कागा बैठ अटरिया बोला
आती बिटिया खोल किवाड़ें
सूने द्वार लगेंगे हँसने
दीवारें कल्लोल करेंगी
खिड़की भी गुपचुप झाँकेंगी
हम दोनों में होंगी बातें............

रातें दिन सी जगमग होंगी
थम-थम कर दिन निकलेगा
नन्हें-मुन्हें तारे चमकीले
घर-बिस्तर सोने आयेंगे
चाँदी सी होंगी सब रातें.......

बरसों बाद मिलेंगे जब सब
कितनी ही तो बातें होंगी,
बीते – रीते दिन की कह-सुन
उलझी – सुलझी रातें होंगी।

चेहरे पर मेरे कुछ आँखें
नया-पुराना ढूँढ ही लेंगी
माँ-पापा के चेहरे पर मैं
पिछली खिली हँसी देखूँगी।

अनबोला, बोला हो जाता
फिर भी कितना कुछ रह जाता
अनबोली बातों की पेटी
बोलो तुमने कहाँ छुपाई
उन बातों की बोलो बातें
जो पड़ती हैं नहीं दिखाई।

दूरी देश – काल की आये
हृदय कभी ढकने न पाये
उम्र-राह पर चलता है तन
हृदय-उम्र ढलने न पाये।

तन पर समय खेलता चौपड़
मन उद्वेलित शिशु सा औघड़
मिलन हमारा बाँह पसारे
मिले गले फिर द्वार तुम्हारे।

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
कविता-मुक्तक
लघुकथा
स्मृति लेख
साहित्यिक आलेख
पुस्तक समीक्षा
कविता - हाइकु
कथा साहित्य
विडियो
ऑडियो