नहीं अब ओंठ हिलते हैं नहीं आवाज़ होती है

31-07-2007

नहीं अब ओंठ हिलते हैं नहीं आवाज़ होती है

राजनन्दन सिंह

नहीं अब ओठ हिलते हैं 
नहीं आवाज़ होती है
उँगुलियाँ बातें करती हैं 
दिल कि बात होती है

महीनों देखा करते थे जहाँ 
हम डाकिये की राह
वहाँ अब डाक लहरों से 
पल-पल की बात होती है

हम कितनी दूर बैठे हैं 
नहीं मतलब इन बातों का
हवा में बोलते हैं हम 
हवा में बात होती है

 

महज़ कुछ बटनों से जुड़कर 
दुनिया दिखती है पर्दे पर
अपनों को देखते हैं हम 
अपनों से बात होती है

 

कबूतर से कंप्यूटर तक
पहुँचा ये सिलसिला कैसे
कहाँ किसको फ़ुर्सत है- 
सोचें कैसे बात होती है

 

छुप-छुप के काग़ज़ पर लिखना 
किताबों में चिट्ठी मिलना
ये कब की बात है नन्दन 
और ये क्या बात होती है

 

नहीं अब ओंठ हिलते हैं 
नहीं आवाज़ होती है
उँगुलियाँ बातें करती हैं 
दिल कि बात होती है

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