अपने हिस्से की ज़िंदगी में
गुज़रना चाहता हूँ
अनचाहे रिश्तों से
मानवीय अभिलाषाओं से
बचकर,
मैं मुक्त होना चाहता हूँ
अनचाही तृष्णा से
अनचाहे ख़्यालों से
ज़मीं के आश्चर्य से
उसके हृदय से
बहुत दूर उड़ना चाहता हूँ
सचमुच
मैं मुक्त होना चाहता हूँ
कहीं कुछ बचा न हो
इन सबसे
मैं होकर गुज़रना चाहता हूँ
मुझे नहीं पता
मुक्त कैसे हुआ जाता है
मुक्ति कैसे होगी
क्योंकि मेरी मुक्ति भी
एक अप्रसंग है।
जहाँ से मैं
भावार्थ निकलना चाहता हूँ
हाँ मैं मुक्त होना चाहता हूँ
क्योंकि मेरे अर्थ का
कोई दोष रहित औचित्य नहीं
कोई प्रतिक्रिया नहीं।

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