कुंठा का रूप धारण कर चुके, दुखों के विशाल समूह को हृदय में छिपाए ‘लीलावती’ नाम की मोचिन ग्राहक के जूते पर पॉलिश करने में व्यस्त थी। उसकी तल्लीनता, कार्य के प्रति उसकी रुचि को दर्शा रही थी। जूते पर रगड़ने वाले ब्रश से भी कहीं किसी आलस या अन्य मनस का आभास नहीं होता था। रगड़ के साथ ही जूता शीशे के समान चमकता भी जा रहा था। 

पर वास्तविकता कुछ और थी। कार्य को उसने कभी पूजा नहीं समझा, केवल ढोया था। कुछ मजबूरियों और पेट के भरण-पोषण के लिए ही उसे मोचिन बनना पड़ा। 

फिर भी जब कभी कोई ग्राहक उसके ठिए पर पॉलिश या जूते-चप्पलों की मरम्मत कराने रुकता तो वह पूरी तल्लीनता से अपना काम करती। ग्राहक को कभी महसूस नहीं होने देती कि कार्य में उसकी निष्ठा नहीं।

उसका ठिया, जिसे वह अपनी दुकान कहती थी, मस्जिद की वर्षों से बन्द पड़ी अकेली दुकान की सबील पर था। सबील के नीचे से नाली बहती, जिससे होकर शहर का गन्दा पानी गुज़रा करता।

जब भी कोई ग्राहक उसके ठिए पर रुका, शायद ही कभी असंतुष्ट हुआ हो। पर उसे बूढ़ी और कमज़ोर दृष्टि वाली समझकर लोग वहाँ कम ही ठहरते। उन्हें सदैव शंका रहती, ‘फाँट छोड़ देगी। उसकी पॉलिश एक दिन से ज़्यादा नहीं चलेगी। जूता-चप्पल ख़राब कर देगी, आदि-आदि।’ लेकिन वह जितना भी कार्य करती मेहनत और लगन से करती। भले ही दो-चार मिनट अधिक लग जाएँ। जिसे हम ‘तसल्ली बख्स काम’ कहते हैं वह उसके यहाँ होता था। 

अब भी वह अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा और लगन के साथ अंतिम रूप प्रदान करने में व्यस्त थी। इस व्यस्तता ने उसे स्वयं के कष्टों और संसार की भागमभाग से कुछ समय के लिए अनभिज्ञ-सा तो कर दिया था, परन्तु पूर्णत: छुटकारा नहीं दिलाया था। उसके हृदय में तड़प थी, कसक थी, लेकिन किसी ज्वालामुखी के समान शान्त थी। उसके सीने में वेदनाओं का सैलाब दफ़न था। जो कभी-कभी अनुकूल वातावरण मिलने पर उसे उद्वेलित भी करता था। 

आज के व्यस्ततापूर्ण और आपाधापी वाले वातावरण में किसी के पास इतना समय कहाँ था कि उस ग़रीब-बूढ़ी मोचिन पर एक सरसरी दृष्टि ही डाल सके। केवल वही व्यक्ति मस्जिद की वीरान दुकान की सबील या चबूतरे पर ठहरता जो जूते-चप्पलों पर पॉलिश या उनकी मरम्मत कराने के उद्देश्य से घर से निकला हो। फिर किसी को पड़ी भी क्या थी, जो उस मोचिन का कुशल क्षेम पूछता। वो किसी की सगी सम्बन्धी थोड़े ही थी, जो उससे सहानुभूति दिखाता। उस छोटे से शहर में, जिसमे वह पिछले पाँच वर्षों से लोगों की सेवा कर रही थी, किसी के पास भी इतना समय नहीं था जो उसकी करुण कहानी सुनकर उसे तनिक सी सांत्वना दे सके। कह सके, ‘नहीं, नहीं सब ठीक हो जाएगा। भगवान ग़रीब की भी सुनता है। थोड़ा और धैर्य रखो, तुम्हे मुआवज़े की रक़म अब अवश्य मिल जाएगी। नई सरकार सत्ता में आ गई है। जिसने घोषणा की है, ग़रीबों को उनका हक़ मिलेगा। सबकी सुनवाई होगी। सरकार प्रयासरत है और वचनबद्ध भी।’

लीलावती ने लुभाव और गाल बजाऊ भाषण बहुत सुने थे, जो आकर्षक तो थे पर अन्दर से बिलकुल खोखले थे। वह भाली-भाँती समझ गई थी कि किस प्रकार नेतारामों ने भोली-भाली जनता को ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ दिखाकर बड़े-बड़े ओहदों की कुर्सियाँ कब्ज़ा लीं थीं।

कुंठित होकर लीलावती ने लोगों (जिस किसी को भी वह अधिकारी या बड़े ओहदों वाला समझती थी) के सामने घिघयाना छोड़ दिया था। पहले जब वह लोगों के सामने अपना दुखड़ा रोया करती तो उसे सतही ढाढ़स और दिखावटी दिलासे के कुछ न मिलता था।

अब तो उस हताश-निराश के आँसू तक सूख गए थे। उसका दुःख इस पराकाष्ठा पर पहुँच गया था कि उसने मौनव्रत सा धारण कर लिया था। मुख से केवल इतने ही शब्द बाहर आते, जितनों से काम न चलता। उसकी मलिन वेशभूषा, समय से पहले पके बालों, चेहरे पर पड़ी झुर्रियों, स्वर की गम्भीरता, फीकी पड़ चुकी आँखों की चमक और थके शरीर को देखकर निश्चित रूप से अनुमान लगाया जा सकता था कि वो कष्टों का भार सा उठाए है...। 

अपने कार्य की व्यस्तता में तल्लीन, लीलावती ने पहले ग्राहक के जूते की मरम्मत व पॉलिश का कार्य अभी समाप्त भी नहीं किया था कि एक दस वर्ष के बच्चे ने जूता आगे बढ़ाकर पूछा, “अम्मा, इस पर टुक्की लगाने का क्या लोगी? ये जूता थोड़ा फट गया है।”

लीलावती ने गर्दन उठाकर उस बच्चे की ओर देखा। और जूते के फटे स्थान को ऊँगली से उकेरकर ध्यान से देखा, घुमा-फिराकर निरिक्षण करते हुए बोली, “दस रुपये लगेंगे।” बच्चा लीलावती के उत्तर से संतुष्ट दिखाई दिया और वहीँ सावधान की स्थिति में खड़ा हो गया। लीलावती ने पहले ग्राहक के जूते की मरम्मत आदि का कार्य समाप्त कर जूता आगे बढ़ाया, “बाबूजी गठाई और पॉलिश के मिलाकर पच्चीस रुपये हो गए।”

ग्राहक ने मोचिन के कार्य पर अच्छी-बुरी कोई भी प्रतिक्रिया किए बिना अपनी जेब में हाथ डाला, “अम्मा, इस समय खुल्ले बीस हैं, पाँच फिर कभी लगा लेना।”
 
लीलावती ने दीनतावश ग्राहक की ओर देखते हुए मरी सी आवाज़ में कहा, “ठीक है।”

बीस का नोट लेकर अपने बैठने के टाट के नीचे रखकर दूसरे ग्राहक - बच्चे का जूता मरम्मत करने को उठा लिया। फिर उसी तल्लीनता से अपने कार्य में जुट गई।

लगभग पाँच वर्ष पहले लीलावती ने उस स्थान पर बैठकर मोचीगिरी का कार्य आरम्भ किया था। उसका वह स्थान ‘अम्बेडकर चौक’ से बीस क़दम दूर था। जहाँ से अम्बेडकर की मूर्ति एक हाथ से सीने पर पुस्तक दबाए, दूसरे हाथ की ऊँगली उसकी ओर ताने हुए थी। उस मूर्ति को देखकर लीलावती को कभी-कभी ऐसा भी लगता था जैसे बाबा अम्बेडकर उसकी ओर हाथ का संकेत कर उसे दुनिया के सामने अपराधिनी सिद्ध कर रहे हों। लेकिन उसे बाबा से कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि उन्होंने दलितों के लिए जो कुछ किया, वह काफ़ी था। दूसरी बात, अब वे मूर्तिमात्र थे। और वह भली-भाँति समझ गई थी, ‘जब हाड़-माँस के चलते-फिरते मनुष्य उसकी कोई सहायता नहीं कर सके, तो मूर्तियों के आगे रोने से क्या लाभ?’

इस समय जब उसकी आयु पैंतालीस के आस-पास थी, वह पैंसठ की दिखने लगी थी। जीवन में मिले कष्टों और दुखों ने उसे झकझोर कर इतना खोखला कर दिया था कि पीठ झुक गई थी, आँखे धँस गईं थी, गाल पिचक गए थे, बाल सन के समान सफ़ेद हो गए थे, हाथ-पैरों की त्वचा सिकुड़कर छुहारे जैसी हो गई थी। दृष्टि इतनी कमज़ोर कि मोटे-मोटे लैंसों का चश्मा लगाना पड़ा। जिसने उसे पूर्णत: वृद्ध दर्शाने में शेष कमी को पूरा कर दिया था।

उसकी जीर्ण-शीर्ण अवस्था को देखकर गाँव के मुस्टंडे उसे दावत, तेरहवीं का प्रतिभोज और चलता-फिरता जनाज़ा भी पुकारने लगे थे। उसे देखते ही आं ........क ...............छिं, आं .........क .......छिं के अशुभ संकेत से चिढ़ाते भी थे। बेचारी लीलावती, लाचारी का घूँट पीकर रह जाती। उस जैसी हकीर-कमज़ोर औरत ऐसे मुस्टंडों का कर भी क्या सकती थी? 

लीलावती ने बच्चे के जूते की मरम्मत का कार्य अभी समाप्त भी नहीं किया था कि उसकी दृष्टि आकाश की और पलायन कर गई। उस समय आकाश में काले-काले साँपों जैसे बादल घिर आए थे। काली घटाएँ दिन को रात में परिवर्तित करती हुई दौड़ी आ रहीं थी। बादलों को देखने मात्र से ही लग रहा था, ‘यदि बरसने लगे तो उथल-पुथल निश्चित है। पता नहीं कितनी घनघोर वर्षा हो।’

वातावरण के ऐसे संकेत से आस-पास के दुकानदारों में एक हलचल सी मच गई। कोई अपना सामान समेटने लगा तो कोई पन्ने फैलाने लगा। किसी ने रेहड़ी और ठेलियाँ सायों के नीचे लगानी आरम्भ कर दीं...। 

सहसा एक मोटी बूँद लीलावती के सिर पर फैले छाते पर गिरी। जिसका कुछ हिस्सा नीचे भी टपका। लीलावती के मुख से आह! की आवाज़ निकली। 

वर्षा, बादलों की भयंकरता के विपरीत रिमझिम में परिवर्तित हो गई। लीलावती ने वर्षा को देखा तो कुछ रोमांचित सी हुई। उसे एक विचित्र सी ख़ुशी का एहसास हुआ और हृदय में छिपी उमंगों पर से आवरण सा हटता दिखाई दिया। भावनाओं ने उद्वेलित किया तो स्मृति में चेतना का संचार-सा हुआ। और अचानक उसे अतीत का कुछ याद आने लगा। 

ठीक ऐसा ही मौसम था, जब उसका पहला मिलन रामलाल से हुआ था। यही मिलन नैनों का नैनों से गोपन व्यापार सिद्ध हुआ। कोई पच्चीस वर्ष पूर्व जब वह अपने पिता के लिए दोपहर का भोजन लेकर आ रही थी, ठीक वैसी ही घटाएँ घिर आयीं थी जैसी मोचिन लीलावती आकाश में देख रही थी। मौसम की भयंकरता के विपरीत नन्ही-नन्ही फुहारें कैसे रिमझिम वर्षा में परिवर्तित हो गईं थी। लीलावती की आँखों के सामने बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व का नज़ारा फिर से जीवंत हो उठा। मन रोमांचित हुआ तो याद आने लगे कुछ अच्छे बीते दिन। कुलाँचे मारने लगी कुछ खट्टी-मीठी यादें। लीलावती को एहसास हुआ उस मिलन का जो हृदय को वर्षों बाद आज भी रोमानी बना रहा था। 

तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के कारण लीलावती के गाँव और शहर के बीच की दूरी समाप्त होती जा रही थी। वह दूरी घटते-घटते अब लगभग पाँच सौ मीटर रह गई थी। गाँव से शहर आने हेतु शिवाले के समीप से रिक्शे मिल जाया करते थे। लेकिन बहुत से लोग दस रुपये का लालच कर पैदल ही शहर चले आते थे। गाँव में यह धारणा आम थी, ‘गाँव वाले का पैसा डॉक्टर और वकील की जेब में बिन मोल-भाव के चला जाता है। और कोई उनकी जेब छू भी नहीं सकता।’ इसलिए अपनी मज़दूरी पूरी न होते देख अधिकांश रिक्शे चालकों ने गाँव-शहर के बीच रिक्शा चलाना छोड़ दिया। कुछ शहर में ही रिक्शा खींचने लगे। एक-दो अभी भी गाँव-शहर के मध्य रिक्शा चलाते थे। प्रात:-साँय जो सवारी मिलती उसे आधे-पौने दामों पर खींचकर चले या आ जाते। अन्यथा दिनभर स्टेशन से शहर में सवारियाँ ढोते।

लीलावती अपने पिता के लिए दोपहर का भोजन लेकर पैदल ही आ रही थी। उसके पिता भी सर पर लकड़ी का बक्सा लादकर पैदल ही आया करते थे। बक्सा मोचीगिरी के सामान से ठसाठस भरा रहता।

अभी आधा ही रास्ता तय हुआ था कि वर्षा आरम्भ हो गई। वर्षा से बचने के लिए एक मात्र सहारा था, बरगद का वह पेड़ जो तय रास्ते के बीच में आता था। बरगद के विशाल टहने और घनी पत्तियाँ वर्षा से बचाने में सक्षम दिखे तो लीलावती ने उसके नीचे शरण ली। वर्षा में भीगकर आनंद उठाने की अपेक्षा खाना बचाना अधिक महत्वपूर्ण था। खाना भीगने से पिता की घुड़की का डर जो था। लीलावती मन ही मन वर्षा का आनंद उठा रही थी। तभी भीगता-भागता एक युवक हाथ में टिफ़िन लिए उसी पेड़ के नीचे रुका। युवक को देखते ही लीलावती मन ही मन सकुचाई सी एक ओट खड़ी हो गई। हृदय ज़ोर से धड़का और उसकी गति तेज़ हो गई। 

लीलावती उन्नीसवाँ वर्ष पार कर चुकी थी। पर दुबली-पतली उसकी काया से आयु अधिक नहीं महसूस होती थी। युवावस्था के संकोच ने उसे शर्मीला तथा समझदार बना दिया था। अत: एक सूने स्थान पर किसी अपरिचित का मिलन मन में भय उत्पन्न करने लगा। वर्षा के कारण रास्ते पर कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था। इसलिए युवक से बात करना तो दूर नज़रें मिलाना भी कठिन लगा। अत: नज़ाकत से भौंहे सिकोड़कर एक ओट खड़ी हो गई।

पर जब दो युवा प्राणी सूने स्थान पर मिलते हैं तो दिल में कुछ-कुछ अवश्य होता है। धड़कने भी तेज़ होती हैं। 

उन दोनों ने जब एक-दूसरे को देखा तो कहना तो बहुत कुछ चाह रहे थे पर एक संकोच था। कुछ क्षण पश्चात ही युवक ने चुप्पी तोड़ डाली। और लीलावती के हाथ में टिफ़िन देखकर बोला, “शायद आप किसी के लिए खाना लेकर जा रही हैं?” लीलावती ने ‘हाँ’ के उत्तर में बिन कुछ बोले ही गर्दन हिला दी। फिर क्या था, बातों का सिलसिला चल निकला। बात हँसी-मज़ाक तक पहुँच गई। संकोची प्रवृत्ति दूर हुई तो लीलवती ने बता दिया, ‘शहर में उसके पिता मोची का काम करते हैं। प्रात: खाना तैयार न हो पाने के कारण उसे पहुँचाना पड़ रहा है। अन्यथा वे प्रात: स्वयं ही खाना साथ लिए आते हैं।’

युवक जिस प्रश्न को काफ़ी समय से हृदय में दबाए था, उसने झिझकते हुए पूछ ही लिया, “तुम्हारे पिता किस स्थान पर बैठते हैं?”

“अम्बेडकर चौक पर, जहाँ मोचियों की पूरी जमात बैठती है।”

युवक ने लीलावती का विवरण जाना तो आश्चर्य से बोल उठा, “क्या वास्तव में? मेरे पिता भी तो उसी स्थान पर बैठते हैं।” 

इसे आश्चर्यजनक संयोग कहा जाए या कोई विचित्र घटना। ईश्वर को जब कोई सम्बन्ध बनवाना होता है तो वैसा ही वातावरण उत्पन्न कर देता है।

उन दोनों के पिता एक ही स्थान पर बैठते थे, दोनों में मित्रता का भाव भी था। दोनों यह भी जानते थे, उनके छोरा-छोरी जवान हैं। उन्होंने एक-दूसरे के लड़का-लड़की को देखा भी था। अत: दोनों ने मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने की योजना बना ली। किसी को तनिक भी एतराज़ नहीं था। फिर क्या था चट मँगनी, पट ब्याह। लीलावती और युवक, जिसका नाम रामलाल था, परिणय सूत्र में बँध गए। अनुकूल समय व्यतीत होता गया और तीन वर्ष बाद लीलावती को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

‘दादा मर गया पोता हो गया, फिर तीन के तीन’ कहावत चरितार्थ होने पर लीलावती के परिवार के सदस्यों की संख्या न बढ़ सकी। लीलावती के पति रामलाल को वसीयत में मिला- दो हिस्सों में बँटा, दो बीघा बंजर-परती ज़मीन का टुकड़ा जिसमे कंवार-बाजरे के सिवा कुछ भी पैदा नहीं होता था। एक कच्चा मकान, जूते गाँठने का पैतृक सामान और कुछ बर्तन, पुराने कपड़े, दो झिंगोले खटिया आदि। 

दो अन्य प्राणियों का भार सर पर पड़ते ही, कुशल गृहस्थ की भाँति रामलाल ने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कठिन परिश्रम करना आरम्भ कर दिया। अन्यथा वह निठल्ला बना दोस्तों के साथ घूमा करता था। बापू के काम में कभी-कभार ही हाथ बँटाता था। एकलौती संतान समझकर उसके पिता इसलिए कुछ नहीं कहते थे कि जब सर पर पड़ेगी, अपने आप काम पर लग जाएगा। और हुआ भी ऐसा ही।

लीलावती और रामलाल अपने प्यारे पुत्र के लालन-पालन में जुट गए जो उनकी आशाओं का एकमात्र सहारा था। सलाह-मशविरा करके नाम रखा नन्दू। जितनी भी आकांक्षाएँ उन्होंने अपने जीवन में पाली थीं, उन्हें अपने पुत्र के माध्यम से पूर्ण करने के इच्छुक थे। अपने सपनों को साकार बनाने के लिए बेटे के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होने देना चाहते थे। दोनों ने दृढ़ संकल्प लिया, ‘बेटे को पढ़ा-लिखाकर अच्छा इन्सान बनाएँगे। चाहे कर्ज़ से लद जाएँ पर पढ़ाई-लिखाई में कमी नहीं होने देंगे। उन संस्कारों से उसे विभूषित करेंगे जो राजकुमारों को मिलते हैं। गाँव का धन्ना सेठ भी नन्दू को देखकर कहे, “वो देखो रामलाल का लाल आ रहा है। गाँव का सबसे होनहार लड़का।” लोग बेटे की तारीफ़ करेंगे तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। निकम्मे लड़कों को उनके माँ-बाप नन्दू की मिसाल दें। अपना क्या है, हम दोनों की तो कट रही है और आगे भी कट जाएगी।’
 
रामलाल और लीलावती ने अन्य संतान की न तो आवश्यकता अनुभव की और न उनके यहाँ अन्य कोई सन्तान उत्पन्न हुई। बच्चे का लालन-पालन ठीक से हुआ तो वह बेल के समान बढ़ने लगा। वे सब गुण उसमें दिखाई दिए जो होनहार बालकों में हुआ करते हैं।

नन्दू को शिक्षित करने के लिए रामलाल ने उसका एक मध्यम दर्जे के स्कूल में प्रवेश कराया। प्रात: अपने साथ ले आता और छुट्टी होने पर घर पहुँचा देता। बच्चे की पढ़ाई का व्यय उठाने हेतु अतिरिक्त आय की आवश्यकता थी। अत: रामलाल ने दुकानदारों से विशेष आर्डर प्राप्त जूते बनाने आरम्भ कर दिए। लीलावती को भी अपने काम में सहभागी बनाया। देर रात तक दोनों ने मिलकर जूते बनाए। एक-एक पैसे का हिसाब रखा। पाई-पाई जोड़ी। अपने अनुचित व्ययों को सीमित किया। बहुत सी इच्छाओं का गला घोटकर पुत्र की प्रत्येक इच्छा पूरी की। कई वर्षों का समय अत्यधिक व्यस्तता में गुज़ारा। तभी जाकर नन्दू की शिक्षा इन्टर तक पूरी हो पाई। विज्ञान विषय की पढ़ाई के पश्चात भी नन्दू को कोई उचित लाभ न मिल पाया। क्योंकि आगे की पढ़ाई के लिए अधिक रुपयों की आवश्यकता थी और उतने रुपये घर में नहीं थे। घर की स्थिति को भाँपकर नन्दू ने नौकरी करने की योजना बनाते हुए बी.एस.एफ़. के लिए अप्लाई कर दिया।

नन्दू ने भी ज्वाइनिंग पाने के लिए अत्यधिक परिश्रम करना आरम्भ किया- भाग-दौड़, कसरत, दण्ड-बैठक आदि जिस-जिस की भी आवश्यकता थी, खूब पेले। पर दुर्भाग्य की बात समस्त टेस्ट क्वालीफ़ाई करने के पश्चात भी उसे मेडिकल में अनफ़िट घोषित कर दिया गया। उस हृष्ट-पुष्ट शरीरधारी के कान में दोष निकाला गया। और एक प्राइवेट हॉस्पिटल का पता देकर उसे एक माह इलाज कराने की सलाह दी गई। लेकिन इसके बाद भी कोई गारेंटी नहीं थी। अत: एक दलाल के माध्यम से किसी बड़े अधिकारी से दो लाख रुपये देखर ज्वाइनिंग दिलाने की बात तय हो गई।

रामलाल और लीलावती इतनी हैसियत वाले कहाँ थे कि किसी को दो लाख रुपये दे पाते। अत: घूँस की समस्या ने उनके सामने सुरसा के समान मुँह बाया। सगे-सम्बन्धी पल्ले झाड़ गए। जिसके सामने भी हाथ फैलाते वही कंगाल बन जाता। अपने दुखड़ों और समस्याओं की कहानियाँ सुनाने लगता। दोस्त कन्नी काटने लगे। देखते ही इधर-उधर खिसकने लगते। मुसीबत में जब साया भी साथ छोड़ने लगा तो रामलाल को याद आयी अपनी दो बीघा ज़मीन की जो व्यर्थ तो थी पर निरर्थक नहीं। ऐसी मुसीबत में जमापूँजी सिद्ध हो सकती थी। पड़ोसी ज़मींदार भी उसे हथियाने के लिए बहुत दिनों से लालायित था। इसलिए वक़्त-ज़रूरत पड़ने पर रामलाल को कर्ज़ देता रहता था। केवल उसी की ट्यूबवेल का पानी उस ज़मीन तक पहुँचता था। 

रुपयों का इंतज़ाम करने के लिए पुश्तैनी ज़मीन को बेचने के अलावा कोई उपाय नहीं था। मन के न चाहते हुए भी रामलाल ने ज़मीन का अँगूठा लगा दिया। सवा लाख में बात तय हो गई। आवश्यकता से अलग घर का सामान, बर्तन इत्यादि बेचकर और अपना घर गिरवी रखकर बाक़ी रुपयों का इंतजाम कर लिया गया। 

सब कुछ चला जाने और कर्ज़ से लद जाने के बावजूद भी रामलाल और लीलावती को संतोष था। दोनों प्रसन्न थे। उमंग और प्रफुल्लता से कहते थे, ‘बेटा सरकारी नौकरी पर चला गया है। हम दोनों दिन-रात कठिन परिश्रम करके अतिरिक्त आय प्राप्त करेंगे। तीनों की कमाई से कुछ ही समय में समस्त धन ब्याज सहित चुकता हो जाएगा। पैसे का क्या है? हाथ का मैल ही तो है, जितना चाहे बढ़ा लो। लड़के की सरकारी नौकरी हो जाएगी तो गाँव-बिरादरी में अपना ही मान बढ़ेगा। गाँव के माननीय लोगों में अपनी गिनती होने लगेगी। रुपये-पैसे से वो सम्मान थोड़े ही बनता है, जो सरकारी नौकरी से बनता है। बड़े अफ़सर तक सबसे पहले अपने मातहत की ही सुनते हैं।’ 

नन्दू की ट्रेनिंग समाप्त होने ही वाली थी कि भारत-पाक के सम्बन्ध बिगड़ने से बॉर्डर पर तना-तनी हो गई। छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक की छुट्टियाँ कैंसिल कर दी गई। और नन्दू को देश सुरक्षा के लिए कश्मीर बॉर्डर पर जाना पड़ा। 

एक ओर दो देशों के बीच हालात ख़राब थे तो दूसरी ओर आतंकवादी घात लगा-लगाकर फौजी ठिकानों पर हमले कर रहे थे। रात के समय ख़तरा अधिक बढ़ जाता था। इसलिए हर क्षण चौकन्ना रहना पड़ता था। 

एक रात जब नन्दू डयूटी पर था तो किसी ख़तरे का आभास पाकर जंगल की ओर चला गया। उस जंगल में से वह फिर कभी लौट कर नहीं आया। किसी को नहीं पता उसका क्या हुआ, वह कहाँ गया? 

इधर गाँव में कुछ दुष्ट प्रवृत्तियों के व्यक्तियों ने मिथ्यालाप फैला दिया, ‘नन्दू ने देश से गद्दारी की है। प्राण बचाने के लिए युद्ध से भाग गया। मातृभूमि की रक्षा के लिए ली गई शपथ भूल गया। फौजी का कर्तव्य भी याद नहीं रखा। सुना है कई अन्य साथियों को भी भगा ले गया।’

रामलाल-लीलावती को पुत्र के जीवित या मृत होने की सूचना के स्थान पर ताने-उलाहने मिलने लगे। दोनों ने पुत्र के जीवित या मृत होने की सूचना पाने हेतु प्रत्येक उस स्थान का चक्कर लगाया जहाँ से उन्हें तनिक सी भी आशा थी। लेकिन एक वर्ष तक लगातार भटकने के बाद भी उन्हें कोई सूचना नहीं मिली। 

पुत्र की खोज में लगे-लगे सारा धंधा चौपट हो गया। बैठकर जूते गाँठने वाला ठिया तक छिन गया। सारी पूँजी पहले ही रिश्वत के रूप में जा चुकी थी। ऊपर से कर्ज़ से भी लदे हुए थे। हालात इतने बद से बदतर हुए कि रामलाल ने स्वयं पर से संयम खोकर आत्महत्या कर ली। 

दुखी लीलावती पति और पुत्र की याद में इतना रोई कि उसके आँसू तक सूख गए। असहाय लीलावती की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे? थक-हार उसने पति के व्यवसाय को ही अपना लिया। और एक सबील पर बैठकर लोगों के जूतों की मरम्मत करना आरम्भ कर दिया। पहले-पहल बिरादरी वालों में बहुत कानाफूसी हुई। लेकिन लीलावती ने सबका डटकर सामना किया। भरी पंचायत के सामने उसने बोल दिया, ‘अपनी इज्जत बेचने और भीख माँगने से तो अच्छा है, अपनी मेहनत का खाऊँ। पापी पेट को पालने के लिए आखिर कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।’

...नन्दू को गुम हुए आज वर्षों बीत गए हैं। लेकिन लीलावती जब भी किसी साहबनुमा आदमी के जूते पर पॉलिश करती तो वह बॉर्डर पर शहीद या लापता होने वाले फौजियों के बारे में अवश्य बात करती है। इस प्रकार उसने इस बात की जानकारी प्राप्त कर ली कि किसी फौजी के मरने पर सरकार मुआवजा देती है। इसलिए उसे आस थी कि बेटे के जीवित या मृत होने का भले ही कुछ पता न चले लेकिन मुआवजे की रक़म उसे अवश्य मिलेगी। इससे उसकी दुःख भरी ज़िन्दगी में बदलाव आएगा। 

खाली समय में जब उसके पास कोई ग्राहक नहीं होता तो वह इसके अक्सर सपने देखती रहती। आज जब वह इसी बात का सपना देखते-देखते अचेत हो गई थी तो उसी क्षण ज़ोर से बिजली कड़की। बारिश रुक चुकी थी। लीलावती ने आँखें खोलीं तो अपने चारो ओर लोगों की भीड़ को देखा जो उसे घूर-घूर कर देख रहे थे। 

क्योंकि लीलावती वही सपना देखते-देखते अचेत हो गई थी। इसलिए लोगों ने उसे उसके बैठने वाले स्थान से कुछ दूर लेटा रखा था। कुछ ने तो उसे मरा हुआ भी मान लिया था। उसने लोगों की ओर शंकित भाव से देखा और उठकर अपनी सबील की ओर चली गई। उसने पाया कि शहर से आने वाला वर्षा का पानी ऊपर सबील तक पहुँच कर उसका हल्का-फुल्का सामान बहा ले गया था। शेष बचा लोहे का पाँव, राम्पी, हांडा, कटर और कुछ भारी सामान जो अपने छोटे सहयोगियों के बिना निरर्थक हो चला था। उसने अपना बाक़ी सामान इकठ्ठा किया और थकी-हारी सी घर की और चल दी। लगभग एक किमी पैदल चलकर किसी प्रकार घर पहुँची। वर्षा में भीगकर उसके कच्चे घर की दशा जीर्ण-शीर्ण हो चली थी। देखने मात्र से लग रहा था तुरंत ढह जाएगा। आँगन में पड़ी खटिया, भीगकर अकड़ चुकी थी। उसे किसी प्रकार खींचकर घर के अन्दर घुसाया और कुछ फटे पुराने कपड़े उस पर बिछाए। लीलावती ने अनुभव किया, शरीर ज्वर के ताप से जल रहा है। शरीर में ऐंठन सी उत्पन्न हो रही है। साँसें साथ छोड़ रही हैं। रुक-रुक और खिंच-खिंचकर आ रही हैं। एकाएक हाथ पैर ठण्डे होने लगे। शीत सा चढ़ने लगा। आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। अंतिम समय के सारे लक्षण दिखने लगे।

लीलावती ने खटिया पर बैठकर खुले दरवाज़े की ओर देखा। खुले किवाड़ हवा से हिलते हुए चूँ-चूँ की आवाज़ करते हुए शायद उसे अपने पास बुला रहे थे। घुटनों पर हाथ रखकर वह ऊँ...ऊँ .... की आवाज़ करते हुए कठिनाई से उठी और धीरे से दरवाज़ा बन्द कर लिया। उसके पश्चात फिर कभी किसी ने उस दरवाज़े को खुला हुआ नहीं देखा। दरवाजा सदैव के लिए बन्द हो चुका था।

दिन, महीने, साल गुज़रने के बाद वह मिटटी का कच्चा मकान भी ढह गया। उसकी कुछ मिट्टी बहकर गाँव के पास बहने वाले नाले में चली गई। कुछ मिट्टी उठाकर लोगों ने नवनिर्माण कर लिया। गाँव में नई सभ्यता सी दिखने लगी। नए-नए भवन आकाश छूने लगे।

सरकारों की अदला-बदली हुई। लोगों के विश्वासों पर खरा उतरने के लिए नई सरकार ने जागरूक होकर काम करना आरम्भ किया। अनेक लापता सैनिकों का अस्तित्व खोजने के लिए पुनरादेश ज़ारी हुआ। उचित कार्यवाही से कई जवानों का पता चला जिनमें से लीलावती का पुत्र भी एक था। पर वो शहीद हो चुका था। उसके बलिदान की पुण्य स्मृति में गाँव के मुहाने पर भव्य शहीद द्वार बनवाने का सरकार ने निश्चय किया।

किसी ‘कारगिल विजय दिवस’ के शुभ अवसर पर जब गणमान्य मंत्री जी उस भव्य द्वार का उद्घाटन करने पधारे तो गाँव के बड़े-बूढ़े, स्त्री-बच्चे सभी उसे देखने आए। परन्तु वे चार आँखें उस उद्घाटन को नहीं देख पाईं जो इसे देखने की वास्तविक हक़दार थीं।                                                             

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