मेघ छाए
स्निग्ध कन्धों पर
असंयत-से कुन्तल 
बिखर आए ।

फुहार में भीगा
सोंधी माटी - सा
महका तन,
अँगड़ाई लिये
पोर- पोर में
खिले उपवन।

सतरंगी सपने
काजर की डोर पर
उतर आए ।
हौले से उतरी है
माथे पर
बावरी चाँदनी,
मुस्कान बन
अधरों पर करती है
किलोल दामिनी।

सपनीली परीकथा
नयनों में
उभर आए।
 

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
कविता
सामाजिक
हास्य-व्यंग्य कविता
पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
कविता-मुक्तक
साहित्यिक
दोहे
कविता-माहिया
विडियो
ऑडियो