मेरा आख़िरी आशियाना - 1

01-08-2019

मेरा आख़िरी आशियाना - 1

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग - 1

 

सूरज ना बदला, चाँद ना बदला, ना बदला रे आसमान, कितना बदल गया इंसान...। अम्मा आराम करती हुई या काम करती हुई, दिन भर में नास्तिक फ़िल्म के लिए, गीतकार प्रदीप के लिखे भजन की इन लाइनों को कई-कई बार गुनगुनाती थीं। वह भजन की शुरूआती लाइनों "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान...,” को छोड़ देती थीं। दादी उनको गुनगुनाती सुनतीं तो झिड़कती हुई बोलतीं, "अरे काम-धाम करो, जब देखो तब नचनिया-गवनियाँ की तरह अलापा करती हो।" 

अम्मा उनकी झिड़की सुनकर एकदम सकते में आ जातीं। चुप हो जातीं। अपना घूँघट और बड़ा करके काम पूरा करने लगतीं। अम्मा दादी की बातों का कभी बुरा नहीं मानती थीं। उनके हटते ही गहरी साँस लेकर मुस्कुरातीं, फिर कुछ ही देर में गुनगुनाने लगतीं "सूरज ना बदला....।" यह उन दिनों की बात है जब मैं क़रीब बारह-तेरह वर्ष की हो रही थी। छठी में पढ़ रही थी। देश की सीमा पर युद्ध के बादल गहराते जा रहे थे।

बाबूजी पाकिस्तान से लगती सीमा पर तैनात थे। बाबा, दादी, चाचा सभी चिंतित रहते थे। अन्य देशवासियों की तरह यह लोग भी उन्नीस सौ बासठ के भारत-चीन युद्ध की विभीषिका को भुला नहीं पाए थे। उस युद्ध में गाँव के ही दो पट्टीदारों का कुछ पता नहीं चल पाया था। वह लोग चीन से लगती सीमा पर तैनात थे। जब उन लोगों की बात होती तब बाबा कहते, "जनम-जनम के धोखेबाज़, कमीने चीन ने हिंदी-चीनी भाई-भाई करके पीठ में छूरा भोंक कर मारा था। आमने-सामने बात होती तो बात कुछ और होती।"

एक और पट्टीदार जो बाबा के सबसे क़रीबी थे, वह बोलते, "अरे नेहरू जी समझ नहीं पाए धोखेबाज़ को। पंचशील का झुनझुना बजाते रहे। झोऊ एनलाई की पीठ थपथपाते रहे, गले लगाते रहे। मारा सत्यानाश कर के रख दिया था। फौजियों को बिना हथियार के ही बेमौत मरवा दिया था। बेचारों को गोला-बारूद तक तो मिला नहीं था लड़ने के लिए, पता नहीं काहे के नेता बने फिरते थे।" इस बात के जवाब में बाबा कहते, "नेता नहीं। शांति मसीहा बनने के चक्कर में सच से मुँह मोड़े रहे। सामने धोखेबाज़ झोऊ एनलाई है, हाथ में छूरा लिए है यह देखकर भी अनदेखा किये रहे। उनको खाली नोबेल पुरस्कार दिख रहा था। मक्कार चीन की धूर्तता नहीं।"

उन्नीस सौ बासठ के भारत-चीन युद्ध के संबंध में ऐसी बातें करने वाले बाबा लोग उन्नीस सौ पैंसठ में पाकिस्तान से युद्ध के बादलों को देखकर बोलते, "देखो अब की क्या होता है?" बाबा कहते "जो भी होगा उन्नीस सौ बासठ जैसी दुर्दशा तो नहीं होगी, मुझे इसका पूरा विश्वास है। अबकी अपने फौजी कम से कम बिना हथियार के निहत्थे नहीं लड़ेंगे। हथियार रहेगा तो दुश्मनों की धज्जियाँ भी उड़ाएँगे, जीतेंगे भी।"

मर्दों की इन बातों को सुन-सुन कर दादी गंभीरता की मूर्ति बन जातीं। उन्हें सीमा पर तैनात अपने बेटे की चिंता सताती। ऐसे में माँ का भजन गुनगुनाना उन्हें बहुत बुरा लगता। अम्मा जब बुआ से बात करतीं तो कहतीं, "अम्मा जी बेवजह नाराज़ होती हैं। हम भगवान को याद करते हैं। उन पर हमें अटल भरोसा है। इनको कभी कुछ नहीं होगा। अबकी अपना देश हर हाल में जीतेगा। अम्माजी तो कुछ समझती ही नहीं। ये भी अबकी आए थे तो कह रहे थे कि शास्त्री जी बड़ी मजबूती से देश सँभाल रहे हैं। पाकिस्तान को तबाह कर देंगे। इनको तो और पहले देश सँभालना चाहिए था। मगर अम्मा को कौन समझाए, वह पहले वाली ही बात लिए बैठी हैं। बेवजह परेशान होती रहती हैं।"

अम्मा की बात सच निकली शास्त्री जी की छत्रछाया में देश ने पाकिस्तान को धूल-धूसरित कर दिया। बाबूजी भी कई महीने बाद सकुशल घर लौट आए थे। गाँव में उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ। सम्मान किया गया। सीमा पर दुश्मनों की धज्जियाँ उड़ाने वाले बाबू जी गाँव में नायक बन गए थे। घर में ख़ुशियों के बीच अम्मा ने कई बार दादी से कहा, "अम्मा जी आप तो बेवजह परेशान हो रही थीं। मैं तो हमेशा भगवान से प्रार्थना करती थी। मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा था।" अम्मा का इतना कहना होता था कि दादी चिढ़ जातीं, अपनी तेज़ आवाज़ में बोलतीं, "प्रार्थना करती थी कि सनीमा (सिनेमा) के गाना गाती थी।"

दादी परंपरागत भजन-आरती को ही भजन-आरती मानती थीं। फ़िल्मी संगीत उनकी नज़र में गंदा था। अम्मा कहतीं, "यह भजन है अम्मा, गाना नहीं।" मगर दादी को ना मानना था तो वह ना मानतीं। अम्मा ने भी इस भजन को गुनगुनाना बंद करने के बजाय और ज़्यादा गुनगुनाना शुरू कर दिया था। यह तो मैं अब भी नहीं समझ पाई कि वह और ज़्यादा दादी को चिढ़ाने के लिए गुनगुनाती थीं या बाबूजी के सकुशल लौट आने की ख़ुशी में, कि कितना बदल गया इंसान।

घर में तब पता नहीं कौन कितना बदला था, या नहीं बदला था। पर मैं यह मानती हूँ कि मेरे लिए सब बदल गए थे। और किसी के बदलने की मुझे कोई परवाह नहीं थी। मगर जिन दो लोगों का बदलना आज भी मुझे सालता है। आज तक पीड़ा देता है, और मैं बेहिचक कहती हूँ कि उनके बदलने के ही कारण मेरा जीवन हमेशा-हमेशा के लिए अंधकार में डूब गया, वह कोई और नहीं मेरी प्यारी अम्मा और मेरे प्यारे बाबू जी ही थे। जिनके बदलने के कारण अम्मा के प्रिय इस भजन की लाइन आज भी उन्हीं की आवाज़ में मेरे कानों में गूँजती है। "कितना बदल गया इंसान...।" अम्मा-बाबूजी के लिए यह कहना मेरे लिए प्रसव पीड़ा से गुज़रने जैसा पीड़ादायी है, लेकिन क्या करूँ और सह पाना मुश्किल हो गया है। सहते-सहते, झेलते-झेलते अब नहीं रहा जाता।

सही यह है कि कोई कितना ही मज़बूत, कठोर क्यों ना हो, जीवन का एक दौर वह भी होता है जब वह टूटने लगता है। पानी के बुलबुले से भी वह घायल होने लगता है। बुलबुला भी उसे पत्थर सी चोट पहुँचाने लगता है। मैं ऐसी ही स्थिति में आ गई हूँ, इसी लिए अम्मा-बाबूजी के लिए यह बात मन में आती है। मेरे लिए वह तब भी, आज भी, आगे भी, पूजनीय थे, हैं और रहेंगे। लेकिन वह कितना बदले थे यह भी कभी नहीं भूलेगा।

उस समय जब बाबा घर आकर यह बताते थे कि आज स्कूल में मेरी पढ़ाई की फिर तारीफ़ हुई है। छमाही, सलाना परीक्षा का रिज़ल्ट आने पर जब सबसे आगे रहने पर मुझे इनाम मिलता, हर तरफ़ से मेरी प्रशंसा होती तो अम्मा ख़ुशी के मारे नाच उठती थीं। बाबू जी को ख़ुशी के मारे सब कुछ लिखकर लंबा सा पत्र भेजती थीं। मुझे बड़े प्यार से गले लगा लेती थीं। मैं भी बड़ा प्यार लाड़-दुलार दिखाती।

उनकी गोद में सिर रखकर दोनों हाथों से उन्हें चिपका लेती। चेहरा उनके पेट से चिपका कर उनके आँचल से अपना सिर ढंक लेती थी। ऐसा लगता मानो कोई चिड़िया अपने बच्चे को अपने पंखों में छुपाए हुए है। अम्मा बड़े प्यार से, हल्के हाथों से मेरे सिर को सहलातीं। मुझे लगता जैसे मैं मखमल नहीं धुनी हुई रूई के फाहों पर लेटी हुई हूँ। माँ लोरियाँ गा रही हैं। उसकी मधुर रुनझुन कानों में शहद घोल रही है। पहाड़ों की ओर से आती शीतल हवा बड़ी नाज़ुक सी थपकियाँ दे रही है।

कई-कई बार ऐसा हुआ कि मैं कुछ ही मिनटों में, ऐसे ही अम्मा की गोद में सो गई। तब अम्मा मुझे जगाती नहीं थीं। इतना सँभालकर मुझे लिटा देती थीं कि मेरी नींद टूटती नहीं थी। नींद पूरी होने पर जब मेरी आँख खुलती तो अम्मा को अपने पास ना पाकर मैं फिर से उनके पास पहुँच जाती। तब वह कहतीं, "तुझे बड़ी जल्दी नींद आती है। गोद में लेटते ही चट से सो जाती है।"

दादी जब पाकिस्तान से युद्ध के कुछ ही हफ़्तों पहले बाबूजी का नाम लेकर कहतीं, "अबकी आए तो उससे कहूँगी कि इसकी शादी-वादी ढूँढे़। अब उमर हो चली है।" तो अम्मा कहतीं, "अभी नहीं अम्मा जी, अभी इसे और पढ़ाऊँगी, इसे मैं डॉक्टर बनाऊँगी।" मैं कहती नहीं, मैं बाबूजी की तरह फौजी बनूँगी। दादी की बात पर मैं पैर पटकती हुई दूसरी तरफ़ चली जाती।

दादी से मुझे डॉक्टर बनाने की बात करने वाली अम्मा ने, जब बाबूजी लौटे तो मेरी पढ़ाई की बात चलने पर उनसे भी मुझे ख़ूब पढ़ाने की बात की थी। बाबूजी ने भी उनकी बात पर हामी भरी थी। लेकिन हफ़्ते भर बाद ही न जाने क्या हुआ, दादी-बाबा ने जो भी बातें मेरी शादी के लिए बार-बार कीं, जो कुछ भी, जैसा भी समझाया-बुझाया बाबू-अम्मा को, कि सब कुछ बदल गया। दिनभर "कितना बदल गया इंसान" गाने वाली अम्मा भी बदल गईं।

ज़ाहिर है बाबूजी उनसे पहले ही बदल गए थे। मुझे पता तक नहीं चला और महीने भर में ही मेरी शादी तय कर दी गई। घर पर एक दिन बहुत से मेहमान आए थे। उसी समय कब लड़के वाले मुझे देख-दाख के, रिश्ता तय करके चल दिए थे मुझे कुछ भी पता नहीं चला था। उन सब के जाने के बाद घर भर जिस तरह से ख़ुशी से झूम रहा था, मुझ पर बार-बार कुछ ज़्यादा ही लाड़-प्यार उड़ेल रहा था, उससे मुझे कुछ अटपटा ज़रूर लग रहा था। लेकिन फिर भी सबके साथ हँसती-बोलती, खेलती-कूदती रही। परन्तु दो-चार दिन बाद ही मैंने महसूस किया की अम्मा-बाबूजी, बाबा-दादी सहित घर के सारे बड़े-बुज़ुर्ग कुछ ज़्यादा ही विचार-विमर्श कर रहे हैं।

सबसे ज़्यादा यह कि मुझे देखते ही सब अजीब तरह से शांत हो जाते हैं या बात बदल देते हैं। यह सब मेरी शादी की तैयारी का एक हिस्सा है यह मुझे पता तब चला जब एक दिन लड़के वाले मेरी गोद भराई कर गए। मैं बहुत रोई, अम्मा से ग़ुस्सा भी हुई, चिरौरी, विनती की, लेकिन सब बेकार। कोई मेरी सुनने वाला नहीं था। अम्मा भी बुरी तरह बदल गई थीं। कितना बदल गया इंसान अम्मा तब भी गुनगुनाती थीं। फिर देखते-देखते मेरी शादी हो गई।

अम्मा-बाबूजी, बाबा-दादी सबने ससुराल के लिए विदा कर दिया। मैं फूट-फूट कर रोती रही। रोक लो, मुझे ना भेजो अभी। मुझे पढ़ना है। अम्मा तुझे छोड़कर न जाऊँगी। बाबूजी। मगर सब बेकार। रो वो सब भी रहे थे। मेरे छोटे-छोटे तीन भाई भी। लेकिन मेरे और बाक़ी के रोने में फ़र्क था। एकदम अलग था। सब मैं विदा हो रही हूँ, इसलिए रो रहे थे। लेकिन मैं रो रही थी कि बाबूजी तो बाबूजी अम्मा भी बदल गईं। कितना बदल गया इंसान गाते-गाते ख़ुद भी बदल गईं।

जिसके आँचल तले मैं कितना सुरक्षित महसूस करती थी। इतनी ख़ुशी पाती थी कि पल में सो जाती थी। वही अम्मा कुछ सुन ही नहीं रही हैं। मैं बार-बार उन्हें पकड़ रही हूँ, और वह मुझसे ख़ुद को छुड़ाती जा रही हैं। छुड़ाकर दूर हटती जा रही हैं। विदा किए जा रही हैं।

मैं रास्ते भर रोती रही। अम्मा-अम्मा यही कहती सिसकती रही। जिनके साथ ब्याही गई थी वह भी ऐसे कि चुप कराने के नाम पर बस इतना ही बोले, "क्या रोना-धोना लगा रखा है। चुप क्यों नहीं होती।" मेरे मन में आया कि बस का दरवाज़ा खोलूँ और कूद जाऊँ  नीचे। तब मुझे पूरी दुनिया दुश्मन लग रही थी। तीन घंटे का सफ़र करने के बाद ससुराल पहुँची।

वहाँ पहुँचने से लेकर, आधी रात को मुझे मेरे कमरे में नंदों कुछ और ठिठोली करती औरतों द्वारा पहुँचाने तक न जाने कितनी पूजा-पाठ, रस्में पूरी करवाई गईं। मुझे भूख लगी है, प्यास लगी है, नींद लगी है, इससे किसी को कोई लेना-देना नहीं था। सास को देखते ही मैं समझ गई थी कि बहुत कड़क मिज़ाज हैं। दादी से ज़्यादा तेज़ हैं। उनकी भारी आवाज़ और उससे भी ज़्यादा भारी भरकम डील-डौल और भी ज़्यादा डरा रहे थे।

पति का व्यवहार बिल्कुल माँ पर ही गया था। मुझे लगता कि डर के मारे मेरी जान अब निकली, कि अब निकली। पतिदेव कमरे में आए तो वह भी मेरे अनुमान से ज़्यादा डरावने, पीड़ादायी साबित हुए। मेरी सुबह जेल से छूटे क़ैदी की तरह रही। रात फिर जेल में बंद क़ैदी। यही मेरी ज़िंदगी बन गई थी। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता था, जब मेरी आँखों से आँसू ना बहें। मैं अकेले में रोऊँ ना।

मायके में अम्मा से मिलती, अपनी तकलीफ़ बताती तो वह ख़ुद ही रोतीं। कहतीं, "मेरी बिटिया ससुराल है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।" लेकिन अम्मा की बात उल्टी निकली।

सात-आठ महीनों बाद ही सब कुछ उलट-पुलट हो गया। ससुर जी अचानक ही चल बसे। एकदम से बढ़े हाई ब्लड प्रेशर ने उनकी जान ले ली थी।

वह खाने-पीने के इतने शौक़ीन थे कि डॉक्टरों के लाख मना करने पर भी मानते नहीं थे। मिर्च-मसाला, चटपटा खाना उनके प्राण थे। रिटायरमेंट से पहले ही उनकी मृत्यु के कारण कम्पन्सेंटरी बेस पर मेरे पति को उनकी जगह नौकरी मिल गई। इसी के साथ मेरे जीवन की और ज़्यादा बर्बादी भी शुरू हो गई। प्राइवेट से सीधे सरकारी नौकरी, पहली नौकरी की अपेक्षा दुगुनी सैलरी ने पतिदेव के क़दम बहका दिए। ऑफ़िस में ही एक महिला केे इतने क़रीब होते गए कि हमसे दूर होते चले गए। आए दिन घर में मारपीट, लड़ाई-झगड़ा, घर में किसी की न सुनना, सब को अपमानित करना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था।

बाबूजी, बाबा, चाचा सब आए समझाने, हाथ-पैर जोड़ने लगे, लेकिन राक्षसी कर्म करने वाले मेरे पतिदेव के हाथों अपमानित हुए। मार खाते-खाते बचे। तब बाबा बोले, "हम ठगे गए। क़िस्मत फूट गई, कसाई के हाथों बिटिया को दे दिया।" फिर उसी समय सास के मना करने के बावजूद वह मुझे लेकर घर वापस आ गए। पतिदेव को मुझ से छुट्टी मिल गई। मैं मात्र सत्रह वर्ष की आयु में परित्यक्ता बन गई। ग़नीमत यह रही कि फ़र्स्ट मिसकैरेज के कारण किसी बच्चे की ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं थी। वैवाहिक जीवन का चैप्टर क्लोज़ होते ही बाबा जी अगला चैप्टर ओपन करने की ज़िद कर बैठे। कहते, "चाहे जैसे हो मैं अपनी पोती की ज़िंदगी ऐसे बर्बाद नहीं होने दूँगा।" वह जल्दी से जल्दी मेरी दूसरी शादी की तैयारी में लग गए।

एक दिन घर आए एक मेहमान से वह इस बारे में बात कर रहे थे। अम्मा ने सुन लिया। रिश्तेदार के जाते ही उन्होंने साफ़ कह दिया, "बाबूजी बिटिया की शादी अभी नहीं करेंगे। पहले उसे पढ़ाएँगे, अपने पैरों पर खड़ा करेंगे, तब उसकी दूसरी शादी करेंगे। अब आँख बंद करके उसे ऐसे ही अँधेरे कुँए में नहीं फेंकेंगे।" जिस अम्मा ने कभी ससुर के सामने घूँघट नहीं हटाया था, कभी उनकी आवाज़ तक ससुर के कानों में नहीं पड़ी थी, उसी ससुर के सामने ऐसे सीधे-सीधे बोल देने से घर में भूचाल आ गया।

बाबा की एक ही रट, "क्या हमने जानबूझकर बिटिया को कुँए में फेंक दिया था, क्या मैं उसका दुश्मन हूँ, क्या वह मेरी कोई नहीं, क्या मेरा कोई अधिकार नहीं है।" लेकिन अम्मा पर उनकी ऐसी किसी बात का कोई भी असर नहीं हुआ। वह अडिग रहीं। उन्होंने दो टूक कह दिया, "बाबू जी आपका सब अधिकार है। लेकिन मैं माँ हूँ, मेरा भी कुछ अधिकार है। उसी अधिकार के नाते कह रही हूँ कि अब मैं उसकी शादी उसे पढ़ा-लिखा कर, उसको उसके पैरों पर खड़ा करने के बाद ही करूँगी।"

अम्मा की ज़िद के आगे बाबू-चाचा क्या बाबा-दादी सब हार गए। अम्मा के इस रूप से मैं बहुत ख़ुश हुई। बाद में बाबूजी भी अम्मा के साथ हो गए। मेरी पढ़ाई फिर शुरू हो गई। कुछ साल बाद ही बाबूजी फौज से रिटायर होकर घर आ गए। मगर जल्दी ही दूसरी नौकरी मिली और वह चित्रकूट पहुँच गए। देखते-देखते कई और साल बीते। बाबा-दादी हम सब को छोड़कर स्वर्गवासी हो गए। भाइयों की नौकरी लग गई तो जल्दी ही उन सबकी शादी भी हो गई। फिर अमूमन जैसा हर घर में होता है वैसा ही हमारे यहाँ भी हुआ। भाई अपनी बीवियों भर के होकर रह गए। घर कलह का अड्डा बन गया।

बाबूजी नौकरी, घर की कलह में ऐसे फँसे कि एक दिन चित्रकूट से आते समय, एक रेलवे स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो वह नीचे उतर कर टहलने लगे। ट्रेन चली तो दौड़कर चढ़ने के प्रयास में फिसल कर ट्रेन के नीचे चले गए। ऐसे गए कि फिर कभी नहीं लौटे। घर पर इतना बड़ा मुसीबतों का पहाड़ टूटा लेकिन भाभियों पर कोई ख़ास असर नहीं हुआ। महीना भर भी ना बीता होगा कि उन लोगों की हँसी-ठिठोली गूँजने लगी। भाई तो ख़ैर उन्हीं के हो ही चुके थे। अम्मा, मैं बुरी तरह टूट चुके थे। अब ख़र्च कैसे चले इसका प्रश्न खड़ा हुआ। बाबूजी को गए दो महीना भी ना हुआ था कि भाई अपने-अपने परिवार के साथ अलग हो गए। हम माँ-बेटी अधर में। अम्मा की पेंशन बनने में समय लगा।

बाबूजी की जगह नौकरी मुझे मिले इसके लिए कोशिश शुरू हो गई। एक भाई नियम विरुद्ध अपनी बीवी को लगवाना चाहते थे। लेकिन बात नहीं बनी तो वह और दुश्मन बन बैठे। बीवी तो जानी-दुश्मनों से भी बुरा व्यवहार करने लगी। उसका वश चलता तो हम माँ-बेटी दोनों को मारती। ऐसे में मैंने कोई रास्ता ना देख कर अपने को सँभाला और अम्मा का वह रूप याद कर तन कर खड़ी हो गई, जब वह बाबा के सामने तनकर खड़ी हुई थीं। उससे भी कहीं ज़्यादा तनकर मैं भाइयों के अन्याय के सामने खड़ी हो गई। 

मुझे लगा कि मैं एक फौजी की बेटी हूँ। उस फौजी की जिसने उन्नीस सौ पैंसठ के युद्ध में दुश्मन को कुचल कर रख दिया था। भाइयों ने मिलकर दबाना चाहा, लेकिन मेरे रौद्र रूप के सामने उन्हें दबना पड़ा। हाँ चाचा और उनका पूरा परिवार भी हम माँ-बेटी के साथ था। मगर भाभियाँ भी हार मानने वाली नहीं थीं। वह किसी भी तरह अपने क़दम पीछे खींचने को तैयार नहीं थीं।

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