके हवाले कर देती हैं। 

“रिहायशी क्षेत्र है? मुस्लिम बाहुल्य?”

“यस सर। चौदह मकान हिंदुओं के हैं और पच्चीस मुस्लिमों के।”

“मरने वाली मुस्लिम थी?”

“नहीं सर, वह हिंदू थी। आशा क्वात्रा। उम्र 26 साल।”

“हैंग लूज़। परवाह न करो।”

अंग्रेज़ी भाषा और अमरीकन स्लैंग का बॉस को चस्का है, तिस पर उनकी ख़ूबी यह है, वे स्लैंग उच्चरित करते ही उसकी हिंदी भी साथ ही जोड़ देते हैं। मुझ जैसे ‘देसी’ जन की सुविधा के लिए।

“यस सर” मेरी आवाज़ में सलामी है। अपनी रणनीति के निश्चय-अनिश्चय के बीच मैं व्यवहार-कुशलता की ओट में जा खड़ा होता हूँ, “लेकिन सर, मृतका के पिता मेरे दफ़्तर में बैठे हैं और एक एफ़.आई.आर. दर्ज करवाना चाहते हैं। उनके दुस्साहस पर मैं स्वयं बहुत हैरान हूँ, सर। उनके आरोप की असंभावना . . . ”

“हैंग आउट। भेद खोल दो,” वे धैर्य खो रहे हैं।

“वे आपको अपनी बेटी की मृत्यु का कारण ठहरा रहे हैं, सर . . . ”

“होल्ड एवरीथिंग। प्रतीक्षा करो। मैं पहुँच रहा हूँ . . . ।”

“यस, सर . . . ”

विभाग में बॉस की अच्छी धाक है। बावजूद इसके कि वे सप्ताह में तीन दिन राजधानी में बिताते हैं और बाक़ी चार दिन की लगभग प्रत्येक संध्या देर रात की पार्टीबाज़ी में। उनके ससुर प्रदेश पुलिस के एक महकमे के डायरेक्टर जनरल हैं और सभी जानते हैं यह सीढ़ी उन्हें बहुत ऊपर ले जाने वाली है।

बॉस को मैं नहीं बताता मृतका के पिता अपने रूसी वुल्फ़हाउंड के लापता होने की एफ़.आई.आर. में भी बॉस को नामज़द करना चाहते हैं– ‘बुर्के वाली जिस टहलनी की आपको तलाश है वह और कोई नहीं, आपका यह एस.पी. है क्योंकि हमारे उस बौलजौए से भी उस दुष्ट ने हेल-मेल कर रखा था।’ 

असल में मृतक के पड़ोसियों द्वारा वारदात की सूचना मिलने पर जब मैं अपने दल के साथ वहाँ पहुँचा था तो उन्हीं में से कुछ लोग बारंबार एक ही बार दोहराए रहे, दोपहर में उन्होंने मृतका के कुत्ते को बुर्के वाली उसी टहलिन के साथ मकान से बाहर निकलते हुए देखा था जिसे वे अक़्सर उस कुत्ते के साथ आते-जाते हुए देखा करते। वह तो जब शाम होते-होते मृतका के मकान से उठ रहे धुएँ का आयाम अप्रत्याशित रूप ग्रहण करने लगा था और मकान के दरवाज़े की घंटी बजाने पर, जवाब में, दूसरे दिनों की तरह न तो उन्हें कुत्ते की भौंक सुनाई दी थी और ना ही अंदर से मृतका की कोई आहट, तभी उन्हें ध्यान आया रहा, बुर्के वाली टहलिन मृतका के कुत्ते के साथ नवाब टोले पर लौटी ही न थी। तिस पर जब दरवाज़ा देर तक घंटी बजाने पर भी खोला नहीं गया तो उन्हें फ़ायर ब्रिगेड और पुलिस बुलाने की ज़रूरत महसूस हुई रही। और जब तक हम पहुँचे, लड़की मर चुकी थी। अस्पताल ले जाए जाने पर डॉक्टर बोले थे, "ब्रॉट डैड।”

अपने बाथरूम के एकांत से मैं अपनी मेज़ पर लौट आता हूँ।

एफ़.आई.आर. का रजिस्टर खोलता हूँ, उसकी पेंसिल अपने हाथ में लेता हूँ और अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठे हुए मृतका के पिता, चंद्रमोहन क्वात्रा से पूछता हूँ, “आपकी बेटी हमारे एस.पी. साहब को कब से जानती थी?”

बॉस के आने तक मुझे उन्हें बातों में उलझाए रखना है। बिना कुछ दर्ज किए।

“मेरे लिए यह अत्यंत लज्जा का विषय है और मैंने उनसे नाता भी तोड़ रखा था किंतु उसकी मृत्यु ने मुझे फिर उससे ला जोड़ा है . . . ” तना हुआ उनका चेहरा एकदम ढीला पड़ जाता है। उठी हुई ठुडी नीचे गर्दन पर गिर जाती है और वह फूट-फूटकर रोने लगते हैं; बीच-बीच में अपने विलाप भरे वाक्य जोड़ते हुए—’वह सबसे ज्यादा मेधावी थी . . . , सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत . . . ’ कुल जमा तेईस वर्ष की आयु में उसने इतने बड़े स्पोर्ट्स कॉलेज में अध्यापकी पा ली थी . . . , वॉर्डनशिप पा ली थी . . . ,

“वार्डनशिप!” मैं चौंकता हूँ, “लेकिन आपकी बेटी तो हमारे चौक क्षेत्र के इस नवाब टोले में पिछले साल ही से एक किराए के मकान में रह रही थी . . . ”

स्पोर्ट्स कॉलेज दूसरे ख़ाना क्षेत्र में पड़ता है।

“हमारा दुर्भाग्य। जो वह वार्डनशिप उसके हाथ से निकल गई . . . ” उनका कोप उनके चेहरे पर लौट रहा है, शोकाकुलता को मिटाता हुआ . . . 

“कैसे?” मैं पूछता हूँ।

“डेढ़ वर्ष पहले स्पोर्ट्स कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल की एक छात्रा की आकस्मिक प्रसूति के कारण हुई मृत्यु पर भयंकर बखेड़ा खड़ा हो गया था। आशा की जवाबदेही शंका के घेरे में आ गई थी। तिस पर पुलिस के हस्तक्षेप ने मामला और पेचीदा बना दिया था। तभी तो इस दुष्ट एस.पी. से मेरी अभागी बेटी की भेंट हुई रही . . . ।”

"आपके परिवार में और कौन-कौन हैं?"

"मेरी पत्नी है। दो बेटियाँ हैं।"

"वे क्या करती हैं?"

"मेरी पत्नी एक स्कूल में गेम्स टीचर हैं। बड़ी बेटी लखनऊ के एक बी.पी.एड. सेंट्रल स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर। आशा हमारी मछली थी,” एक पल के लिए उनका गला भर आया है किंतु अगले ही पल वे अपने को सँभाल ले जाते हैं।

“एक ही परिवार में इतने स्पोर्ट्स परसंस!” अपना परिचय देते समय में मुझे बता चुके हैं कि वे स्वयं उधर अपने कस्बापुर के फिजिकल ट्रेनिंग कॉलेज में अध्यापक हैं, "एक ही परिवार में इतने अध्यापक!”

प्रभावित होने का भाव मैं अपने चेहरे पर ले आता हूँ। शायद मैं उनसे प्रभावित हो भी पा रहा हूँ। उनकी आयु पचपन और अट्ठावन के बीच कुछ भी हो सकती है। किंतु उनकी देह का गठन अभी भी ख़ूब कसरती है, बलिष्ठ है। उनके दिखाव-बनाव में कहीं विपुलता नहीं, कहीं अप्राकृतिकता नहीं। आधे से अधिक सफ़ेद हो चुके अपने बालों पर उन्होंने किसी ख़िज़ाब की परत नहीं डाल रखी। पुरानी काट का वे एक साधारण सफ़ारी सूट पहने हैं। उनके चश्मे का फ़्रेम भी पुराना है। किंतु प्रियदर्शी उनके चेहरे पर एक उज्जवलता है, एक गरिमा है। यह अनुमान लगाना कठिन नहीं, उनका अनुशासन स्वगृहीत एवं स्वतः पूर्ण है। तभी वह दूसरों से भी उसकी अपेक्षा रखते हैं।

“लेकिन सभी ठगे गए। दो बार ठगे गए। पहली बार जब उस दुष्ट के विहार को हम आँखें मूँदकर प्रेम समझ बैठे और हमारी आँखें तब खुलीं जब हमने उसके विवाह के फोटो समाचार-पत्रों में छपे देखे। और दूसरी बार जब आशा के डिप्रेशन के उपचार के अंतर्गत उसके डॉक्टर ने हमें इस बेगाने शहर में उसकी स्पोर्ट्स कॉलेज वाली नौकरी नहीं छुड़वाने दी, यह तर्क देकर कि आशा को यह नौकरी व्यस्त रखेगी और रही उस दुष्ट की बात तो वह अपने ससुर के भय से स्वयं ही आशा से दूरी बनाए रखेगा। और जब तक हमने जाना दुष्ट ने आशा पर अपने पूर्वाधिकार का लाभ उठाकर उसे पुनः वशीभूत कर लिया है, मूर्खा औचित्य-अनुचित की सीमा लाँघ चुकी थी . . . ”

“और आपने उन्हें अपने स्नेह से वंचित कर दिया? नवाब टोला के उनके पड़ोसी बता रहे थे वह उन्हें हमेशा अकेली ही दिखाई दिया करती थीं। बुर्के वाली उस टहलिन के अतिरिक्त उनके मकान में किसी का भी आवागमन न रहा . . . ”

“हम उससे रूठे रहे, अड़े रहे कि हमें मनाना चाहती है तो उस दुष्ट को छोड़ आओ। फिर उसकी रखवाली के लिए बौरजो तो रखा ही रहा . . . ”

“उनके पड़ोसी बता रहे थे वह कुत्ता कम और भेड़िया ज़्यादा मालूम देता था . . . ”

“असली नस्ल का बौरजो था। मेरी सास उसकी तीनों पीढ़ी के सायर और डैम ब्रीडरर्स को जानती रहीं। संयोगवश यह बौरजो तब पैदा हुआ था जिन दिनों आशा अपने डिप्रेशन के उपचार हेतु हमारे पास कस्बापुर में थी और घर पर ही रहती थी। ऐसे में नन्हें बौरजो की देखभाल उसी के ज़िम्मे ज़्यादा रही और बौरजो भी उसी के संकेत पर सर्वाधिक फ़ुर्ती और उछाल ग्रहण करता था। फिर जब आशा इधर अपनी ड्यूटी पर लौटी तो हमने वह रखवाल दूत उसके संग इधर भेज दिया। और भेद की एक बात बताऊँ?”

“ज़रूर बताइए क्योंकि मेरे पास भी आपको बताने के लिए भेद की एक बात है,” मैं कहता हूँ।

“तो तुम ही पहले बताओ . . . ”

बेटी की मृत्यु से उनका ध्यान हटाने की ख़ातिर मैं उनकी बात मान लेता हूँ, “मेरे पिता आज जीवित नहीं किंतु आपको देखकर आज उनकी याद ज़रूर ताज़ा हो गई। आज यदि वह जीवित होते तो लगभग आप ही की आयु के होते और आप ही जैसे दिखाई देते . . . ”

मेरे भेद में सच घुला है।

“तुम्हारे पिता नहीं हैं?” वे मेरी ओर स्नेह से देख रहे हैं।

“नहीं है नौ वर्ष पहले मैंने उन्हें एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था . . . ”

ऐसा लगता है वे मेरी आँखों में अपनी आँखें गड़ा देते हैं, “मेरे परिवार में यदि एक पुत्र ने जन्म लिया होता तो वह ज़रूर तुम्हारे जैसा होता . . . ”

उनकी आँखों की ज्वाला मेरी आँखों में उतरना चाहती है। किंतु मेरे मन में एक अनजाना सागर उमड़ने लगा है। मैं नहीं जानता, इसे मेरे पिता की स्मृतियाँ मेरे समीप लाई हैं या फिर चंद्रमोहन क्वात्रा कि ये अपेक्षाएँ-आशाएँ जो बॉस के यहाँ पहुँचने पर अभी धराशायी होने जा रही हैं। बाहर बज रहा मोटरगाड़ी का सायरन उनके आगमन की सूचना है। मुझे उनका बाहर जाकर स्वागत करना होगा। अपनी कुर्सी से मैं उठ खड़ा हुआ हूँ।

अपनी गाड़ी से बॉस एक राजा की भाँति उतरते हैं।

अपने फ़ुल फ़ॉर्म में अपनी वर्दी में रिवाल्वर से लैस, पूर्ण सज्जित एवं प्रसाधन-युक्त। उनसे पहले उनका तीखा ‘आफ़्टशेव’ मेरी दिशा में आ लपकता है

“कैसे हो निझावन?” वे मुझे मेरे ‘सरनेम’ ही से पुकारते हैं। बिना मेरा पहला नाम अशोक उसमें जोड़ें। अपनी सत्ता की विज्ञप्ति निमित्त भी और उस संयोग के निमित्त भी, जिसके अंतर्गत उनके ‘सरनेम’ कुलश्रेष्ठ, से पहले अशोक ही लगता है।

“सर,” मैं अपनी आज्ञाहीनता दर्ज करता हूँ।

अपने फ़ॉलोअर्स और गनर को बॉस वहीं रुके रहने का संकेत देते हैं और मेरे साथ आगे बढ़ लेते हैं।

“बुढ़ऊ अभी भी अंदर है क्या?” वह आवेशित हैं।

“यस, सर . . . ”

“आई टेल यू, निझावन, यू गिव एन इंच टू दीज़ मिडल क्लास पीपल एंड दे विल टेक अ होल माइल। मैं बता रहा हूँ, निझावन, इन मध्यवर्गीय लोगों को आप एक इंच भी देते हैं तो वे एक पूरा मील जीत ले जाना चाहते हैं . . . ”

“यस, सर . . . ”

“कहिए?” बॉस मेरे कमरे में दाखिल होते हैं।

अपने धूप के चश्मे को आँखों पर चढ़ाए-चढ़ाए।

उन्हें सामने पाकर चंद्रमोहन क्वात्रा अचरज से मेरा मुँह ताकते हैं, “तुमने इसे यहाँ बुलाया है?”

“आप भूल रहे हैं इस ज़िले का मैं कप्तान हूँ और मेरा कोई भी सी.ओ. मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। क्यों निझावन?”

“सर!” मैं अपना सिर झुकाता हूँ। प्रोटोकॉल के अधीन।

चंद्रमोहन क्वात्रा अपनी कुर्सी पर ज्यों के त्यों बैठे रहते हैं। बॉस के सम्मान में खड़े होने की चेष्टा तक नहीं करते।

बॉस के लिए शायद यह नई बात नहीं है। वे इसे सहज स्वीकार कर रहे हैं, मानो चंद्रमोहन क्वात्रा की आदत रही हो और बॉस उनकी इस आदत के अभ्यस्त हों।

“आप सीधे मेरे पास क्यों नहीं आए?” सुबह प्रेरक मुद्रा में बॉस मेरी कुर्सी पर जा बैठे हैं।

उनकी तरफ़ से अपने बैठने का कोई संकेत न पाकर मैं उनकी बग़ल में खड़ा रहता हूँ।

“तुम्हारे पास आता तो क्या तुम बौरजो मुझे सौंप देते? या फिर स्वीकार कर लेते, उसे भी तुमने आशा की तरह ख़त्म कर डाला है?” चंद्रमोहन क्वात्रा तन लिए हैं।

“यू आर इन अ टिज़्ज़ी। आपका चित्त अव्यवस्थित है . . . ”

“चित्त तो तुम्हारा भी व्यवस्थित नहीं रह पाएगा जब नवाब टोला के रहने वालों के सामने तुम्हें बुर्का पहना कर चलने पर मजबूर किया जाएगा और वे कहेंगे– हाँ, हाँ। यह ठेलमठेल और यह डील-डौल पहचान रहे हैं। यही वह बुर्के वाली है जिसने आशा क्वात्रा के कुत्ते को अगवा किया है . . . ”

“क्लैम अप। चुप रहो।”

“मैं चुप नहीं रह सकता। चुप नहीं रहूँगा . . . ”

“आप शायद जानते नहीं नवाब टोला में आधी से ज़्यादा स्त्रियाँ बुर्का पहनती हैं और . . . ”

“आप नहीं जानते, यहाँ के सिविल अस्पताल में मेरे एक विद्यार्थी की बहन डॉक्टर है जो मुझे आप लोगों की पूरी ख़बर भेजा करती थी। उसे मालूम है आशा को तुमसे गर्भ ठहर गया था और वह भ्रूण की डी.एन.ए. रिपोर्ट भी तैयार करवाएगी..."

"डू अ डबल -टेक। दोबारा विचार कीजिए। आशा नाबालिग नहीं थी। बेपढ़ नहीं थी। उसका गर्भ उसके यौनसुख का फल था, किसी बलात्कार का नतीजा नहीं। आइ टेल यू शी हेड ए बैड क्रश ऑन मी। मैं आपको बता रहा हूँ वह मुझ पर बुरी तरह रीझी रही . . . ”

“और बदले में तुमने उसे जला डाला?” चंद्रमोहन क्वात्रा के चेहरे की सभी मांसपेशियाँ और हड्डियाँ हरकत में आ रही हैं। उनकी भौंहें उनके माथे की त्यौरियाँ छूने लगी हैं। फूले हुए उनके नथुने उनके गालों पर मुड़क लिए हैं। दाँत एक-दूसरे पर मसमसा रहे हैं और जबड़ा ऊपर-नीचे उतर रहा है। उनकी ठुड्डी और गर्दन की झुर्रियाँ और लकीरों को उभारता हुआ।

“आई हैव हैड बैलीफ़ुल ऑव योर बैलीएकिंग। शिकायत करने की आपकी आदत से मैं तंग आ गया हूँ,” बॉस के स्वर में अहंकार भरी खीज है, "सच आप मुझसे सुनिए। नवाब टोला वाले गवाह हैं इधर कुछ दिनों से उसके घर से उसके कुत्ते की भौंक के साथ कुछ न कुछ जलने की बदबू उन्हें बराबर आया करती थी। कभी कपड़ा, कभी चमड़ा, कभी प्लास्टिक, कभी पॉलीथिन। उनके पूछने पर अव्वल तो पहले वह दरवाज़ा खोलती ही नहीं और जब खोलती तो कभी बोलती, मैं फल और सब्ज़ियों के छिलके जला रही हूँ, कभी बोलती मैं अपने पुराने कपड़े जला रही हूँ, कभी बोलती मैं अपने पुराने जूते जला रही हूँ। उसी झक में परसों उसने अपने आप को जला डाला है। यह सीधा-सादा एक आत्महत्या का केस है।”

बिना कोई चेतावनी दिए चंद्रमोहन क्वात्रा गोली की गति से अपनी कुर्सी से उठते हैं और मेज़ की दूसरी तरफ़ बैठे बॉस पर झपट लेते हैं।

अप्रत्याशित इस आक्रमण की प्रतिवर्ती क्रिया में बॉस गिर रहे अपने धूप के चश्मे को सँभालने की बजाय अपने हाथ अपने रिवाल्वर की दिशा में बढ़ा रहे हैं।

उन्हें रोकने के लिए मैं मेज़ पर रखी अपनी घंटी टनटनाता आता हूँ। पूरे ज़ोर के साथ।

चंद्रमोहन क्वात्रा छिटककर बॉस से अलग हो लेते हैं।

“हुज़ूर! हुज़ूर! हुज़ूर!”

थाने में जमा सभी पुलिस-बूट मेरे कमरे में पहुँच रहे हैं। सलामी देकर ‘सावधान’ की मुद्रा में बॉस से अपने आदेश लेने हेतु।

लेकिन बॉस उन्हें कोई आदेश नहीं दे रहे। वे चुप हैं। चतुर हैं जो अपनी सार्वजनिक छवि जोखिम में नहीं डाल रहे।

मैं उनके समीप पहुँचता हूँ और ज़मीन पर गिरा उनका धूप का चश्मा उठाकर मेज़ पर टिका देता हूँ। तत्काल वे उसे मेज़ से उठाकर अपनी आँखों पर चढ़ा लेते हैं और वापस मेरी कुर्सी पर बैठ जाते हैं।

चंद्रमोहन क्वात्रा अब सुरक्षित है।

“आइए,” मैं उनकी पीठ घेर लेता हूँ, “मैं आपके साथ बाहर चलता हूँ . . . ”

“मुझे रास्ता मालूम है।” वह मेरा हाथ पछाड़ देते हैं, “मुझे सभी रास्ते मालूम हैं और मैं अपनी लड़ाई जारी रखूँगा। और मुझे ख़ुशी है तुम मेरे पुत्र नहीं हो . . . ”

बढ़ रहे पुलिस गुटों के बीच में अपना रास्ता बनाते हैं और हमारी आँखों से ओझल हो लेते हैं।

“व्हाट एन इंफ्रा डिग टू कम्युनिकेट विद एन एक्स डबल-माइनस! ऐसी नीच और दोहरी मंनफी से कुछ कहना-सुनना प्रतिष्ठा के एकदम विरुद्ध है!”

“यस सर,” मेरे कमरे में जमा सभी अधीनस्थ कर्मचारी समवेत स्वर में अपनी जी-हुज़ूरियाँ प्रदर्शित करते हैं। 

मेरे अतिरिक्त। 

मुझे काठ मार गया है।
 

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