मेरी यादें

01-08-2019

सुबह से लेकर शाम तक,
यूँ ही घड़ी की ओर देखना।
दफ़्तर में बैठकर,
तेरे बारे में सोचना।

 

चाहता हूँ फिर से,
तेरी हँसी को खोजना।
उन बिखरी हुई यादों को, 
फिर से समेटना। 

 

जानता हूँ ये मुमकिन नहीं, 
फिर भी हो मेरे दिल में।
नज़रें ढूँढ़ती हैं मेरी तुम्हें, 
हर शाम-ए-महफ़िल में। 

 

रातों को यूँ ही,
ख़ुद से कुछ पूछना। 
उन अँधेरी सड़कों पर, 
आवारा सा घूमना।

 

ज़िंदगी भी अब मेरी,
कुछ बेरंग सी हो गयी।
इन शोर करती गालियों में,
मेरी हँसी जो खो गयी।

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