मेरी सुंदर बगिया

15-04-2019

मेरी सुंदर बगिया

विनोद महर्षि 'अप्रिय'

जीवन का एक ख़ूबसूरत हिस्सा
कुछ अनुपम यादों  का क़िस्सा
कई नवजात पंछी हैं यहाँ नादान
वे लता पुंज हैं और मैं बाग़बान॥

है उनमेंं एक मुरली श्याम की सी
हरपल सुधा रस बरसाती है, वह
वाचालता भरी है उसमें बेशुमार
चिड़िया सी सदा चहचहाती है, वह॥

इक उनमें बाला नादान  सी
विलक्षण प्रतिभा की खान सी
दूर-दराज़ में मान बढ़ाया
एक नया आईना दिखाया॥

चरित्र उसका प्रखर है
पाना उसे भी शिखर है 
कंटकों से सबक सीखा
हुनर उसमें  ख़ूब दिखा॥

एक है गुमसुम पंछी सी
सदा अपने में मस्त रहती है
प्रतिभा का तोल नहीं उसमें
हरदम वह नए रंग भरती है॥

बसन्त में जैसे कुसुम खिलता है
वो मन्द समीर सी महकती है
है इस बगिया की ख़ुश्बू वो
चहुँ दिशा ख़ुशियाँ बिखेरती है

पंछी कोटर की है वो नादान
बढ़ाये वृक्ष की हरदम शान
ऋतु बारिश सी बरसे वो
वन गौरेया सी चहके वो॥

"पूजा" किसी की इबादत है
दोनों की विपरीत आदत है
तराशे पत्थर मूरत बनता है
बन ख़ुदा वो सबकी सुनता है॥

एक उनमें योद्धा सी लगती है
सावन धार सी वो बरसती है
गरजती है वो तेज़ तलवार सी
टूटती अरि पर बन कटार सी॥

कुछ पत्थर निखट्टू हैं
जैसे बिन बाग के घोड़े
ज़रा सी मस्ती थी उनमें
फिर भी सरपट वो दौड़े॥

कुछ विहग बिन नीड़ के
पथ की उनको तलाश थी
शिखर उनको भी छूना था
परिश्रम अभी दुगुना था॥

कर उधम वो भी शूल हटाते हैं
राहों में डट कर मंज़िल वो पाते हैं
एक दूजे के विपरीत अंग हैं वो
इस उपवन के विरले खग हैं वो॥

दो फूल यहाँ नादान है
एक दूजे की जान है
इस लताकुंज कि शान है
वे ही मेरा स्वभिमान हैं॥

इस बगिया की वो दो तितली
हरदम ख़ुशबू उड़ाती हैं, वो।
ज्यों झरने का मधुर कलरव
स्नेह से प्रतिपल मुस्काती हैं, वो॥

जीवन का यह सुख निराला
हरपल यहाँ हँसी महकती है
यह मेरी सुंदर पाठशाला है
जहाँ सुरीली चिड़ियाँ चहकती हैं॥

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