मूल से ब्याज 

01-09-2019

रामदीन ने पूरे डेढ़ बजे दोपहर का खाना खाने के लिए बिंदिया से ठण्डे पानी की बोतल माँगी ताकि वे तीनों आराम से खाना खा सकें। वैसे तो आठ से एक बजे तक काम करने के बाद एक घंटा खाने की ब्रेक लेने की बात हुई थी, पर रामदीन की आदत थी कि वह हाथ का काम निपटाए बिना मज़दूरों को भी कहाँ रोटी खाने को फ़्री करता था। उसमें आधा घंटा-पन्द्रह मिनट आगे-पीछे की चिंता नहीं करता था वह। चिंता उसे यही होती कि उसकी तरफ़ से मालिक का बेवज़ह नुक़सान न हो। 

तीन कामगार थे वे। एक राजमिस्त्री रामदीन और दो मज़दूर। घर के पिछवाड़े लगे आम के पेड़ से उस दिन छः-सात पके आम टपके थे। उन्हीं में से बिंदिया ने पानी के साथ तीन आम भी उन्हें खाने को दिए। मज़दूरों ने खाने के बाद अपने-अपने आम खा लिए पर रामदीन ने अपना रोटी का डिब्बा धोकर उसमें सहेज कर रख दिया। 

काम दो दिन का था। 

अगले दिन दोपहर के खाने के समय पानी की ठण्डी बोतल देने जब बिंदिया आई, रामदीन ने कहा, "बीबी जी! कल जो आम आप हमका दीन, सो हम अपनी नातिन को खाव को दियो। बहूतई खुस होइ गई ऊ।" 

बिंदिया ने पूछा, "तुमने कल वो आम नहीं खाया।"

"नाहीं!" रामदीन ने चहकती-सी वाणी में कहा, "हम रोजेहि मुनियाँ तईं टॉफी ले जात। कल आप ताज़ा आम दीन तबहि हम मुनिया हेत रख दीन। बहुत खुस हुई आम देखि। बहुत रस लेइ-लेइ खाई।"

"अरे रामदीन! वो आम तुम खा लेते। मुझे कहते मैं उसके लिए अलग से दे देती।"

"अरे नाहीं बीबी जी! हमें अपनी नातिन को खिला कर बहुते भला लगत ह्वै।" 

बिंदिया समझ गई रामदीन की मनोदशा और उसके मन में कौंध गई अपनी दादी-नानी की कहावत;  'मूल से ब्याज प्यारा होता है', वह अंदर गई और चार आम लेकर आई एक-एक आम दोनों मज़दूरों को दे कर दो रामदीन को पकड़ाते हुए बोली, "एक आम तुम भी खाओ रामदीन, बहुत रसीला आम है और एक ये बड़े वाला आम मुनिया के लिए रख लो।"  

कह कर तो अन्दर आ गई वह। एक धुक-धुक लगी रही। कहीं यह दोनों आम मुनिया के लिए ही न ले जाए, न जाने ख़ुद खायेगा कि नहीं। बैड पर बैठे उसका मन किया खिड़की का पर्दा हटा कर देखे कि रामदीन आम खा रहा है कि नहीं; पर उसे लगा कि ऐसा करते हुए वे उसे न देख लें। अभी पके आम टपकते ही कम हैं नहीं तो तीन-चार दे देती। 

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