मरहूम गर तू है

01-04-2019

मरहूम गर तू है

ज़हीर अली सिद्दीक़ी 

जहान में नंगा आया था
ग़रीबी साथ लाया था
ख़ुशी के अपने भावों से
सभी को तूने हँसाया था॥

ख़ुदा ने कान बख़्शा है
नेकी सुनने और करने को
मगर क्या खूब फ़ितरत है
बुराई सुनने, करने को॥ 

नज़र ख़ुदा ने बख़्शी है
जहान ढूँढ़ ले प्यारे
ख़ुदा को क्यों करे नाख़ुश
अज़ाब थूक दे प्यारे॥ 

कोई अपने, पराये न थे
सभी के दिल का तारा था
किया ऐसा भी क्या तुमने
कोई पराया तो कोई अपना॥ 

मरहूम गर तू है
जीना और मरना क्यों?
बुज़दिली से ज़िन्दगी में
तबाह करना ही क्यों है? 

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